Tuesday, September 12, 2017

हम खुद अपनी समस्याएं हल क्यों नहीं करना चाहते?

देखते-देखते हमारे चारों  तरफ की दुनिया में बहुत कुछ बदलता जा रहा है. हर बदलाव हमारे मन में बहुत सारी आशंकाएं पैदा करता है. हम भयभीत होते हैं, उसे नकारने के प्रयत्न करते हैं, उसका प्रतिरोध करने की कोशिश करते हैं, उसके खिलाफ़ तर्क गढ़ते हैं लेकिन हमारे सारे प्रयत्नों के बावज़ूद बदलाव आकर  रहता है. मज़े की बात यह है कि जिन्होंने कभी उस बदलाव का विरोध किया था बाद मे वे भी उसे बेहिचक स्वीकार कर लेते हैं. यह सिलसिला काफी लम्बे समय से चल रहा है. वैसे, ऐसा भी नहीं है कि हर बदलाव सकारात्मक ही हो. बल्कि सच तो यह है कि हर बदलाव अपने साथ कुछ परेशानियां भी  लाता है. कुछ बुरा भी उसकी वजह से होता है. लेकिन इसे मनुष्य की  अदम्य जिजीविषा ही कहेंगे कि वह तमाम झटके सहकर भी अपने प्रगति पथ पर अनवरत  चलता रहता है.

ये सारे विचार मेरे मन में एक ख़ास अनुभव के कारण आए. पिछले दिनों बैंगलुरु जाने का और कुछ दिन वहां रहने का अवसर मिला तो मैंने पाया कि सूचना प्रौद्योगिकी के मामले में अग्रणी इस भारतीय शहर में कई मामलों में जीवन यापन बहुत कठिन हो गया है. कुछ समय पहले तक जहां हम इस बात पर गर्व करते थे कि इस शहर के आई टी हब बनने का यह आलम है कि अमरीकी अंग्रेज़ी में एक नया शब्द ही जुड़ गया है: बैंग्लोर्ड, वहीं अब यह महसूस हुआ कि यह शहर इसी वजह से यहां आ जुटी विशाल जनसंख्या और उसकी    ज़रूरतों-सुविधाओं-विलासिताओं के उपकरणों का बोझ उठा पाने में नाकाम साबित होता जा रहा है. सड़कों पर वाहनों की ऐसी भीड़ है कि घर से निकलकर कहीं जाना किसी यातना से कम नहीं लगता है. वहां के अखबार भी आए दिन यह फिक्र करते हैं कि लगातार बढ़ती जा रही जनसंख्या के सामने वहां के प्राकृतिक संसाधन अपर्याप्त साबित होते जा रहे हैं! और जब मैं यह सब महसूस कर रहा था तभी मुझे यह पढ़ने को मिला कि यह संकट केवल हम भारत वासियों का ही नहीं है.

उधर सुदूर अमरीका में भी उन शहरों में जहां बहुत सारी बड़ी कम्पनियों का जमावड़ा है, उनमें काम करने वाले कर्मचारियों के लिए वहां रहना और जीवन यापन  करना नामुमकिन होता जा  रहा है. लोगों को रहने के लिए घर नहीं मिलते हैं, और अगर मिलते हैं तो बहुत महंगे किराये पर मिलते हैं. परिवहन और यातायात की समस्याएं दिन-ब-दिन गहराती जा रही हैं. कम्पनियां अपने यहां जिस दक्षता के कर्मचारियों को रखना चाहती हैं वे वहां रहने को तैयार नहीं हैं. जो अमीर कम्पनियां हैं वे अपने कर्मचारियों को अधिक वेतन देकर भी अपने यहां काम करने को तैयार कर लेती हैं, लेकिन सारी कम्पनियां यह नहीं कर पाती हैं. और इसी मज़बूरी ने वहां एक नए सोच को जन्म दिया है.  बहुत सारी कम्पनियां अब यह सोचने लगी हैं कि बजाय इसके कि वे कर्मचारियों को अपने पास बुलाएं, क्यों न वे ही कर्मचारियों के पास चली जाएं? लेकिन स्वाभाविक ही है कि ऐसा करना भी छोटी कम्पनियों के बस की बात नहीं है.

अमरीका की एक बहुत बड़ी कम्पनी है अमेज़ॉन. यह वहां की सर्वाधिक सफल कम्पनियों  में से एक है. हम भारत में भी इसके नाम और काम से परिचित हैं. इसने पिछले ही सप्ताह यह घोषणा की है कि यह बहुत जल्दी पांच बिलियन डॉलर की लागत से एक नया, “समान” मुख्यालय परिसर खड़ा करेगी. अमेज़ॉन का सोच यह है कि इसके वर्तमान मुख्यालय वाले शहर सिएटल में कर्मचारियों के आवास  की समस्या के हल होने का इंतज़ार करने और वहां बढ़ती जा रही भीड़-भाड़ की समस्या के घटने की आस लगाए रखने से ज़्यादा अच्छा यही होगा कि किसी और जगह जाकर, जहां ये समस्याएं न हों और निकट भविष्य में होने की आशंका भी न हो, सुकून के साथ अपना काम ज़ारी रखा जाए. ज़ाहिर है कि कम्पनी ने सरकार के कदमों का इंतज़ार करने की बजाय अपने स्तर पर समस्या का समाधान  करने का फैसला किया है.

इसी बात ने मुझे यह सोचने को विवश किया कि आखिर क्या बात है कि हम पश्चिम की नकारात्मक चीज़ों को तो तुरंत अपना लेते हैं, वहां की सकारात्मकता से उसी तेज़ी के साथ प्रभावित नहीं होते हैं! बैंगलुरु में मैंने पाया कि बहुत समर्थ और साधन सम्पन्न कम्पनियों के परिसरों तक जाने वाली सड़कें भी बहुत बुरी हालत में है. यह प्रशासन का निकम्मापन तो है ही कि जिनसे उसे टैक्स के रूप में भारी आमदनी होती है उनकी भी वो कोई परवाह नहीं करता है, लेकिन क्या यह उन समर्थ कम्पनियों की  भी भयंकर उदासीनता नहीं है कि वे खुद अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कोई पहल नहीं करती हैं? आखिर क्यों नहीं ये कम्पनियां अपने परिसरों तक आने वाली सड़कों को अपने दम पर दुरुस्त करवा लेती हैं?        

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 सितम्बर, 2017  को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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