Tuesday, August 22, 2017

बर्न आउट से मुक्ति के लिए तिब्बती बौद्ध मार्ग की शरण में


आप में  से  बहुतों को उस विज्ञापन की जरूर   याद होगी जिसमें एक थके हारे आदमी को एक बिचारा काम के  बोझ का  मारा कह कर इंगित किया जाता था.  इस  विज्ञापन के नायक की याद मुझे यह पढ़ते हुए आई  कि सन 2011 में अमरीका के मेयो क्लीनिक ने एक सर्वे कर यह जाना कि वहाँ के कम से कम आधे फिजीशियन उस बढ़ते जा रहे मर्ज़ के शिकार हैं जिसे आजकल बर्न आउट नाम से जाना जाता है। भले ही अपने देश  भारत में हममें से  ज़्यादातर  लोगों को अपने डॉक्टरों से अनगिनत शिकायतें हों, इस सर्वे के क्रम में  जाना गया कि वहाँ के ज्यादातर  डॉक्टरों का हाल यह है कि वे कम से कम चौदह घण्टे काम करते हैं और इस बीच एक वक़्त खाना खाने का समय भी मुश्किल से निकाल पाते हैं. कुछ समय तक लगातार इस तरह खटने के बाद उनकी हालत इतनी बिगड़ चुकती है कि वे बहुत गम्भीर  अवसाद  के शिकार हो जाते हैं और करीब-करीब टूट जाते हैं.  तब वे अपने इस पेशे तक को तिलांजलि देने की सोचने लगते हैं. अगर किसी वजह से नहीं दे पाते हैं और अपना यह काम  जारी रखते हैं तो वे इस बर्न आउट के  एक खास प्रकार से पीड़ित होने लगते हैं जिसे कंपैशन फ़ेटिग़  के नाम से जाना जाता है. इस कंपैशन फ़ेटिग़  में व्यक्ति में   भावनात्मक संवेदनशून्यता आने लगती है और अगर वह डॉक्टर है तो मरीजों के प्रति उसके करुणाभाव में  कमी दिखाई देने लगती है. यही नहीं  उसे यह भी एहसास होने लगता है कि चीजों पर से उसका  नियंत्रण  चुकता जा रहा है.

बहुत मुमकिन है कि अपने देश में  भी बहुत सारे डॉक्टरों और अन्य पेशेवरों  का हाल  इनसे भिन्न  न हो. इधर निजी क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों पर काम के लगातार बढ़ते जा रहे बोझ  और पेशेगत तनावों  की अकसर   चर्चा होती ही है. अपने देश में  भले ही इस तरह के काम के बारे में हमारी जानकारी सीमित हो, अमरीका में इस दिशा में जो  काम हुआ है उसके बारे  में काफी जानकारियाँ भी सुलभ हैं. अमरीका में इस बर्न आउट का मुकाबला करने के लिए बहुत सारे प्रयास हो रहे हैं. मसलन  वहाँ डॉक्टरों को उनके पेशे के तनावपूर्ण  माहौल का सामना करने में सक्षम बनाने के लिए उन्हें  अनेक सॉफ्ट स्किल्स  सिखाई जा रही हैं. और इस तरह के प्रयासों के सुपरिणाम भी सामने आने लगे हैं.  उदाहरण के लिए वहाँ के एक चिकित्सा संस्थान एमोरी  ने अपने स्टाफ, संकाय सदस्यों और विद्यार्थियों के लिए दस सप्ताह की अवधि का एक निशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम  चला रखा है जिसका प्रमुख लक्ष्य है संवेदना का संवर्धन. इस कार्यक्रम के लोगों की दिलचस्पी  लगातार बढ़ी है. दिलचस्प बात यह है की इस कार्यक्रम की मूल प्रेरणा तिब्बती बौद्ध मानसिक क्रियाओं से ली गई है और उसके  धार्मिक पक्ष को अलग रखते हुए इसे इस तरह विकसित किया गया है कि इस कार्यक्रम को पूरा  कर  लेने के बाद  संवेदनाओं  के प्रसार का अनुभव  होने लगता है. कार्यक्रम की  शुरुआत  होती है ध्यान विषयक  उन क्रियाओं के अभ्यास से जिनके केंद्र में स्वानुभव और स्वानुभूति होते हैं. इसके बाद क्रमश: अपनी संवेदनाओं  का प्रसार अपने प्रियजन तक कराया जाता है, और फिर उन्हें अनजान लोगों तक ले जाने का अभ्यास   कराया जाता है. इस कार्यक्रम की अंतिम कड़ी वह होती है जहां उन  लोगों के प्रति संवेदनशील होना सिखाया जाता है जिन्हें  आम तौर पर इस काम के लिए कठिन माना जाता है. इसी तरह का एक कार्यक्रम स्टैनफर्ड  मेडिसिन में भी संचालित होता है. उसकी अवधि आठ  सप्ताह की है और वह कार्यक्रम  सशुल्क है. स्वाभाविक ही है कि दूसरे   बहुत सारे संस्थानों में भी ऐसे कार्यक्रम  संचालित किए जा रहे हैं.

ये कार्यक्रम एक तरफ जहां प्रशिक्षुओं  की संवेदनशीलता   में इजाफा करते हैं वहीं दूसरी तरफ ये उनके  बर्न आउट को भी नियंत्रित कर  उन्हें अधिक सामर्थ्य के साथ अपने कर्तव्य निर्वहन  में  सहायता प्रदान करते हैं.  अमरीका में बाकायदा इस  तरह के कार्यक्रमों के प्रभावों का  अध्ययन भी किया गया है और उनसे ज्ञात हुआ है कि ये कार्यक्रम अपने मकसद को पूरा करने में बहुत सफल रहे हैं. जिन्होने इनमें  भाग लिया  उनकी संवेदनशीलता तो बढ़ी हुई पाई ही गई, खुद वे भी कम अवसादग्रस्त और   मानसिक रूप से अधिक स्वस्थ और सजग पाए  गए.

यह बात निर्विवाद  है कि आज सारी दुनिया में मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ता जा रहा है. इसके बहुत सारे कारण हैं. ऐसे में यह बात आश्वस्तिकारक लगती है  कि जागरूक समाजों में इन स्थितियों का सामना करने के लिए भी निरंतर कोशिशें हो रही हैं और वे कोशिशें काफी हद तक सफल भी साबित हो रही हैं.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 अगस्त, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  
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