Wednesday, December 13, 2017

चुप्पी तोड़ने वाले बने टाइम के पर्सन ऑफ द ईयर

साल के आखिरी माह  में सारी दुनिया बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करती है कि लोकप्रिय पत्रिका टाइम किसे अपना पर्सन ऑफ द ईयर घोषित करती है. इस पत्रिका ने 1927 से इस सिलसिले को शुरु किया था. विचार यह था कि हर बरस किसी ऐसे व्यक्ति नामांकित किया जाए जिसने बीते बरस में सकारात्मक या नकारात्मक किसी भी तरह से ख़बरों को प्रभावित किया हो. शुरुआती बरसों में ये लोग मैन ऑफ द ईयर घोषित करते थे लेकिन 1999 से इस सम्मान का नाम बदल कर पर्सन ऑफ द ईयर कर दिया गया. ज़ाहिर है कि यह बदलाव सारी दुनिया में लैंगिक समानता की बढ़ती जा रही स्वीकृति की परिणति था. इस बरस एक लम्बी प्रक्रिया के बाद किसी व्यक्ति को नहीं अपितु एक समूह को यह सम्मान प्रदान किया गया है. यहीं यह भी स्मरण कर लेना उपयुक्त होगा  कि इस  पत्रिका ने अतीत में भी व्यक्ति की बजाय समूह का चयन किया है. लेकिन इसकी विस्तृत चर्चा थोड़ी देर बाद. अभी तो यह कि टाइम पत्रिका ने यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाली महिलाओं और पुरुषों को साल 2017 के लिए पर्सन ऑफ द ईयर चुना है. टाइम पत्रिका ने इन्हें एक नया नाम दिया है: द साइलेंस ब्रेकर्स यानि चुप्पी तोड़ने वाले. पर्सन ऑफ द ईयर की इस दौड़ में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प दूसरे नम्बर पर रहे हैं.

अक्टोबर माह में न्यूयॉर्क टाइम्स और द न्यूयॉर्कर में एक खोजपरक  रिपोर्ट छपी थी जिसमें कई मशहूर अभिनेत्रियों  ने हॉलीवुड के प्रख्यात निर्माता निर्देशक हार्वी वाइन्सटाइन पर यौन उत्पीड़न के गम्भीर आरोप लगाए थे. इस रिपोर्ट  के बाद तो जैसे अपनी व्यथा-कथा सुनाने वालों की बाढ़ ही आ गई. सारी दुनिया से स्त्रियों ने (और कुछ पुरुषों ने भी) अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न  की घटनाएं उजागर  कीं. टाइम पत्रिका के प्रधान सम्पादक एडवर्ड फेलसेनथाल ने ठीक कहा है कि “यह बहुत तेज़ी से होता हुआ सामाजिक बदलाव है जिसे हमने दशकों में देखा है. इसकी शुरुआत सैंकड़ों महिलाओं और कुछ पुरुषों के व्यक्तिगत साहस से हुई जिन्होंने आगे बढ़कर अपनी कहानियां बयां कीं.”  इस सामाजिक बदलाव को लाने में सोशल मीडिया ने बहुत बड़ी भूमिका अदा की. वहां प्रयुक्त हैशटैग #मी टू दुनिया के 85 देशों में अनगिनत बार इस्तेमाल किया जा चुका है. कुछ लोगों के वैयक्तिक साहस से शुरु हुआ यह अभियान अब जागरण का एक बहुत बड़ा आंदोलन बन चुका है और यह खिताब इस आदोलन की बड़ी स्वीकृति का परिचायक है. लेकिन टाइम की तरफ से यह  भी सही कहा गया है कि अभी यह कहना बहुत कठिन है कि इस आंदोलन का कुल जमा हासिल क्या है. इसका कितना असर  हुआ है और कितना और होगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि कुछ लोगों के अपना सच अनावृत करने से शुरु हुए इस आंदोलन ने लोगों के जीवन यथार्थ को बदलने में कितनी सफलता पाई है. लेकिन आम तौर पर इस चयन का बहुत गर्मजोशी से स्वागत हुआ है. एक सामान कामकाजी अमरीकी महिला डाना लुइस ने कहा कि “मैं अपनी ग्यारह वर्षीया बेटी को दिखाना चाहती हूं कि खुद के लिए भी खड़ा होना चाहिए, भले ही तुम्हें लगे कि पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ़ है. अगर तुम लड़ती  रहोगी तो एक दिन तुम्हें कामयाबी भी ज़रूर हासिल होगी.”  

इस चयन की घोषणा के बाद यही बात बरसों पहले मी टू अभिव्यक्ति  का सृजन करने वाली तराना बर्क और हाल में इसे प्रोत्साहित करने वाली अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने भी अपने अपने साक्षात्कारों में कही है.  तराना बर्क ने कहा कि “मैं तो शुरु से ही यह कह रही हूं कि यह महज़ एक क्षण नहीं, एक आंदोलन है. मेरा खयाल है कि हमारा काम तो अब शुरु हो रहा है. यह हैशटैग एक घोषणा है. लेकिन अब हमें वाकई  उठ खड़ा होना और काम करने लगना है.”  मिलानो ने उनकी हे एबात को जैसे आगे बढ़ाते हुए अपनी रूप्रेखा सामने रखी और कहा, “मैं चाहती हूं कि कम्पनियां अब एक आचार संहिता अपनाएं, कम्पनियां और ज़्यादा औरतों को नौकरियां दें. मैं चाहती हूं कि हम अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दें. हमें इन सब कामों को गति देना है और बतौर स्त्री हम हम सबको एक दूसरी का समर्थन करना है और कहना है कि बहुत हुआ यह सब, अब और नहीं सहेंगी हम.”

अब यह भी जान लें कि टाइम पत्रिका ने सन 1950 में  पहली दफा किसी व्यक्ति की बजाय समूह को यह सम्मान प्रदान किया था. तब यह सम्मान द अमरीकन फाइटिंग मैन  को दिया गया था. इसके बाद 1966 में अमरीकन्स अण्डर 25को, 1975 में अमरीकन वुमननाम से चुनिंदा बारह अमरीकी महिलाओं को,  2002 में द व्हिसलब्लोअर्सको और  2006 में यूयानि हम सबको सामूहिक रूप से यह सम्मान दिया जा चुका है. 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 दिसम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 5, 2017

क्या तकनीक दुनिया की ग़ैर बराबरी को और बढ़ा रही है?

इस बात से शायद ही किसी को असहमति  हो कि आज का समय तकनीक का समय है. जीवन के हर क्षेत्र में तकनीक का न सिर्फ दख़ल है, वो निरंतर बढ़ता भी जा रहा है. इस बात को भी आम तौर पर स्वीकार किया जाता है कि तकनीक ने हमारे जीवन को बेहतर बनाया है. हमारे शारीरिक श्रम में बहुत कमी आई है, हमारी सेहत बेहतर और उम्र लम्बी हुई है और जीवन के लिए सुख सुविधाओं में कल्पनातीत वृद्धि हुई है. हमारे मनोरंजन के साधन बढ़े हैं और ऐसी परिस्थितियां भी उत्पन्न हुई और बढ़ी हैं कि हम इन साधनों का अधिक लाभ उठा पा रहे हैं. लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि सभी लोग ऐसा ही मानते हों. जहां आम लोग तकनीक के फायदों को स्वीकार करते हैं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भविष्य में ज़रा ज़्यादा दूर तक देख पा रहे हैं और हमें आगाह कर रहे हैं कि तकनीक पर हमारी बढ़ती जा रही निर्भरता मानवता के लिए घातक भी साबित हो सकती है.

जो लोग इस तरह की चेतावनियां दे रहे हैं उनके संदेश भी निराधार नहीं हैं. ऐसे ही लोगों में से एक हैं येरूशलम की हीब्रू यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के प्रोफेसर युवल हरारी. युवल हरारी की दो किताबें, ‘सैपियंस: अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ ह्यूमनकाइण्ड और होमो डिअस: अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टुमारो इधर  बेहद चर्चित हैं. युवल हरारी इतिहास के माध्यम से भविष्य को समझने आंकने का प्रयास करते हैं. अपने ऐतिहासिक अध्ययन का सहारा लेकर वे इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि तकनीकी विकास न सिर्फ दुनिया को, पूरी मानव जाति को बदल देगा, लेकिन इसी के साथ वे यह चेतावनी देना भी नहीं भूलते हैं कि इसी तकनीकी विकास की वजह से  मनुष्य मनुष्य के बीच असमानता  की खाई भी चौड़ी होगी. कुछ लोग तकनीक की मदद से बहुत आगे निकल जाएंगे तो कुछ बहुत पीछे  छूट जाएंगे. और यहीं अपनी चेतावनी को वे ऐतिहासिक आधार देते हैं. वे कहते हैं कि मानवता का इतिहास ही असमानता का इतिहास है. हज़ारों बरस पहले भी असमानता थी, आज भी है और आगे भी रहेगी. इतिहास की बात करते हुए वे एक दौर यानि औद्योगिक क्रांति को ज़रूर अपेक्षाकृत समानता के दौर के रूप में याद करते हैं लेकिन भविष्य को लेकर वे बहुत आशंकित हैं.

युवल हरारी जब उदाहरण देकर यह बात बताते हैं कि आज मशीनों पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है और हमारे बहुत सारे काम मशीनों ने हथिया लिये हैं तो उसी स्वर में वे हमारा ध्यान इस बात की तरफ भी खींचते हैं कि जब बहुत सारे कामों के लिए मनुष्यों की ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी तो सरकारों की निगाह में भी तो वे अनुपयोगी हो जाएंगे. सरकारें  भला उनकी परवाह क्यों करेंगी? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि इंसानों की एक ऐसी जमात खड़ी हो जाए जिसकी ज़रूरत न समाज को हो और न देश को हो. अगर ऐसा हुआ तो इस जमात की आवाज़ भी कोई क्यों सुनेगा? इसकी पढ़ाई-लिखाई की, इसकी सेहत की, इसके लिए जीवनोपयोगी सुविधाएं जुटाने की फिक्र भला कोई भी सरकार क्यों करेगी? और यह बात तो हम आज भी देखते हैं कि बहुत सारी जगहों पर सरकार उन पॉकेट्स में ज़्यादा सक्रिय रहती है जहां उसके वोटर्स होते हैं. वे बहुत सारे पॉकेट्स जहां मतदान  के प्रति उदासीन लोग रहते हैं, सरकार की अनदेखी झेलते हैं.

इतिहास का सहारा लेकर हरारी एक और बात कहते हैं जो बहुत भयावह है. वो कहते हैं कि पहले बीमारी और मौत की निगाह में सब लोग बराबर होते थे. लेकिन अब जिसकी जेब में पैसा  है वो तो बीमारी से लड़ कर उसे हरा भी देता है, जिसके पास पैसा नहीं है वो बीमारी के आगे हथियार डालने को मज़बूर है. हरारी एक सर्वे का ज़िक्र करते हैं जिसके मुताबिक अमरीका की बहुत रईस एक फीसदी आबादी की औसत उम्र बाकी अमरीकियों की तुलना में पंद्रह  बरस अधिक है. इसी बात का विस्तार करते हुए वे कहते हैं कि भविष्य में यह भी तो सम्भव है कि पैसों के दम पर कुछ लोग अपनी उम्र और बहुत लम्बी कर लें. सेहमतमंद बने रहना आपकी जेब पर ही निर्भर होता जाएगा. और बात यहीं खत्म नहीं होती है. हरारी चेताते हैं कि यह भी तो सम्भव है कि जिनके पास पैसे हों वे सुपरमैन, सुपरह्यूमन या परामानव बन जाएं. पैसों ने आज शरीर को ताकतवर बनाया है, कल वो मन को भी ताकतवर बना सकता है. सवाल यह है कि अगर यही सिलसिला चला तो क्या सारी  दुनिया दो गैर बराबर  हिस्सों में नहीं बंट जाएगी? ऐसा होना मानवता के लिए ख़तरनाक नहीं होगा? हरारी की बातें चौंकाने वाली लग सकती हैं लेकिन उन पर ग़ौर किया जाना हमारे ही हित में होगा.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 दिसम्बर, 2017 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, November 29, 2017

सेहत के लिए हानिकारक तो है, लेकिन.......

हो सकता है यह बात आपको अविश्वसनीय लगे, लेकिन है प्रामाणिक कि सिगरेट पीने से हर रोज़ कम से कम 1200 अमरीकी यह दुनिया छोड़ जाते हैं. यह संख्या हत्याओं, एड्स, आत्म हत्याओं, ड्रग्स, कार दुर्घटनाओं और शराब की वजह से होने वाली मौतों के योग से ज़्यादा है. लेकिन इसके बावज़ूद वहां सिगरेटों के विज्ञापन और उनकी बिक्री पर प्रभावशाली नियंत्रण नहीं हो पा रहा है. और इसके मूल में है अमरीकी सिगरेट लॉबी की सामर्थ्य. यह लॉबी बहुत महंगे और प्रभावशाली वकीलों की मदद से निरंतर कानूनी व्यवस्थाओं को ठेंगा दिखाने में कामयाब हो जाती है. पिछले बीस बरसों से यह लॉबी एक ही रणनीति पर काम करती है और वह है तीन मोर्चों पर अपना बचाव. ये तीन मोर्चे हैं कानूनी लड़ाई, राजनीति और जन भावनाएं. इस लॉबी के एक गोपनीय दस्तावेज़ से यह बात उजागर हुई है कि इनकी रणनीति यह है कि सिगरेट पर स्वास्थ्य विषयक जो दोषारोपण हों, उन्हें वास्तव में नकारने की बजाय उनके बारे में संदेह पैदा कर दिया जाए. और इस रणनीति में यह लॉबी अब तक कामयाब रही है.

अब से ग्यारह बरस पहले वॉशिंगटन की एक संघीय अदालत नौ माह तक सुनवाई करने के बाद इस नतीज़े पर पहुंची कि “अमरीका के सिगरेट निर्माता जनता को धूम्रपान के खतरों की जानकारी  देने के मामले में छल और धोखाधड़ी करते रहे हैं. वे लोग अपने आर्थिक  लाभ के लिए मानवीय त्रासदी की अनदेखी करते हुए अपने खतरनाक उत्पादों को पूरे जोशो-खरोश के साथ बेचते रहे हैं.” और इसलिए इस अदालत ने अमरीका के चार प्रमुख सिगरेट निर्माताओं को यह आदेश दिया कि वे एक  सुधारात्मक वक्तव्य ज़ारी कर इस बात को  सार्वजनिक रूप से स्वीकार करें कि वे अपने उत्पादों से होने वाली हानि के मामले में जनता को अब तक बेवक़ूफ बनाते रहे हैं और यह जानते हुए भी कि कम टार वाली या लाइट सिगरेटें भी उतनी ही नुकसानदायक हैं, जनता में उनके काल्पनिक लाभों का प्रचार करते रहे हैं. अदालत के आदेशानुसार एक निश्चित तिथि से प्रमुख अखबारों  और टेलीविज़न नेटवर्क्स पर  इस आशय का सुधारात्मक वक्तव्य प्रकाशित-प्रसारित किया जाना शुरु होना था.   यह वक्तव्य एक पूरे साल सप्ताह में पांच बार शाम सात से दस बजे के बीच प्रमुख नेटवर्क्स पर प्रसारित किया जाना था.  यही वक्तव्य पचास अग्रणी अखबारों में भी पूरे पन्ने के विज्ञापन के रूप में लगातार पांच रविवार प्रकाशित किया जाना था. अदालत ने यह भी आदेश दिया कि यह  सुधारात्मक वक्तव्य इस सूचना के साथ प्रकाशित प्रसारित किया जाए कि सिगरेट कम्पनियों ने जानबूझकर अमरीकी जनता को धूम्रपान के ख़तरों से अनभिज्ञ रखा. इस पूरे वक्तव्य के पहले अनिवार्यत: यह भी लिखा जाना था कि यह है सच्चाई!’.

लेकिन असल खेल इसके बाद शुरु हुआ. सिगरेट कम्पनियों ने  इस आदेश के खिलाफ़ अपील की और वे यह अनुमति पाने में कामयाब रहीं कि बजाय उक्त सूचना के वे यह लिखेंगी कि एक संघीय अदालत ने कम्पनियों को यह आदेश दिया है कि वे धूम्रपान के स्वास्थ्य विषयक प्रभावों के बारे में यह वक्तव्य ज़ारी करें. दोनों इबारतों को ध्यान से  पढ़ने पर उनसे मिलने वाले संदेश के अंतर को आसानी से समझा जा सकता है. खतरे को प्रभावमें बदल देने से सारी भयावह गम्भीरता धुंए में उड़ गई है. यही नहीं, अब इस इबारत में सिगरेट उद्योग के उस दीर्घकालीन छलपूर्ण अभियान का कोई ज़िक्र ही नहीं है जिसे माननीय अदालत ने सुधारना चाहा था. यानि अपने वकीलों की काबिलियत के बल पर अति समृद्ध अमरीकी सिगरेट उद्योग अमरीकी जनता की सेहत के साथ बरसों किए गए खिलवाड़ के बारे में न सिर्फ आत्म स्वीकृति करने से बच गया, उसने एक ऐसा नख दंत विहीन वक्तव्य देने की इजाज़त भी प्राप्त कर ली, जो जनता को धूम्रपान के ख़तरों के प्रति तनिक भी आगाह नहीं करता है. यानि कुल मिलाकर हुआ यह कि अदालत ने जो सही काम किया था, उसे यह लॉबी अपने धन बल के दम पर प्रभावहीन कर सकने में सफल हो गई.

वैसे सारी दुनिया के स्वास्थ्य कर्मी और स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब करीब-करीब एकमत हैं कि धूम्रपान सेहत के लिए नुकसानदायक है. कहा तो यह जाता है कि खुद सिगरेट उद्योग भी न सिर्फ इस यथार्थ से परिचित है, अपनी गोपनीय बैठकों में वह इसे स्वीकार  भी करता है, लेकिन उनके व्यावसायिक हित इतने प्रबल हैं कि वह  तमाम तरह के भाषाई छल  छद्म का सहारा लेकर यथार्थ को कुछ इस अंदाज़ में प्रस्तुत करने की अनुमति हासिल कर लेता है कि वह यथार्थ यथार्थ न रहकर निरर्थक शब्दों का खूबसूरत लगने वाला कागज़ी गुलदस्ता मात्र रह जाता है. उनका एकमात्र सरोकार यह है कि धंधा चलता रहे और तिजोरियां भरती रहें.  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत बुधवार, 29 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 21, 2017

पश्चिम ने डिजिटल से किनारा करना शुरु किया

भारतीय टेलीविज़न के बहुत लोकप्रिय कार्यक्रमों में से एक कौन बनेगा करोड़पति के अंत में अमिताभ बच्चन कहते थे, यह डिजिटल का ज़माना है, और फिर वे अपने हाथ में लिये हुए टेबलेट के माध्यम से विजेता को आनन-फानन में उसकी जीती हुई धन राशि ट्रांसफर कर देते थे. भारत सरकार ने भी डिजिटलीकरण पर काफी ध्यान दिया है. और इतना ही  क्यों, हम सबकी ज़िंदगी में काफी कुछ डिजिटल हो गया है. पश्चिम से आई इस नई तकनीक ने शुरु-शुरु में अपने नएपन से हमें आकर्षित किया, हालांकि अनेक आशंकाएं भी इसने जगाईं, और फिर आहिस्ता-आहिस्ता इसकी सुगमता, तेज़ी और कम खर्च बालानशींपन ने हम सबको अपना मुरीद बना लिया. आज हालत यह है कि हमारी ज़िंदगी का शायद ही कोई पक्ष ऐसा बचा हो जिसमें डिजिटल का प्रवेश न हो चुका हो.

लेकिन बहुतों को शायद यह बात अविश्वसनीय भी लगे, लेकिन है सच, कि जिस पश्चिम से यह डिजिटल आंधी हमारी ज़िंदगी में आई है उसी पश्चिम ने अब डिजिटल से दूरी बनाना शुरु कर दिया है.  अमरीका में हाल में ऐसी अनेक किताबें बाज़ार में आई हैं जिनमें डिजिटल तकनीक के हानिप्रद प्रभावों पर सप्रमाण और विस्तार से चर्चा की गई है. इन किताबों में यह चर्चा भी है कि कैसे स्मार्टफोन्स हमारे बच्चों की मानसिकता को विकृत कर रहे हैं और सोशल मीडिया किस तरह हमारी प्रजातांत्रिक संस्थाओं को क्षति पहुंचा रहा है. वहां इस बात की भी चर्चाएं हैं कि डिजिटल तकनीक एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को पुष्ट करती हैं. हाल में अमरीका में हुए एक सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई है कि लगभग सत्तर प्रतिशत अमरीकी डिजिटलीकरण के कारण हुए कामकाज के यंत्रीकरण से रोज़गार के अवसरों पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर से चिंतित हैं. मात्र इक्कीस प्रतिशत  अमरीकी फेसबुक को दी जाने वाली  अपनी व्यक्तिगत जानकारियों की गोपनीयता के प्रति आश्वस्त पाए गए और लगभग आधे उत्तरदाता यह मानते  पाए गए कि सोशल मीडिया हमारी मानसिक और शारीरिक सेहत पर बुरा असर डालता है. इस बात की पुष्टि अमरीकी साइकीऐट्रिक एसोसिएशन ने भी कर दी.

और बातें केवल फिक्र करने तक ही सीमित नहीं हैं.  अपने देश में जहां हम हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि ई बुक्स का चलन बढ़े, अमरीकी प्रकाशकों के संघ के अनुसार यह लगातार तीसरा बरस है जब अमरीका में पारम्परिक मुद्रित किताबों की बिक्री में वृद्धि नोट की गई है. यही नहीं वहां किताबों की दुकानें भी पिछले कई सालों से बढ़ती जा रही हैं. और बात सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं है. भारत में चलन से करीब-करीब बाहर हो चुकीं विनाइल वाली एलपी रिकॉर्ड्स का चलन वहां बढ़ता जा रहा है और बताया जाता है कि अकेले अमरीका में हर सप्ताह कोई दो लाख विनाइल रिकॉर्ड्स बिक रही हैं. फिल्म वाले कैमरे, कागज़ की बनी नोटबुक्स, बोर्ड गेम्स आदि भी पहले से ज़्यादा खरीदे जाने लगे हैं.

संशयालु लोग कह सकते हैं कि यह सब पुराने के प्रति मोह यानि नोस्टाल्जिया की वजह से हो रहा है. लेकिन यही सच नहीं है. सच यह भी है कि बावज़ूद इस बात के कि डिजिटल सामग्री बहुत सस्ती होती है, लोग किताबों की तरफ इसलिए लौट रहे हैं कि उन्हें लगने लगा है कि किताब हाथ  में लेकर उसके स्पर्श, उसकी गंध, उसकी ध्वनि आदि का जो मिला-जुला अनुभव  आप पाते हैं वह डिजिटल में मुमकिन ही नहीं है. किसी किताब  को आप खरीद, बेच और भेंट में दे सकते हैं, उसके बहाने दोस्ती कर सकते हैं, और अगर पुरानी हिंदी फिल्मों को याद करें तो किताबों में ख़तों का आदान-प्रदान कर मुहब्बत तक कर सकते हैं. यह सुख डिजिटल में कहां?  इतना ही नहीं, गूगल जैसी अग्रणी और भविष्यवादी कम्पनी में भी  पिछले कई बरसो से यह रिवायत है कि वेब डिज़ाइनर्स को अपने किसी भी नए प्रोजेक्ट की पहली योजना कागज़ पर कलम से ही बनानी होती है. कम्पनी का सोच यह है कि स्क्रीन पर काम करने की तुलना में इस तरह से अधिक और बेहतर नए विचार उपजते हैं.

पश्चिम में डिजिटल से पीछे हटने के पक्ष में कुछ और बातों पर भी ध्यान दिया जाने लगा है, जैसे यह कि इससे संचालित सोशल मीडिया में बुरी भाषा का जितना प्रयोग होने लगा है वैसा प्रयोग पारम्परिक माध्यमों में नहीं होता है. इस बात को तो अब पूरी तरह स्वीकार कर ही लिया गया है कि डिजिटल माध्यम मानवीय सम्पर्क के खिलाफ़ जाते हैं, जबकि हमारी बेहतरी के लिए मानवीय सम्पर्कों का होना बेहद ज़रूरी हैं. लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद  यह बात सभी स्वीकार करते हैं कि डिजिटल का पूरी तरह त्याग मुमकिन नहीं है. इसलिए अब एक ही विकल्प बचा है और वह यह कि इसका इस्तेमाल विवेकपूर्वक किया जाय और इसके अतिप्रयोग  से बचा जाए. पश्चिमी देश इसी दिशा में  प्रयासरत हैं.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्ग्त मंगलवार, 21 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 14, 2017

लाओ, तुम्हारा कचरा हम खरीद लेते हैं!

अगर मैं बग़ैर किसी भूमिका के आपसे यह कहूं कि दुनिया में कम से कम एक देश ऐसा है जिसका संकट हमारी कल्पना से भी परे है, तो निश्चय ही आप चौंक जाएंगे. मैं बात कर रहा हूं एक करोड़ से कम आबादी वाले स्कैण्डिनेवियाई देश स्वीडन की. यह देश आजकल एक बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है, और संकट यह है कि इसके पास कूड़े की इतनी भीषण कमी हो गई है कि इसे अपने पड़ोसी देशों की ओर याचना भरी निगाहों से देखना पड़ रहा है. लेकिन इस बात में एक पेच और है. स्वीडन के पास कूड़े की कमी है, लेकिन यह देश पड़ोसी देशों से कूड़ा खरीद नहीं रहा है. उल्टे वे देश अपना कूड़ा लेने के उपकार के बदले स्वीडन को भुगतान कर रहे हैं. है ना ताज्जुब की बात!

दरअसल स्वीडन ने अपने कूड़े को बरबाद न कर उसको जलाकर अपने रीसाइक्लिंग संयंत्रों को  धधकाए रखने का एक बेहद कामयाब और प्रभावशाली तंत्र विकसित कर लिया है और इस तंत्र के कारण देश की आधी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं. यहीं यह भी जान लें कि स्वीडन के कचरे का महज़ एक प्रतिशत ही है जो अनुपयोगी रहकर अपशिष्ट भराव क्षेत्रों में डाला जाता है. पिछले कुछ बरसों में स्वीडन ने अपनी राष्ट्रीय रीसाइक्लिंग नीति को इतना मुकम्मल बना लिया है कि बहुत सारी निज़ी कम्पनियां अपशिष्ट पदार्थों का संग्रहण कर उसे जलाकर जो ऊर्जा उत्पन्न करती है वह एक केंद्रीय हीटिंग नेटवर्क के माध्यम से ठिठुरते हुए मुल्क को सुखद ऊष्मा प्रदान करती है. स्वीडन ने 1991 से ही  से जीवाश्म ईंधन पर भारी कर लगाकर उसके प्रयोग को हतोत्साहित करने की नीति लागू कर रखी है. वहां की सरकार ने लोगों को इस बात के लिए भी पूरी तरह शिक्षित और प्रशिक्षित कर दिया है कि वे किसी भी किस्म का कचरा बाहर फेंकने की बजाय उसे रीसाइक्लिंग के लिए दे दिया करें. न सिर्फ इतना, स्वीडन की नगरपालिकाओं ने कचरा संग्रहण का काम भी इतना व्यवस्थित और सुगम कर दिया है कि उसके लिए  कम से कम श्रम और  प्रयत्न करना होता है. वहां की  रिहायशी  इमारतों में स्वचालित वैक्यूम सिस्टम लगा दिये गए हैं जिसके कारण कचरे के संग्रहण और उसे एक से दूसरी जगह ले जाने पर होने वाले खर्च में भी भारी कमी आ गई है. अब हालत यह हो गई है कि स्वीडन का सारा कचरा ऊर्जा पैदा करने में प्रयुक्त हो जाता है लेकिन स्वीडन ने कचरा जलाने के जो संयंत्र अपने देश में लगाए हैं उनकी क्षमता  इतनी ज़्यादा है कि उन्हें चलाए रखने के लिए स्वीडन का अपना कचरा कम पड़ रहा है. 

ऐसे में कुछ पड़ोसी देशों, विशेषकर नॉर्वे और इंगलैण्ड  से  कचरा आयात करके इन संयंत्रों को कार्यरत रखना पड़  रहा है. विदेशों से स्वीडन जो कचरा आयात करता है उसकी मात्रा में लगातार वृद्धि होती जा रही है. सन 2005 से अब तक यह  वृद्धि चार गुना हो  चुकी है. माना जाता है कि अभी लगभग 900 ट्रक कूड़ा प्रतिदिन आयात किया जा रहा है.   लेकिन इसमें भी मज़ेदार बात यह है कि क्योंकि स्वीडन के आस-पास के यूरोपीय यूनियन के अधिकांश देशों में लोगों को अपने कचरे को घर से बाहर डालने पर भारी जुर्माना अदा करना होता है, अत: ये देश उससे कम राशि स्वीडन को चुका कर अपने कचरे से निजात पा रहे हैं. इस तरह उन देशों को तो अपने कचरे से मुक्ति मिल ही रही है, स्वीडन भी जलाने योग्य कचरे की कमी के अपने संकट से मुक्ति पाने के साथ-साथ  कमाई भी कर  रहा है. स्वीडन की यह रीसाइक्लिंग नीति उसके पड़ोसी देशों के लिए भी अनुकरणीय साबित हो रही है लेकिन वे अभी तक कामयाबी के उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाये हैं जो स्वीडन हासिल कर चुका है. मसलन, ब्रिटेन ने एक रीसाइक्लिंग नीति तो बना ली है लेकिन वह इतनी जटिल है कि वहां के नागरिक हमेशा भ्रमित ही रहते हैं.

लेकिन इससे यह न समझ लिया जाए कि स्वीडन अपनी व्यवस्थाओं से पूरी तरह संतुष्ट है. अब वहां इस बात पर विमर्श चल  रहा है कि संग्रहीत कचरे को जलाने की बजाय उसकी ठीक से छंटाई  कर उसे समुचित तरह से  रीसाइकल किया जाए ताकि कार्बन डाई ऑक्साईड के उत्सर्जन में कमी लाई जा सके. उल्लेखनीय है कि अभी 85 से 90 प्रतिशत कचरे को ऊर्जा उत्पादन के लिए जलाया जाता है और इस प्रक्रिया में काफी सीओ2 उत्सर्जन होता है.  


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 14 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, November 10, 2017

पेरू में सौंदर्य प्रतियोगिता में उठी स्त्री हक़ की आवाज़

लातिन अमरीकी देशों में पेरू का एक विशेष स्थान है. मात्र 31.77 मिलियन की आबादी वाले इस देश ने अपनी आर्थिक नीतियों के सफल क्रियान्वयन से पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की है. पिछले एक दशक में इस देश ने अपनी गरीबी की दर को घटा कर आधा कर लिया  है और इससे यहां के सत्तर लाख लोग जो कि आबादी का 22 प्रतिशत हैं, गरीबी से उबर चुके हैं.  लेकिन हाल में इस देश का नाम एक और वजह से सुनने को मिला. यह प्रकरण भी मिसाल पेश करने का ही है. यहां एक सौंदर्य प्रतियोगिता आयोजित होती है जिसमें पेरू सुंदरी (मिस पेरू) का चयन किया जाता है.

दुनिया के और बहुत सारे देशों की ही तरह पेरू में भी सौंदर्य प्रतियोगिताओं का एक सुनिश्चित तौर-तरीका है. अन्य बहुत सारे चयन उपक्रमों से गुज़रने के बाद चुनिंदा सुंदरियों को एक कतार में खड़ा किया जाता है और फिर उनमें से एक-एक करके आगे आती है और अपनी  देह के माप (वक्ष-कटि,नितम्ब) के आंकड़े उपस्थित विशिष्ट दर्शक समुदाय के सामने प्रस्तुत करती हैं. पेरू का यह समारोह वहां के राष्ट्रीय टीवी नेटवर्क पर भी सजीव प्रसारित होता है और इस बार के प्रसारण के लिए कहा जाता है कि वह वहां के सर्वाधिक देखे जाने वाले कार्यक्रमों में से एक था.

सब कुछ बहुत व्यवस्थित तरीके से चल रहा था. दर्शक भी शाम का भरपूर आनंद ले रहे थे. तभी सुंदरियों के माइक पर आने की घोषणा हुई और पहली सुंदरी ने आकर कहा, “मेरा नाम है कैमिला केनिकोबा. मैं लीमा का प्रतिनिधित्व कर रही हूं. मुझे यह बताना है कि मेरे देश में पिछले नौ बरसों में भ्रूण हत्या के 2202 केस दर्ज़ हुए हैं.” जो लोग 32-26-33 जैसे आंकड़े सुनने की  उम्मीद कर रहे थे उन्हें एक झटका तो लगना ही था. वे इस झटके से उबर पाते उससे पहले दूसरी सुंदरी माइक पर आई, और बोली: “मेरा नाम है कारेन क्यूटो और मैं लीमा का प्रतिनिधित्व करती हूं. मुझे यह बताना है कि मेरे देश में इस बरस 82 भ्रूण हत्याएं हुई हैं और 156 भ्रूण हत्याओं के प्रयास हुए हैं.” और इसके बाद तो जैसे एक सिलसिला ही बन गया. “अलमेंन्द्रा मेरोक़ुइन के  अभिवादन स्वीकार कीजिए. मैं कैनेट से हूं और बताना चाहती हूं कि 25 प्रतिशत लड़कियों और किशोरियों के साथ उनके स्कूलों में बदसुलूकी होती है.” बेल्जिका गुएरा ने कहा, “मुझे यह बताना है कि विश्वविद्यालयों की 65 प्रतिशत युवतियों के साथ उनके साथी ही बदसुलूकी करते हैं.”  और फिर आई रोमिना लोज़ानो: “मेरा आंकड़ा यह है कि सन 2014 से अब तक 3114 स्त्रियां अनुचित  बर्ताव की शिकार हुई हैं.” रोमिना को इस प्रतियोगिता की विजेता घोषित किया गया और वे इसी माह लास वेगस में आयोजित होने वाले मिस यूनिवर्स पेजेण्ट में अपने देश की नुमाइंदगी करेंगी.

बेशक प्रतियोगी युवतियों का यह कदम आकस्मिक नहीं, पूर्व नियोजित था. इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि जब ये सुंदरियां अपने आंकड़े प्रस्तुत कर रही थीं तब नेपथ्य में एक स्क्रीन पर अखबारों में छपी इसी तरह की खबरों की कतरनें दिखाई जा रही थीं. ज़ाहिर है कि ऐसा बिना पूर्व तैयारी के मुमकिन नहीं था. बाद में यह बात सामने आ भी गई कि इन युवतियों ने आयोजकों की सहमति से ही यह किया था. वैसे, पेरू में स्त्रियों  के खिलाफ हिंसा एक विकट समस्या मानी जाती है, और पिछले अगस्त में राजधानी लीमा में इसके खिलाफ एक बड़ा प्रदर्शन भी  हो चुका है. असल में तब घरेलू हिंसा का एक हाई प्रोफाइल मामला खूब  चर्चित रहा था जिसमें  एक वकील को उसका पूर्व बॉय फ्रैण्ड होटल के रिसेप्शन पर बालों से खींचता हुआ दर्शाया गया था. यह प्रदर्शन इतना ज़ोरदार था कि टाइम पत्रिका ने इसे अपने चुनिंदा सौ की सूची में शामिल किया था. तब से अनेक बार पेरू में स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ें उठती रही हैं.

इस प्रतियोगिता के समापन खण्ड में हर प्रतियोगी के सामने यह सवाल रखा गया कि वे अपने स्तर पर स्त्रियों के खिलाफ़ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए क्या करना चाहेंगी. इस सवाल के जवाबों के दौरान जहां यह बात सामने आई कि हर प्रतियोगी स्त्री के खिलाफ बदसुलूकी को बहुत गम्भीरता से लेती है, अनेक मौलिक और उपयोगी सुझाव भी सामने आए. इस कार्यक्रम के दर्शकों का खयाल है कि भले ही सौंदर्य प्रतियोगिताएं स्त्री को एक वस्तु के रूप में पेश करती हैं और इनका अपना व्यावसायिक एजेण्डा  होता है, इन्हें बहुत बड़ा समुदाय रुचि पूर्वक देखता है और इसलिए इस मंच से स्त्री पर होने वाले अत्याचारों-अनाचारों  का मुखर विरोध जन चेतना जगाने के लिहाज़ से बहुत महत्व रखता है. सौंदर्य प्रतियोगिता में आयोजकों की सहमति से इस तरह का प्रतिरोध कर पेरू की सुंदरियों ने पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की है, और इस मिसाल को  सर्वत्र सराहा जा रहा है.  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत शुक्रवार, 10 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 31, 2017

जनसंख्या की कमी से जूझ रहा है इटली

जब भी अपने देश की समस्याओं की चर्चा होती है, बात घूम फिरकर इस बिंदु पर आ टिकती है कि हमारे देश की आधारभूत समस्या इसकी विशाल जनसंख्या है. आज़ादी के बाद अनेक प्रकार से जनसंख्या को नियंत्रित करने का प्रयास हुए हैं और उन प्रयासों को कामयाबी भी मिली है लेकिन देश के संसाधनों के अनुपात में जनसंख्या इतनी अधिक है कि वे प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे वाली कहावत को चरितार्थ करने से आगे नहीं बढ़ पाते हैं. इस बात का उल्लेख करते हुए अगर मैं आपसे कहूं कि एक देश ऐसा भी है जो हमसे एकदम उलट समस्या से जूझ रहा है, तो क्या आप मेरी बात पर विश्वास करेंगे? इटली का नाम तो आपने सुना ही है.  पिछले कई दशकों से यह देश निरंतर घटती हुई जनसंख्या से त्रस्त है. इस देश में और विशेष रूप से इसके ऐतिहासिक महत्व के छोटे शहरों में जनसंख्या इतनी कम होती जा रही है कि वहां के प्रशासकों को अनेक अजीबोगरीब नुस्खे आजमाने पड़ रहे हैं! इटली की सरकार ने अपने मुल्क के बहुत सारे छोटे लेकिन खूबसूरत शहरों को सप्ताहांत  के आमोद-प्रमोद के लिए आदर्श ठिकानों के रूप में प्रचारित करना शुरु किया है. मात्र बारह स्थायी निवासियों वाला लाज़ियो ऐसा ही एक शहर है.  प्रचार का सुपरिणाम यह हुआ है कि पहले जहां इस शहर को देखने मात्र चालीस हज़ार लोग आते थे, अब उनकी संख्या बढ़कर आठ लाख प्रतिवर्ष हो गई है. कुछ शहरों के पुराने घरों  को होटलों में तब्दील कर पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाया जा रहा है. कुछ शहर ऐसे भी हैं जो विज्ञापन देकर शरणार्थियों को अपने यहां बुला  रहे हैं. कैलाब्रिया नामक एक शहर ने तो बाकायदा यह घोषित कर दिया है कि शरणार्थी ही इटली की अर्थव्यवस्था का भविष्य हैं. यानि मंज़र कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा हम लोग अपने देश में कस्बों के बस स्टैण्डों पर देखते हैं जहां टैक्सी वाले यात्रियों को खींच खांचकर अपनी गाड़ियों में ठूंसने की कोशिश में लगे रहते हैं.

इसी इटली का एक बहुत छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत शहर है कैण्डेला. अपनी दिलकश इमारतों और ऐतिहासिक किलों के लिए सुविख्यात इस शहर को पर्यटक और स्थानीय निवासी लिटिल नेपल्स कहकर गर्वित हुआ करते थे. यह याद दिलाने की ज़रूरत नहीं है कि नेपल्स जिसे इतालवी में नेपोलि बोला जाता है इटली का तीसरा सबसे बड़ा शहर है और दक्षिण-पश्चिमी तट पर बसा है.  यह एक यूनानी उपनिवेश हुआ करता था जो ईसा पूर्व चौथी सदी में रोमन साम्राज्य  का अंग बन गया था. फिर यह  रोमनों के पतन के बाद जर्मन और इसके बाद सोलहवीं सदी में स्पेन के शासनाधीन रहा. इस शहर की ख्याति इसके भव्य स्थापत्य  और कलात्मक वैभव के लिए रही है.  यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता दे रखी है. तो, नब्बे के दशक में इस कैण्डेला शहर की आबादी लगभग आठ हज़ार थी लेकिन निरंतर गिरती जा रही अर्थ व्यवस्था और घटते जा रहे नौकरी के अवसरों के कारण ज़्यादातर युवा इस शहर को छोड़कर अन्यत्र जा बसे  और शहर की आबादी घटकर मात्र दो हज़ार सात सौ रह गई है. इस आबादी में वृद्धजन ज़्यादा हैं. जनसंख्या की इस कमी का असर शहर की अर्थव्यवस्था और समग्र परिवेश पर भी पड़ा है. और इसी से चिंतित होकर कैण्डेला के मेयर ने एक ऐसी घोषणा की है जो कम से कम हमारे लिए तो बेहद चौंकाने वाली है. मेयर निकोला गट्टा ने दूसरी जगहों  से आकर इस शहर में बसने वालों के लिए नकद प्रोत्साहन राशि  देने की घोषणा की है. उनकी घोषणा के अनुसार सिंगल्स को इस शहर में आकर रहने पर 800 यूरो (भारतीय मुद्रा में लगभग  61 हज़ार रुपये), कपल्स को 1200 यूरो (92 हज़ार रुपये) और परिवार के साथ आने वालों को 2000 यूरो (करीब डेढ़ लाख रुपये) दिये जाएंगे. वैसे कैण्डेला  के मेयर ने हाल में  जैसी घोषणा की है वैसी घोषणा बोर्मिडा के मेयर पहले ही कर चुके हैं. उन्होंने अपने शहर में आ बसने वालों को दो हज़ार यूरो देने की घोषणा की थी, लेकिन उस घोषणा पर लोग इतनी  भारी संख्या में टूट पड़े कि मेयर महोदय को अपनी घोषणा वापस लेनी पड़ी. शायद इस प्रकरण से सबक लेते हुए कैण्डेला के मेयर महोदय ने अपनी घोषणा के साथ ये शर्तें भी जोड़ दी हैं कि ये लाभ तभी देय होंगे जब कोई इस शहर का स्थायी बाशिंदा बनने के लिए वचनबद्ध होगा, यहां एक मकान किराये पर लेगा और उसकी सालाना आमदनी कम से कम साढे सात  हज़ार यूरो होगी. इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए छह परिवार अब तक यहां आ चुके हैं और पांच अन्य परिवार आने की प्रक्रिया में हैं. उम्मीद और कामना की जानी चाहिए कि कैण्डेला शहर अपना खोया वैभव फिर से प्राप्त कर लेगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 31 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 24, 2017

किस्सा विकट संगीत प्रेमियों और उनसे त्रस्त नागरिकों का

क्या किसी संगीत-प्रेमी युगल का अपनी मोटर कार में स्टीरियो बजाना इतना बड़ा मुद्दा है कि अदालत को अपना कीमती वक़्त खर्च करते हुए उससे जिरह करनी पड़े और आखिरकार हस्तक्षेप करने को बाध्य होना पड़े? हाल में कनाडा के एक  शहर में जो कुछ घटित हुआ उससे तो यही लगता है कि यह मामला बहुत साधारण और नज़र अंदाज़ करने काबिल नहीं है. इस शहर में रहता है एक चौबीस वर्षीय युवा जिसका नाम है डस्टिन हैमिल्टन. डस्टिन न केवल संगीत प्रेमी है ध्वनि तकनीक का भी विशेषज्ञ है. उसने संगीत का बेहतरीन लुत्फ़  लेने के लिए अपनी क्रूज़र गाड़ी को आधुनिकतम ध्वनि उपकरणों से सज्जित कर रखा है. इस तकनीक में उसकी विशेषज्ञता का आलम यह है कि एक ऑटो साउण्ड प्रतियोगिता में उसे स्वर्ण  पदक तक मिल चुका है.  हैमिल्टन एक ख़ास किस्म के हड्डियों के रोग से ग्रस्त है जिसकी वजह से उसकी रीढ़ की हड्डी को गहरी क्षति पहुंची है. लेकिन यह पदक उसे इतना धिक प्रिय है कि तमाम असुविधाओं के बावज़ूद वो हमेशा इस पदक को अपने गले में लटकाए रहता है. डस्टिन वैंकूवर के सेण्ट्रल सानिच शहर में रहता है. उसकी गर्लफ्रैण्ड कैटरीना भी उसके साथ रहती है और संगीत से उसे भी बहुत गहरा लगाव है.

दरअसल डस्टिन और कैटरीना को बहुत ऊंची आवाज़ में संगीत सुनने का शौक है. कहा जाता है कि जब वे अपनी गाड़ी लेकर  निकलते हैं तो उससे निकलने वाली संगीत की ध्वनियां  इतनी ज़बर्दस्त होती हैं कि आस-पास के घरों के फर्श थरथराने लगते हैं, घरों की दीवारों पर लटकी तस्वीरें कांपने लगती हैं, टेबल पर रखे कॉफी मग नीचे गिर पड़ते हैं और घरों में रह रहे पालतू जानवर भयभीत हो उठते हैं. अगर रात का वक़्त हो तो डर के मारे गहरी नींद में डूबे बच्चों की चीखें निकल पड़ती हैं. और यह सब रोज़मर्रा की बातें होती हैं. स्वाभविक ही है कि इससे उस शहर के बाशिंदे परेशान हैं. हैमिल्टन  के घर से उनके दफ्तर के बीच रहने वाले नागरिक पिछले कुछ ही समय में उनके खिलाफ कम से कम सत्रह शिकायतें पुलिस में दर्ज़ करवा चुके हैं. इन शिकायतों पर गौर करते हुए स्थानीय पुलिस ने दो बार इस युगल को चेतावनी भी दी कि वे अपनी गाड़ी के साउड सिस्टम का वॉल्यूम धीमा रखा करें, लेकिन जब इन चेतावनियों का उन पर कोई असर नहीं हुआ तो पुलिस को उन्हें पाबंद करना पड़ा कि वे अपनी गाड़ी में स्टीरियो बजाएं ही नहीं. हैमिल्टन इस आदेश से सहमत नहीं था इसलिए वो अदालत में पेश हुआ और जब उससे पूछा गया कि उसे अदालती आदेश मानने में क्या दिक्कत है तो उसका कहना था कि संगीत से उसे बेपनाह मुहब्बत है, वो जो कुछ भी करता है संगीत के लिए ही करता है. असल में संगीत ही उसका जीवन है. उसने अदालत को यह भी बताया कि सैंकड़ों घण्टों की मेहनत से उसने अपनी गाड़ी में यह साउण्ड सिस्टम  फिट किया है और इस सिस्टम को खरीदने के लिए उसे अपनी गर्लफ्रैण्ड की सारी जमा पूंजी भी खपा देनी पड़ी है. ऐसे में संगीत न सुनने का आदेश भला वो कैसे मान सकता है? अदालत ने उससे यह भी अनुरोध किया कि वो दफ़्तर जाने का अपना रास्ता बदल ले ताकि उस इलाके के बाशिंदों  की शिकायत दूर हो सके. यहीं यह भी याद दिलाता चलूं कि इसी सोच के तहत उसकी गर्लफ्रैण्ड अपनी एक नौकरी छोड़ कर दूसरी नौकरी करने लगी है ताकि वह हैमिल्टन के साथ ही काम पर  जा सके.

पुलिस ने हैमिल्टन और कैटरीना के इस विकट संगीत प्रेम पर रोक लगाने के लिए अदालत के सामने एक और तर्क रखा है  जो खासा वज़नदार है.  पुलिस का कहना है कि इन लोगों की गाड़ी से निकलने वाले संगीत की तेज़ आवाज़ से वहां के बाशिंदे इतने ज़्यादा त्रस्त हैं कि वे लोग अब इनकी गाड़ी का पीछा तक करने लगे हैं. पुलिस को डर है कि कहीं ऐसा न हो कि हैमिल्टन और कैटरीना उन लोगों के हत्थे चढ़ जाए और वे लोग इन्हें कोई गम्भीर शारीरिक क्षति पहुंचा दें. यानि पुलिस ने इन लोगों की सुरक्षा का तर्क देते हुए भी इनके संगीत प्रेम पर नियंत्रण लगाने का अनुरोध किया है.

अब देखना है कि अगली पेशी पर अदालत किसके हक़ में फैसला सुनाती है! फिलहाल हैमिल्टन और कैटरीना अपने संगीत प्रेम पर अटल और अविचलित हैं. कैटरीना कहना है कि वो दस बरस से इस इलाके में रह रही है और उसे तेज़ आवाज़ में ही संगीत सुनने का आदत है, जबकि हैमिल्टन इस सारे विवाद को  बेहूदा करार देते हैं और अपनी कार को उस इलाके की सबसे उम्दा सांगीतिक कार बताते हुए कहते हैं कि इससे निकलने वाला संगीत उन्हें किसी सिम्फ़नी जैसा लगता है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 10, 2017

जब बाज़ार में आने को थी बच्चे पालने वाली मशीन

कुछ माह पहले जानी-मानी खिलौना निर्माता कम्पनी मैटल ने घोषणा की थी कि वो बहुत जल्दी एक बेबी सिटर किस्म का उपकरण ज़ारी करेगी जो कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशयल इण्टेलीजेंस- एआई) पर आधारित होगा. कम्पनी के अनुसार एरिस्टोटल (अरस्तू) नामक यह उपकरण ध्वनि नियंत्रित एक स्मार्ट शिशु मॉनिटर के रूप में डिज़ाइन किया जा रहा था. इस उपकरण का घोषित मकसद था माता-पिताओं को शिशुओं के संरक्षण, सुरक्षा और लालन पालन में मदद करना. लेकिन कम्पनी इस उपकरण को ज़ारी कर पाती उससे पहले ही अमरीका में बहुत सारे स्वैच्छिक संगठन और राजनेता इस उपकरण के विरोध में एकजुट हो गए और उनका दबाव इतना प्रबल रहा कि अंतत: कम्पनी को यह घोषणा करनी पड़ी कि वो इस उपकरण को बाज़ार में उतारने का अपना इरादा छोड़ चुकी है.

प्रारम्भ में कम्पनी ने कहा था कि यह उपकरण शिशुओं को बाल कथाएं और लोरियां सुनाएगा और ज़रूरत पड़ी तो उन्हें वर्णमाला भी सिखाएगा. इतना ही नहीं, अगर शिशु रात को रोया तो उसे चुप भी कराएगा. स्वाभाविक रूप से उपकरण के ये उपयोग आकर्षक थे.  लेकिन बाद में यह बात मालूम पड़ी कि इसमें बेबी मॉनिटर के रूप में एक कैमरा लगा होगा जो शिशु की गतिविधियों और उसके परिवेश को रिकॉर्ड करेगा. इतना ही नहीं यह बात भी सामने आई कि इन सबके आधार पर यह उपकरण बच्चों के काम आने वाली उपभोक्ता सामग्री जैसे मिल्क पाउडर, डायपर वगैरह के लिए उपलब्ध डील्स और कूपन्स की जानकारी प्रदान करने के साथ चेतावनी भी देगा कि घर में शिशु के काम की अमुक सामग्री का स्टॉक चुकने को है. शायद यही व्यावसायिक पहलू था जिसने अमरीका स्थित निजता के लिए चिंतित एक्टिविस्टों और विशेष रूप से एक अलाभकारी संगठन कमर्शियल फ्री चाइल्डहुड के कान खड़े किए. अपनी पड़ताल के बाद उन्होंने  इस उपकरण के विरोध में पंद्रह हज़ार लोगों के हस्ताक्षर जुटाये और  दो-टूक लहज़े में कहा कि “यह एरिस्टोटल कोई नैनी नहीं बल्कि एक घुसपैठिया है. हम चाहते हैं कि शिशुओं के कमरे कॉर्पोरेट जासूसी से बचे रहें”. इस संगठन की आपत्ति को ही आगे बढ़ाते हुए सीनेटर एडवर्ड जे मारके और रिप्रेजेण्टेटिव जोए बार्टन सहित अमरीका के बहुत सारे राजनीतिज्ञों ने भी इस बात पर सवाल खड़े किए कि यह  उपकरण जो डेटा एकत्रित करेगा उसका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा और उसे किस तरह सुरक्षित रखा जाएगा?

एरिस्टोटल के इस विरोध के अलावा भी दुनिया के बहुत सारे देशों में समझदार लोग बाज़ार में उतारी जाने वाली स्मार्ट डिवाइसेज़ के बच्चों  पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को लेकर चिंतित  हैं. उनका सोच है कि इस तरह के उपकरण बच्चों के भावनात्मक विकास में रुकावट डालते हैं. कुछ और लोगों की आपत्ति यह भी है कि इस तरह के  उपकरण बच्चों के अपने अभिभावकों से मानवीय सम्बंधों को विस्थापित कर उसकी जगह तकनीक से उनका रिश्ता कायम करने का ख़तरनाक काम करते हैं. इसी आपत्ति को एक जाने-माने शिशु रोग विशेषज्ञ ज़ेनिफर राडेस्की ने अपने एक लेख में यह कहते हुए बल प्रदान किया कि “इस तकनीक के बारे में निजता के महत्वपूर्ण मुद्दे के अलावा मेरी मुख्य चिंता इस बात को लेकर है कि जब कोई शिशु रोएगा, खेलना या कुछ सीखना चाहेगा  तो तकनीक का एक टुकड़ा उसकी आवाज़ सुनने वाला घर का सबसे ज़िम्मेदार और उत्तरदायी सदस्य बनकर उभरेगा.यंत्र द्वारा मनुष्य को विस्थापित कर देने के इस ख़तरे को कम करके नहीं देखा जाना चाहिए.

इसी के साथ यह याद कर लेना भी उपयुक्त होगा वॉइस एक्टिवेटेड इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के दुष्प्रभाव सारी दुनिया में चिंता का कारण बनते जा रहे हैं. बहुत सारे अध्ययन हुए हैं जो बताते हैं कि अब तो बच्चे रोबोट्स को दिमागी समझ रखने वाला  सामाजिक प्राणी तक मानने लगे हैं और उनसे ऐसा बर्ताव करने लगे हैं जैसे वे मानवीय प्राणी हों. बहुत सारे मां-बाप यह भी चिंता करने लगे हैं कि नए ज़माने के स्मार्टफोन्स और टेबलेट्स आवाज़ के निर्देश पर काम करने की अपनी तकनीक की वजह से उनके बच्चों के साथ बहुत कम उम्र में ही घनिष्ट रिश्ता कायम करने लगे हैं. एक बड़ी कम्पनी द्वारा बाज़ार में उतारे गए आवाज़ के निर्देशों पर संचालित होने वाले एलेक्सा नामक उपकरण के उपयोग के प्रभावों का अध्ययन करने वालों ने यह पाया कि इस उपकरण का प्रयोग करने वाले बच्चे प्लीज़ और थैंक यू जैसी अभिव्यक्तियों को भूलते जा रहे हैं और अशालीन होते जा रहे हैं. यह सारा प्रसंग हम सबको भी यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि हमारे जीवन में तकनीक की बढ़ती जा रही घुसपैठ हमारे लिए किस सीमा तक स्वीकार्य होनी चाहिए. ऐसा न हो कि जिस चीज़ को आज हम सुविधा के तौर पर इस्तेमाल करना शुरु कर रहे हैं कल को वही हमारे विनाश का सबब बन जाए!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 10 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 3, 2017

सपनों का राही चला जाए सपनों के आगे कहां

1971 में बनी और बाद में राष्ट्रीय एवम एकाधिक फिल्मफेयर पुरस्कारों से नवाज़ी गई फ़िल्म आनंदमें गीतकार योगेश का लिखा एक अदभुत गीत था:  “ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय/ कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये”. गीतकार ने इसी गीत में आगे लिखा था, “कभी देखो मन नही जागे/ पीछे पीछे सपनों के भागे/ एक दिन सपनों का राही/ चला जाए सपनों  के आगे कहां” और इसी भाव का विस्तार हुआ था आगे के बंद में: “जिन्होंने सजाये यहां  मेले/ सुख दुख संग संग झेले/ वही चुनकर खामोशी/ यूँ चले जाये अकेले कहां”. अच्छे कवि की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह बड़े सरल शब्दों में ऐसी बात कह जाता है जो देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है. अब देखिये ना, हाल में सात समुद्र पार अमरीका में एक साधारण परिवार पर जो बीती उसे यह गीत किस कुशलता से घटना के करीब पांच दशक पहले व्यक्त कर गया था!

पश्चिमी  मिशिगन राज्य के  एक सामान्य  परिवार की असामान्य कथा है यह. बात मार्च माह की है. निक डेक्लेन की सैंतीस वर्षीया पत्नी केरी डेक्लेन की तबीयत कुछ ख़राब रहने लगी थी. डॉक्टर की सलाह पर कुछ परीक्षण करवाए गए तो एक बहुत बड़ा आघात उनकी प्रतीक्षा में था. केरी को ग्लियोब्लास्टोमा नामक एक भयंकर आक्रामक किस्म का दिमाग़ी कैंसर था. भयंकर इसलिए कि इसे करीब-करीब लाइलाज़ माना जाता है और अगर समुचित इलाज़ किया जा सके तो भी मरीज़ औसतन एक से डेढ़ साल जीवित रह पाता  है. लेकिन इलाज़ तो करवाना ही था. एक शल्य क्रिया द्वारा अप्रेल में केरी के दिमाग का ट्यूमर निकाल दिया गया. मुश्क़िल से दो माह बीते थे कि इस युगल को दो और ख़बरें मिलीं! पहली तो यह कि केरी का ट्यूमर फिर उभर आया था, और दूसरी यह कि उसे आठ सप्ताह का गर्भ था! स्वाभाविक है कि ट्यूमर के उपचार के लिए कीमोथैरेपी का सहारा लिया जाता. लेकिन इसमें एक पेंच था. कीमोथैरेपी से गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचता है इसलिए इस उपचार से पहले गर्भपात करवाने का फैसला करना था.  इस युगल के सामने एक दोराहा था:  या तो मां केरी के हित में अजन्मे शिशु की बलि दी जाए, या अजन्मे शिशु के पक्ष में केरी अपने मृत्यु पत्र पर हस्ताक्षर करे! जैसे ही यह ख़बर समाचार माध्यमों में आई, पूरे अमरीका में इस पर बहसें होने लगीं. लेकिन फैसला तो इस युगल को ही करना था! क्योंकि केरी अपनी धार्मिक आस्थाओं की वजह से गर्भपात विरोधी विचार रखती थी, यही तै किया गया कि अजन्मे शिशु को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाए! यह भी जान लें कि डेक्लेन  दम्पती के पांच संतानें पहले से हैं जिनकी आयु क्रमश: 18, 16, 11, 4 और 2 बरस है.

फैसला हो गया तो बेहतर का इंतज़ार करना था. लेकिन जुलाई मध्य में केरी की तबीयत फिर खराब हुई और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा. वो दर्द से तड़प रही थी. बताया गया कि उसे एक ज़ोरदार दौरा पड़ा है. तब उसका गर्भ उन्नीस सप्ताह का हो चुका था. केरी अस्पताल के पलंग पर लेटी थी और एक नली और सांस लेने में मददगार मशीन की सहायता से बेहोशी के बावज़ूद ज़िंदा रखी जा रही थी. उसके दिमाग को गम्भीर क्षति पहुंच चुकी थी और इस बात की उम्मीद बहुत कम थी कि ठीक होकर भी वह किसी को पहचान  सकेगी. कुछ समय बाद उसे एक और दौरा पड़ा. तब उसका गर्भ 22 सप्ताह का हो चुका था और चिंता की बात यह थी की शिशु का वज़न मात्र 378 ग्राम था जबकि उसे कम से कम 500 ग्राम होना चाहिए था. डॉक्टर अपना प्रयास ज़ारी रखे थे. दो सप्ताह और बीते, और एक अच्छी ख़बर आई कि शिशु  का वज़न बढ़कर 625 ग्राम हो गया है. लेकिन इसी के साथ एक चिंता पैदा करने वाली खबर भी थी, कि शिशु तनिक भी हिल-डुल नहीं रहा है. डॉक्टरों के पास एक ही विकल्प था कि सिज़ेरियन ऑपरेशन से शिशु को दुनिया में लाया जाए! यही किया गया और छह सितम्बर को इस दुनिया में एक और बेटी अवतरित हुई, जिसका नाम उसके  मां-बाप की इच्छानुसार रखा गया: लाइफ़. मात्र छह दिन बाद केरी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया!

लेकिन जीवन की असल विडम्बना तो सामने तब आई जब मात्र 14 दिन यह दुनिया देखकर लाइफ़ ने भी आंखें मूंद लीं! इन आघातों से टूटे-बिखरे पिता निक ने अपनी प्यारी पत्नी केरी की कब्र खुदवाई ताकि बेटी को भी मां के पास ही आश्रय मिल सके. निक का कहना है कि उसे समझ में नहीं आता कि ईश्वर ऐसे अजीबो-ग़रीब काम क्यों करता है! वह कहता है कि जब भी उसे मौका मिलेगा, वो ईश्वर से इस सवाल का जवाब मांगेगा. और तब तक वो अपने बच्चों को पालता पोसता  रहेगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.