Tuesday, October 10, 2017

जब बाज़ार में आने को थी बच्चे पालने वाली मशीन

कुछ माह पहले जानी-मानी खिलौना निर्माता कम्पनी मैटल ने घोषणा की थी कि वो बहुत जल्दी एक बेबी सिटर किस्म का उपकरण ज़ारी करेगी जो कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशयल इण्टेलीजेंस- एआई) पर आधारित होगा. कम्पनी के अनुसार एरिस्टोटल (अरस्तू) नामक यह उपकरण ध्वनि नियंत्रित एक स्मार्ट शिशु मॉनिटर के रूप में डिज़ाइन किया जा रहा था. इस उपकरण का घोषित मकसद था माता-पिताओं को शिशुओं के संरक्षण, सुरक्षा और लालन पालन में मदद करना. लेकिन कम्पनी इस उपकरण को ज़ारी कर पाती उससे पहले ही अमरीका में बहुत सारे स्वैच्छिक संगठन और राजनेता इस उपकरण के विरोध में एकजुट हो गए और उनका दबाव इतना प्रबल रहा कि अंतत: कम्पनी को यह घोषणा करनी पड़ी कि वो इस उपकरण को बाज़ार में उतारने का अपना इरादा छोड़ चुकी है.

प्रारम्भ में कम्पनी ने कहा था कि यह उपकरण शिशुओं को बाल कथाएं और लोरियां सुनाएगा और ज़रूरत पड़ी तो उन्हें वर्णमाला भी सिखाएगा. इतना ही नहीं, अगर शिशु रात को रोया तो उसे चुप भी कराएगा. स्वाभाविक रूप से उपकरण के ये उपयोग आकर्षक थे.  लेकिन बाद में यह बात मालूम पड़ी कि इसमें बेबी मॉनिटर के रूप में एक कैमरा लगा होगा जो शिशु की गतिविधियों और उसके परिवेश को रिकॉर्ड करेगा. इतना ही नहीं यह बात भी सामने आई कि इन सबके आधार पर यह उपकरण बच्चों के काम आने वाली उपभोक्ता सामग्री जैसे मिल्क पाउडर, डायपर वगैरह के लिए उपलब्ध डील्स और कूपन्स की जानकारी प्रदान करने के साथ चेतावनी भी देगा कि घर में शिशु के काम की अमुक सामग्री का स्टॉक चुकने को है. शायद यही व्यावसायिक पहलू था जिसने अमरीका स्थित निजता के लिए चिंतित एक्टिविस्टों और विशेष रूप से एक अलाभकारी संगठन कमर्शियल फ्री चाइल्डहुड के कान खड़े किए. अपनी पड़ताल के बाद उन्होंने  इस उपकरण के विरोध में पंद्रह हज़ार लोगों के हस्ताक्षर जुटाये और  दो-टूक लहज़े में कहा कि “यह एरिस्टोटल कोई नैनी नहीं बल्कि एक घुसपैठिया है. हम चाहते हैं कि शिशुओं के कमरे कॉर्पोरेट जासूसी से बचे रहें”. इस संगठन की आपत्ति को ही आगे बढ़ाते हुए सीनेटर एडवर्ड जे मारके और रिप्रेजेण्टेटिव जोए बार्टन सहित अमरीका के बहुत सारे राजनीतिज्ञों ने भी इस बात पर सवाल खड़े किए कि यह  उपकरण जो डेटा एकत्रित करेगा उसका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा और उसे किस तरह सुरक्षित रखा जाएगा?

एरिस्टोटल के इस विरोध के अलावा भी दुनिया के बहुत सारे देशों में समझदार लोग बाज़ार में उतारी जाने वाली स्मार्ट डिवाइसेज़ के बच्चों  पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को लेकर चिंतित  हैं. उनका सोच है कि इस तरह के उपकरण बच्चों के भावनात्मक विकास में रुकावट डालते हैं. कुछ और लोगों की आपत्ति यह भी है कि इस तरह के  उपकरण बच्चों के अपने अभिभावकों से मानवीय सम्बंधों को विस्थापित कर उसकी जगह तकनीक से उनका रिश्ता कायम करने का ख़तरनाक काम करते हैं. इसी आपत्ति को एक जाने-माने शिशु रोग विशेषज्ञ ज़ेनिफर राडेस्की ने अपने एक लेख में यह कहते हुए बल प्रदान किया कि “इस तकनीक के बारे में निजता के महत्वपूर्ण मुद्दे के अलावा मेरी मुख्य चिंता इस बात को लेकर है कि जब कोई शिशु रोएगा, खेलना या कुछ सीखना चाहेगा  तो तकनीक का एक टुकड़ा उसकी आवाज़ सुनने वाला घर का सबसे ज़िम्मेदार और उत्तरदायी सदस्य बनकर उभरेगा.यंत्र द्वारा मनुष्य को विस्थापित कर देने के इस ख़तरे को कम करके नहीं देखा जाना चाहिए.

इसी के साथ यह याद कर लेना भी उपयुक्त होगा वॉइस एक्टिवेटेड इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के दुष्प्रभाव सारी दुनिया में चिंता का कारण बनते जा रहे हैं. बहुत सारे अध्ययन हुए हैं जो बताते हैं कि अब तो बच्चे रोबोट्स को दिमागी समझ रखने वाला  सामाजिक प्राणी तक मानने लगे हैं और उनसे ऐसा बर्ताव करने लगे हैं जैसे वे मानवीय प्राणी हों. बहुत सारे मां-बाप यह भी चिंता करने लगे हैं कि नए ज़माने के स्मार्टफोन्स और टेबलेट्स आवाज़ के निर्देश पर काम करने की अपनी तकनीक की वजह से उनके बच्चों के साथ बहुत कम उम्र में ही घनिष्ट रिश्ता कायम करने लगे हैं. एक बड़ी कम्पनी द्वारा बाज़ार में उतारे गए आवाज़ के निर्देशों पर संचालित होने वाले एलेक्सा नामक उपकरण के उपयोग के प्रभावों का अध्ययन करने वालों ने यह पाया कि इस उपकरण का प्रयोग करने वाले बच्चे प्लीज़ और थैंक यू जैसी अभिव्यक्तियों को भूलते जा रहे हैं और अशालीन होते जा रहे हैं. यह सारा प्रसंग हम सबको भी यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि हमारे जीवन में तकनीक की बढ़ती जा रही घुसपैठ हमारे लिए किस सीमा तक स्वीकार्य होनी चाहिए. ऐसा न हो कि जिस चीज़ को आज हम सुविधा के तौर पर इस्तेमाल करना शुरु कर रहे हैं कल को वही हमारे विनाश का सबब बन जाए!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 10 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 3, 2017

सपनों का राही चला जाए सपनों के आगे कहां

1971 में बनी और बाद में राष्ट्रीय एवम एकाधिक फिल्मफेयर पुरस्कारों से नवाज़ी गई फ़िल्म आनंदमें गीतकार योगेश का लिखा एक अदभुत गीत था:  “ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय/ कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये”. गीतकार ने इसी गीत में आगे लिखा था, “कभी देखो मन नही जागे/ पीछे पीछे सपनों के भागे/ एक दिन सपनों का राही/ चला जाए सपनों  के आगे कहां” और इसी भाव का विस्तार हुआ था आगे के बंद में: “जिन्होंने सजाये यहां  मेले/ सुख दुख संग संग झेले/ वही चुनकर खामोशी/ यूँ चले जाये अकेले कहां”. अच्छे कवि की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह बड़े सरल शब्दों में ऐसी बात कह जाता है जो देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है. अब देखिये ना, हाल में सात समुद्र पार अमरीका में एक साधारण परिवार पर जो बीती उसे यह गीत किस कुशलता से घटना के करीब पांच दशक पहले व्यक्त कर गया था!

पश्चिमी  मिशिगन राज्य के  एक सामान्य  परिवार की असामान्य कथा है यह. बात मार्च माह की है. निक डेक्लेन की सैंतीस वर्षीया पत्नी केरी डेक्लेन की तबीयत कुछ ख़राब रहने लगी थी. डॉक्टर की सलाह पर कुछ परीक्षण करवाए गए तो एक बहुत बड़ा आघात उनकी प्रतीक्षा में था. केरी को ग्लियोब्लास्टोमा नामक एक भयंकर आक्रामक किस्म का दिमाग़ी कैंसर था. भयंकर इसलिए कि इसे करीब-करीब लाइलाज़ माना जाता है और अगर समुचित इलाज़ किया जा सके तो भी मरीज़ औसतन एक से डेढ़ साल जीवित रह पाता  है. लेकिन इलाज़ तो करवाना ही था. एक शल्य क्रिया द्वारा अप्रेल में केरी के दिमाग का ट्यूमर निकाल दिया गया. मुश्क़िल से दो माह बीते थे कि इस युगल को दो और ख़बरें मिलीं! पहली तो यह कि केरी का ट्यूमर फिर उभर आया था, और दूसरी यह कि उसे आठ सप्ताह का गर्भ था! स्वाभाविक है कि ट्यूमर के उपचार के लिए कीमोथैरेपी का सहारा लिया जाता. लेकिन इसमें एक पेंच था. कीमोथैरेपी से गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचता है इसलिए इस उपचार से पहले गर्भपात करवाने का फैसला करना था.  इस युगल के सामने एक दोराहा था:  या तो मां केरी के हित में अजन्मे शिशु की बलि दी जाए, या अजन्मे शिशु के पक्ष में केरी अपने मृत्यु पत्र पर हस्ताक्षर करे! जैसे ही यह ख़बर समाचार माध्यमों में आई, पूरे अमरीका में इस पर बहसें होने लगीं. लेकिन फैसला तो इस युगल को ही करना था! क्योंकि केरी अपनी धार्मिक आस्थाओं की वजह से गर्भपात विरोधी विचार रखती थी, यही तै किया गया कि अजन्मे शिशु को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाए! यह भी जान लें कि डेक्लेन  दम्पती के पांच संतानें पहले से हैं जिनकी आयु क्रमश: 18, 16, 11, 4 और 2 बरस है.

फैसला हो गया तो बेहतर का इंतज़ार करना था. लेकिन जुलाई मध्य में केरी की तबीयत फिर खराब हुई और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा. वो दर्द से तड़प रही थी. बताया गया कि उसे एक ज़ोरदार दौरा पड़ा है. तब उसका गर्भ उन्नीस सप्ताह का हो चुका था. केरी अस्पताल के पलंग पर लेटी थी और एक नली और सांस लेने में मददगार मशीन की सहायता से बेहोशी के बावज़ूद ज़िंदा रखी जा रही थी. उसके दिमाग को गम्भीर क्षति पहुंच चुकी थी और इस बात की उम्मीद बहुत कम थी कि ठीक होकर भी वह किसी को पहचान  सकेगी. कुछ समय बाद उसे एक और दौरा पड़ा. तब उसका गर्भ 22 सप्ताह का हो चुका था और चिंता की बात यह थी की शिशु का वज़न मात्र 378 ग्राम था जबकि उसे कम से कम 500 ग्राम होना चाहिए था. डॉक्टर अपना प्रयास ज़ारी रखे थे. दो सप्ताह और बीते, और एक अच्छी ख़बर आई कि शिशु  का वज़न बढ़कर 625 ग्राम हो गया है. लेकिन इसी के साथ एक चिंता पैदा करने वाली खबर भी थी, कि शिशु तनिक भी हिल-डुल नहीं रहा है. डॉक्टरों के पास एक ही विकल्प था कि सिज़ेरियन ऑपरेशन से शिशु को दुनिया में लाया जाए! यही किया गया और छह सितम्बर को इस दुनिया में एक और बेटी अवतरित हुई, जिसका नाम उसके  मां-बाप की इच्छानुसार रखा गया: लाइफ़. मात्र छह दिन बाद केरी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया!

लेकिन जीवन की असल विडम्बना तो सामने तब आई जब मात्र 14 दिन यह दुनिया देखकर लाइफ़ ने भी आंखें मूंद लीं! इन आघातों से टूटे-बिखरे पिता निक ने अपनी प्यारी पत्नी केरी की कब्र खुदवाई ताकि बेटी को भी मां के पास ही आश्रय मिल सके. निक का कहना है कि उसे समझ में नहीं आता कि ईश्वर ऐसे अजीबो-ग़रीब काम क्यों करता है! वह कहता है कि जब भी उसे मौका मिलेगा, वो ईश्वर से इस सवाल का जवाब मांगेगा. और तब तक वो अपने बच्चों को पालता पोसता  रहेगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, September 19, 2017

बड़े लोगों के बड़े और अजीबो-गरीब उपहार

उपहार हमारे सामाजिक व्यवहार का अभिन्न अंग हैं. इनसे जहां देने वाले की सुरुचि और कल्पनाशीलता का पता चलता है वहीं यह बात भी उभरती है कि उपहार देने वाला उपहार पाने वाले के बारे में कितनी जानकारी रखता है और उसकी रुचियों के प्रति कितना सजग और संवेदनशील है. निश्चय ही उपहार देने और लेने वाले की आर्थिक स्थिति के भी परिचायक होते हैं. लेकिन ये सारी बातें तो हुईं व्यक्तियों के निजी स्तर पर लिये-दिये गए उपहारों के बारे में. विचारणीय बात यह है कि जब एक देश का  प्रधान किसी दूसरे देश के प्रधान को कोई उपहार देता है तब क्या होता है? क्या तब भी इन बातों का खयाल रखा जाता है? हमारे देश में इस बात की बहुत अधिक चर्चा नहीं होती है कि हमारी सरकार ने किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष को क्या उपहार दिया या उनकी विदेश यात्रा के अवसर पर हमारे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को उपहार स्वरूप क्या दिया गया. थोड़ी बहुत चर्चा जो होती है उससे कोई ख़ास तस्वीर नहीं उभर पाती है. लेकिन इधर  अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इस बारे में काफी कुछ लिखा गया है कि इन बड़े लोगों के उपहार क्या और कैसे होते हैं.

हाल में अमरीका के स्टेट डिपार्ट्मेंट ने एक सूची ज़ारी कर यह बताया है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को मई माह में सऊदी अरब की उनकी यात्रा के दौरान कुल 83  बेशकीमती उपहार मिले. डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति  का पदभार ग्रहण करने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा पर अरब इस्लामी शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए सऊदी अरब की राजधानी रियाद गए थे. सऊदी अरब के शाह सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ अल सउद ने उन्हें जो बेहद कीमती उपहार दिये उनमें अनेक तलवारें, खंजर, हीरे-मोतियों और सोने चांदी से जड़ी पोशाकें, सुनहरी ऊन के लबादे जिनके  किनारों  पर  शेर चीतों के फर की सज्जा है, पारम्परिक अरबी वेशभूषा, चमड़े के सैंडिल, इत्र और कलाकृतियां शामिल हैं. पश्चिमी मानदण्डों से बहुत कीमती समझे जाने वाले इन उपहारों के बारे में  अरेबिया फाउण्डेशन के एक्ज़ीक्यूटिव डाइरेक्टर अली शिहाबी का कहना है कि ये उपहार उतने कीमती नहीं हैं जितने पहले के उपहार हुआ करते थे. पहले की खाड़ी की सरकारें तो बहुत ही महंगे उपहार, जैसे कीमती घड़ियां और आभूषण आदि  दिया करती थीं. अब तो स्थानीय संस्कृति की परिचायक और वहां की कलात्मक विरासत  की प्रतीक चीज़ें ही उपहार में दी जाती हैं.

आम तौर पर उपहार देते समय लेने वाले की रुचियों का भी पूरा ध्यान रखा जाता है. यही वजह है कि उनकी विदेश  यात्राओं के समय अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन को उनकी काउ बॉय वाली छवि के अनुरूप एक घोड़ा और राष्ट्रपति बिल क्लिण्टन को उनके संगीत प्रेम  के कारण  एक सेक्सोफोन भी भेंट किया जा चुका है. बराक ओबामा को जर्मन चांसलर एंजिला मारकेल ने बास्केटबॉल  खेल रहे एक आदमी की पेण्टिंग उपहार में दी तो क़तर के अमीर ने उन्हें 110,000 डॉलर मूल्य की एक यांत्रिक चिड़िया उपहार  स्वरूप प्रदान की. इस चिड़िया के अलावा बेशकीमती रत्नों  से जड़ित  एक घोड़ा भी उन्हें उपहार स्वरूप प्रदान किया गया. यहीं यह भी याद कर लेना ज़रूरी है कि अधिकांश देशों में राष्ट्राध्यक्षों को उनकी विदेश यात्राओं में मिले उपहार सरकारी भण्डार में जमा कराने होते हैं. अमरीका में किसी विदेशी सरकार से 390 डॉलर से अधिक मूल्य का उपहार लेने की मनाही है. लेकिन अगर कोई सरकारी अधिकारी चाहे तो इससे अधिक मूल्य वाला उपहार उसका प्रचलित बाज़ार दर वाला  मूल्य सरकार को चुकाकर खुद रख सकता है. इसी प्रावधान का प्रयोग कर हिलेरी क्लिण्टन ने सन 2012 में म्यांमार की प्रतिपक्ष की नेता आंग सांग सू की द्वारा भेंट में दिया गया काले मोतियों का नेकलेस 970 डॉलर का मूल्य चुकाकर प्राप्त किया गया था.

और बात जब उपहारों की चल रही है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि हम उस उपहार की बात न करें जो 1886 में फ्रांस द्वारा अमरीका को दिया गया था. मेरा इशारा उस स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की तरफ है जो आज अमरीका का पर्याय बन चुका है. इस भव्य प्रतिमा का  निर्माण पेरिस में हुआ और फिर इसे 214 क्रेट्स में पैक कर अमरीका भेजा  गया. उपहारों में विराट की एक मिसाल हाल में भी देखने को मिली जब यह ख़बर आई कि नॉर्वे अपने मित्र देश फिनलैण्ड को उसके सौवें जन्म दिन पर एक पहाड़ ही उपहार स्वरूप दे रहा है! अजीबोगरीब उपहारों की यह चर्चा चीन के ज़िक्र के बग़ैर भला कैसे पूरी हो सकती है जिसने 1972 में राष्ट्रपति  निक्सन को दो विशालकाय पाण्डा (भालू से मिलते-जुलते प्राणी) उपहार स्वरूप दिये और उसके बाद तो चीनी इतनी बार इन प्राणियों को भेंट में दे चुके हैं कि अंतर्राष्ट्रीय राजनय की दुनिया में एक नया शब्द ही चलन में आ गया है:  पाण्डा डिप्लोमेसी. 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 सितम्बर, 2017 को प्रधानमंत्री  या राष्ट्रपति को उपहार स्वरूप क्या दिया गया शीर्षक से प्रकाशित इसी आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, September 12, 2017

हम खुद अपनी समस्याएं हल क्यों नहीं करना चाहते?

देखते-देखते हमारे चारों  तरफ की दुनिया में बहुत कुछ बदलता जा रहा है. हर बदलाव हमारे मन में बहुत सारी आशंकाएं पैदा करता है. हम भयभीत होते हैं, उसे नकारने के प्रयत्न करते हैं, उसका प्रतिरोध करने की कोशिश करते हैं, उसके खिलाफ़ तर्क गढ़ते हैं लेकिन हमारे सारे प्रयत्नों के बावज़ूद बदलाव आकर  रहता है. मज़े की बात यह है कि जिन्होंने कभी उस बदलाव का विरोध किया था बाद मे वे भी उसे बेहिचक स्वीकार कर लेते हैं. यह सिलसिला काफी लम्बे समय से चल रहा है. वैसे, ऐसा भी नहीं है कि हर बदलाव सकारात्मक ही हो. बल्कि सच तो यह है कि हर बदलाव अपने साथ कुछ परेशानियां भी  लाता है. कुछ बुरा भी उसकी वजह से होता है. लेकिन इसे मनुष्य की  अदम्य जिजीविषा ही कहेंगे कि वह तमाम झटके सहकर भी अपने प्रगति पथ पर अनवरत  चलता रहता है.

ये सारे विचार मेरे मन में एक ख़ास अनुभव के कारण आए. पिछले दिनों बैंगलुरु जाने का और कुछ दिन वहां रहने का अवसर मिला तो मैंने पाया कि सूचना प्रौद्योगिकी के मामले में अग्रणी इस भारतीय शहर में कई मामलों में जीवन यापन बहुत कठिन हो गया है. कुछ समय पहले तक जहां हम इस बात पर गर्व करते थे कि इस शहर के आई टी हब बनने का यह आलम है कि अमरीकी अंग्रेज़ी में एक नया शब्द ही जुड़ गया है: बैंग्लोर्ड, वहीं अब यह महसूस हुआ कि यह शहर इसी वजह से यहां आ जुटी विशाल जनसंख्या और उसकी    ज़रूरतों-सुविधाओं-विलासिताओं के उपकरणों का बोझ उठा पाने में नाकाम साबित होता जा रहा है. सड़कों पर वाहनों की ऐसी भीड़ है कि घर से निकलकर कहीं जाना किसी यातना से कम नहीं लगता है. वहां के अखबार भी आए दिन यह फिक्र करते हैं कि लगातार बढ़ती जा रही जनसंख्या के सामने वहां के प्राकृतिक संसाधन अपर्याप्त साबित होते जा रहे हैं! और जब मैं यह सब महसूस कर रहा था तभी मुझे यह पढ़ने को मिला कि यह संकट केवल हम भारत वासियों का ही नहीं है.

उधर सुदूर अमरीका में भी उन शहरों में जहां बहुत सारी बड़ी कम्पनियों का जमावड़ा है, उनमें काम करने वाले कर्मचारियों के लिए वहां रहना और जीवन यापन  करना नामुमकिन होता जा  रहा है. लोगों को रहने के लिए घर नहीं मिलते हैं, और अगर मिलते हैं तो बहुत महंगे किराये पर मिलते हैं. परिवहन और यातायात की समस्याएं दिन-ब-दिन गहराती जा रही हैं. कम्पनियां अपने यहां जिस दक्षता के कर्मचारियों को रखना चाहती हैं वे वहां रहने को तैयार नहीं हैं. जो अमीर कम्पनियां हैं वे अपने कर्मचारियों को अधिक वेतन देकर भी अपने यहां काम करने को तैयार कर लेती हैं, लेकिन सारी कम्पनियां यह नहीं कर पाती हैं. और इसी मज़बूरी ने वहां एक नए सोच को जन्म दिया है.  बहुत सारी कम्पनियां अब यह सोचने लगी हैं कि बजाय इसके कि वे कर्मचारियों को अपने पास बुलाएं, क्यों न वे ही कर्मचारियों के पास चली जाएं? लेकिन स्वाभाविक ही है कि ऐसा करना भी छोटी कम्पनियों के बस की बात नहीं है.

अमरीका की एक बहुत बड़ी कम्पनी है अमेज़ॉन. यह वहां की सर्वाधिक सफल कम्पनियों  में से एक है. हम भारत में भी इसके नाम और काम से परिचित हैं. इसने पिछले ही सप्ताह यह घोषणा की है कि यह बहुत जल्दी पांच बिलियन डॉलर की लागत से एक नया, “समान” मुख्यालय परिसर खड़ा करेगी. अमेज़ॉन का सोच यह है कि इसके वर्तमान मुख्यालय वाले शहर सिएटल में कर्मचारियों के आवास  की समस्या के हल होने का इंतज़ार करने और वहां बढ़ती जा रही भीड़-भाड़ की समस्या के घटने की आस लगाए रखने से ज़्यादा अच्छा यही होगा कि किसी और जगह जाकर, जहां ये समस्याएं न हों और निकट भविष्य में होने की आशंका भी न हो, सुकून के साथ अपना काम ज़ारी रखा जाए. ज़ाहिर है कि कम्पनी ने सरकार के कदमों का इंतज़ार करने की बजाय अपने स्तर पर समस्या का समाधान  करने का फैसला किया है.

इसी बात ने मुझे यह सोचने को विवश किया कि आखिर क्या बात है कि हम पश्चिम की नकारात्मक चीज़ों को तो तुरंत अपना लेते हैं, वहां की सकारात्मकता से उसी तेज़ी के साथ प्रभावित नहीं होते हैं! बैंगलुरु में मैंने पाया कि बहुत समर्थ और साधन सम्पन्न कम्पनियों के परिसरों तक जाने वाली सड़कें भी बहुत बुरी हालत में है. यह प्रशासन का निकम्मापन तो है ही कि जिनसे उसे टैक्स के रूप में भारी आमदनी होती है उनकी भी वो कोई परवाह नहीं करता है, लेकिन क्या यह उन समर्थ कम्पनियों की  भी भयंकर उदासीनता नहीं है कि वे खुद अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कोई पहल नहीं करती हैं? आखिर क्यों नहीं ये कम्पनियां अपने परिसरों तक आने वाली सड़कों को अपने दम पर दुरुस्त करवा लेती हैं?        

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 सितम्बर, 2017  को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, September 5, 2017

एक खेल जो आपको आत्महत्या के लिए उकसाता है!

इन दिनों एक इण्टरनेट खेल खूब चर्चा में है. इस खेल की चर्चा ग़लत कारणों से है. शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो जब दुनिया के किसी न किसी कोने से किसी बालक, किशोर या युवा के इस खेल  की वजह से अपनी जान से हाथ धो बैठने की ख़बर पढ़ने को न मिलती हो. भारत में यह गेम हाल ही चर्चा में आया है, लेकिन रूस, अर्जेंटीना, ब्राजील, चिली, कोलंबिया, चीन, जॉर्जिया, इटली, केन्या, पराग्वे, पुर्तगाल, सऊदी अरब, स्पेन, अमरीका, उरुग्वे जैसे देशों में कम उम्र के कई बच्चों ने इस खेल  की वजह से अपनी जान गंवाई है. हाल में भारत में ही अलग-अलग प्रांतों में कई बच्चे इस खेल के शिकार हुए हैं. सारी दुनिया में इस बात पर गम्भीर विमर्श हो रहा है कि आखिर इस ऑनलाइन खेल में ऐसा क्या है कि यह अनगिनत लोगों को आत्महत्या करने के लिए उकसाने में कामयाब हो रहा है.
यह ब्लू व्हेल या ब्लू व्हेल चैलेंज इंटरनेट पर खेला जाने वाला गेम है, जो दुनियाभर के कई देशों में उपलब्ध है. इस गेम को खेलने वाले व्यक्ति  के सामने कई तरह के चैलेंज रखे जाते हैं. उसे हर दिन एक चैलेंज पूरा करते हुए कुल पचास दिनों में सारे चैलेंज पूरे कर लेने होते हैं.  हर चैलेंज को पूरा कर लेने पर हाथ पर एक कट करने के लिए कहा जाता है. सारे चैलेंज पूरे हो जाने पर हाथ पर एक व्हेल की आकृति बनती है.  शुरुआत पूरे दिन किसी से भी बात न करने, एक ख़ास किस्म का संगीत सुनने, हॉरर  वीडियो या फिल्म देखने, सुबह जल्दी उठने, छत पर जाने जैसे अपेक्षाकृत निरापद चैलेंजों से होती है और फिर हाथ की तीन नसों को काटकर उसकी फोटो क्यूरेटर को भेजने जैसे ख़तरनाक चैलेंज के बाद अंतिम चैलेंज के रूप में आत्महत्या करने को कहा जाता है. माना जाता है कि यह खेल  प्रारम्भ में खेलने वाले के मन में एक उत्सुकता जगाता है और फिर आहिस्ता-आहिस्ता उसे अपनी  गिरफ़्त में लेकर आत्महत्या जैसा दुष्कृत्य करने के लिए विवश कर देता है.  इस  गेम को फिलिप बुडेकिन ने साल 2013 में बनाया था. रूस में आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं के बीच कम से कम सोलह किशोरियों को आत्महत्या के लिए उकसाने के ज़ुर्म में उसे गिरफ्तार किया गया और बाद में उसे जेल की सजा हो गई. इक्कीस वर्षीय फिलिप ने रूसी प्रेस से कहा था कि उसके पीड़ित 'जैविक कूड़े' की तरह हैं और इस तरह वह 'समाज को साफ़' कर रहा है. उसे सेंट पीटर्सबर्ग की जेल में रखा गया है. कुछ पत्रकारों के मुताबिक बुडेकिन ने पहले ख़ुद को निर्दोष बताया था और कहा था कि उसका कोई बुरा मक़सद नहीं था और वह सिर्फ मज़े ले रहा था.
एक अन्य ख़बर यह भी है कि ब्लू व्हेल गेम की एडमिन 17 साल की लड़की गिरफ्तार हो गई है. वह रूस की रहनेवाली है. लड़की पर आरोप है कि जानलेवा ब्लू व्हेल चैलेंज गेम के पीछे उसी का हाथ है. मीडिया में आई रिपोर्ट्स के अनुसार  लड़की शिकार को धमकी दिया करती थी कि अगर उसने ब्लू व्हेल टास्क पूरा नहीं किया तो वह उसका और उसके परिवार का खून कर देगी. ब्लू व्हेल चैलेंज उन्हीं लोगों को अपना शिकार बनाता है, जो तनाव से जूझ रहे हैं और आत्महत्या करने के बारे में सोचते हैं. आरोपी लड़की मनोविज्ञान की छात्रा है और उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है. अदालत में हुई पेशी के बाद उसे तीन साल के लिए जेल भेज दिया  गया है.
किसी खेल की वजह से खुद को हानि पहुंचाने और आत्महत्या तक कर डालने का यह प्रकरण सारी दुनिया में चर्चा, विचार विमर्श और चिंता का कारण बनता जा रहा है. विभिन्न सरकारें और इण्टरनेट तंत्र अपनी-अपनी अपनी तरह से इस खेल के दुष्परिणामों से लोगों को बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं. लेकिन वे प्रयत्न पूरी तरह कामयाब होते नज़र नहीं आ रहे हैं. मुझे तो यह लगता है कि लोग और विशेष रूप से नई पीढ़ी जैसे-जैसे अपने परिवारजन से दूर होती जा रही है, इस तरह के मूर्खतापूर्ण, नकारात्मक  और आत्मघाती खेलों की स्वीकार्यता भी बढ़ती जा रही है. परिवारों में सम्वादहीनता का सघन होते जाना मुझे इसके मूल में एक बड़ा कारण नज़र आता है. ब्लू व्हेल की व्यापक स्वीकार्यता और इसके दुष्परिणाम हमें एक बार फिर से चेता रहे हैं कि अकेले होते जाने की जिस राह पर हम चल पड़े हैं वह बहुत ख़तरनाक है! इस खेल की दुखद परिणतियों ने एक बार फिर से इस बात की ज़रूरत को भी रेखांकित किया है कि मां-बाप इस बात पर निगाह रखें कि उनके बच्चे इण्टरनेट पर तथा अन्यत्र भी किन गतिविधियों में भागीदारी कर रहे हैं.
आप क्या सोचते हैं?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 सितम्बर, 2017 को अकेले होते जाने की राह बहुत ख़तरनाक! शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, August 29, 2017

मर कर भी चैन न पाया तो शहर-ए-खामोशां चले जाएंगे!

मृत्यु कवियों-शायरों का प्रिय विषय रहा है. हरेक ने इसे अपनी तरह से समझने और व्याख्यायित करने का प्रयत्न किया है. हरेक का अपना लहज़ा और अपना रंग. कुछ ने तो मृत्यु का इतना दिलकश चित्रण किया है कि पढ़ते हुए आपको ज़िन्दगी से मौत बेहतर लगने लगती है, तो कुछ मौत के बाद की परेशानियों का ज़िक्र कर आपको और ज़्यादा डराने से भी बाज़ नहीं आते हैं.  अब हज़रत शेख  इब्राहिम ज़ौक़ साहब को ही लीजिए. फरमाते हैं, “अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे/ मर कर भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे.”  गोया मौत न हुई, गर्मी की छुट्टियों  की यात्रा हो गई, कि अगर शिमला ठण्डा न लगा तो नैनीताल चले जाएंगे! वैसे हक़ीक़त तो यह है कि न मरना अपने बस में है न ज़िन्दा रहना. ख़ुद इन्हीं ज़ौक़ साहब ने यह भी तो कहा था कि “लाई हयात आए कज़ा ले चली चले/ अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले.” मुझे तो मिर्ज़ा ग़ालिब भी बहुत अच्छे लगते हैं, जब वे आश्वस्त करते हुए कहते हैं, “मौत का एक दिन मुअय्यन है/ नींद क्यों रात भर नहीं आती.” मरने के बाद क्या होता है और हम कहां जाते हैं, इसकी भी चिंता बहुत सारे कवियों-शायरों ने की है और बहुत खूबसूरती से की है. हिज़्र नाज़िम अली ख़ान जब कहते हैं कि “ऐ हिज़्र वक़्त टल नहीं सकता है मौत का/ लेकिन ये देखना है कि मिट्टी कहां की है.” तो वे जैसे इसी बात की फ़िक्र करते हैं कि मौत के बाद कहां जाना होगा. उन्हीं की बात का एक दूसरा सिरा हमें मिलता है हिन्दी कवि राजकुमार कुम्भज के यहां जब वे कहते हैं कि “मुझे मेरी मृत्यु से डर कैसा?/मृत्यु तो मेरा एक और नया घर होगा भाई/ आओ अभी थोड़ा आराम करें यहीं इसी घर में/ फिर चलेंगे उधर कुछ देर बाद मिलने उस मिट्टी से.”

क्या पता उन्हें राजकुमार कुम्भज की इन पक्तियों से ही प्रेरणा  मिली हो, इधर  हमारे पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान में एक नया खूबसूरत और वैभव पूर्ण नया ‘घर’ बनाया गया है. हाल ही में पाकिस्तान सरकार ने वहां के सबसे अमीर और ग्यारह मिलियन की आबादी वाले शहर लाहोर के बाशिन्दों के जीवनोत्तर जीवन के लिए शहर से थोड़ा दूर एक आलीशान ठिकाना तैयार किया है जिसे हम अपनी भाषा में आदर्श कब्रस्तान कह सकते हैं. शहर-ए-खामोशां नामक इस कब्रस्तान में जर्मनी से आयातित  फ्रीज़र लगवाए गए हैं और यहां स्थापित किये गए बाईस वीडियो दूर-दराज़ के इलाकों में रह रहे रिश्तेदारों को भी अपने निकट सम्बन्धियों के अंतिम संस्कार में मौज़ूद रहने का अनुभव प्रदान कर सकेंगे. शहर-ए-खामोशां में किसी के अंतिम संस्कार में आए शोकाकुलों की सुविधा का भी पूरा खयाल रखते हुए उनके लिए खूब सारे पंखों का इंतज़ाम किया गया है ताकि उन्हें शोक की घड़ी में भी गर्मी से न जूझना पड़े. कब्रस्तान के भीतर उम्दा फुटपाथों वाली खूब चौड़ी सड़कें हैं और उनके किनारों पर भरपूर और सुकून देने वाली हरियाली है. बुज़ुर्गों के आवागमन के लिए गोल्फ कार्ट्स की व्यवस्था है और कब्र खोदने का कष्टसाध्य काम करने के लिए यांत्रिक संसाधन जुटा दिये गए हैं. पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त  में ऐसे ही तीन कब्रस्तान और बनाए जा रहे हैं और इस परियोजना के निदेशक ने देश के अन्य प्रांतों के अधिकारियों  को भी सलाह दी है कि वे अपने यहां भी ऐसे ही मॉडल कब्रस्तान बनवाएं.

लाहोर के इस आदर्श कब्रस्तान की बात करते हुए यह बात भी याद कर ली जानी चाहिए कि पाकिस्तान के अधिकांश कब्रस्तान  जगह के संकट से जूझ रहे हैं. अब तक तो यह होता रहा है कि जिन कब्रों पर लम्बे अर्से तक कोई गतिविधि नहीं होती थी  उन्हें नवागतों को आबंटित कर दिया जाता था लेकिन इधर जब से कब्र पर कीमती पत्थरों पर उत्कीर्ण महंगे स्मृति लेखों का चलन बढ़ा है, कब्रस्तानों के प्रबन्धकों  का दायित्व निर्वहन कठिन होता जा रहा है. पाकिस्तान के सबसे अधिक आबादी वाले शहर कराची में तो लम्बे समय से अधिकांश सार्वजनिक कब्रस्तानों में दफ़नाने  की मनाही है. फिर भी, अतिरिक्त धन के लालच में वहां के कारिन्दे इस मुमानियत का उल्लंघन  भी कर जाते हैं. बहुत रोचक बात है कि इस तरह के लालची कर्मचारियों   को पकड़ने के लिए वहां की पुलिस ताबूतों में छिपकर उन पर निगाह रखती है.  ऐसे हालात में, समझदार लोगों का इस तरह के वैभवपूर्ण और खूब जगह घेरने वाले वी आई पी कब्रस्तानों को आदर्श मानने पर सवाल उठाना तर्क संगत लगता है. अगर सुमित्रानंदन पंत आज होते तो शायद वे दुबारा लिखते:
हाय! मृत्यु का ऐसा अमर, अपार्थिव पूजन
जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन! 
संग-सौध में हो शृंगार मरण का शोभन
नग्न, क्षुधातुर, वास-विहीन रहें जीवित जन? 


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 29 अगस्त, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 22, 2017

बर्न आउट से मुक्ति के लिए तिब्बती बौद्ध मार्ग की शरण में


आप में  से  बहुतों को उस विज्ञापन की जरूर   याद होगी जिसमें एक थके हारे आदमी को एक बिचारा काम के  बोझ का  मारा कह कर इंगित किया जाता था.  इस  विज्ञापन के नायक की याद मुझे यह पढ़ते हुए आई  कि सन 2011 में अमरीका के मेयो क्लीनिक ने एक सर्वे कर यह जाना कि वहाँ के कम से कम आधे फिजीशियन उस बढ़ते जा रहे मर्ज़ के शिकार हैं जिसे आजकल बर्न आउट नाम से जाना जाता है। भले ही अपने देश  भारत में हममें से  ज़्यादातर  लोगों को अपने डॉक्टरों से अनगिनत शिकायतें हों, इस सर्वे के क्रम में  जाना गया कि वहाँ के ज्यादातर  डॉक्टरों का हाल यह है कि वे कम से कम चौदह घण्टे काम करते हैं और इस बीच एक वक़्त खाना खाने का समय भी मुश्किल से निकाल पाते हैं. कुछ समय तक लगातार इस तरह खटने के बाद उनकी हालत इतनी बिगड़ चुकती है कि वे बहुत गम्भीर  अवसाद  के शिकार हो जाते हैं और करीब-करीब टूट जाते हैं.  तब वे अपने इस पेशे तक को तिलांजलि देने की सोचने लगते हैं. अगर किसी वजह से नहीं दे पाते हैं और अपना यह काम  जारी रखते हैं तो वे इस बर्न आउट के  एक खास प्रकार से पीड़ित होने लगते हैं जिसे कंपैशन फ़ेटिग़  के नाम से जाना जाता है. इस कंपैशन फ़ेटिग़  में व्यक्ति में   भावनात्मक संवेदनशून्यता आने लगती है और अगर वह डॉक्टर है तो मरीजों के प्रति उसके करुणाभाव में  कमी दिखाई देने लगती है. यही नहीं  उसे यह भी एहसास होने लगता है कि चीजों पर से उसका  नियंत्रण  चुकता जा रहा है.

बहुत मुमकिन है कि अपने देश में  भी बहुत सारे डॉक्टरों और अन्य पेशेवरों  का हाल  इनसे भिन्न  न हो. इधर निजी क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों पर काम के लगातार बढ़ते जा रहे बोझ  और पेशेगत तनावों  की अकसर   चर्चा होती ही है. अपने देश में  भले ही इस तरह के काम के बारे में हमारी जानकारी सीमित हो, अमरीका में इस दिशा में जो  काम हुआ है उसके बारे  में काफी जानकारियाँ भी सुलभ हैं. अमरीका में इस बर्न आउट का मुकाबला करने के लिए बहुत सारे प्रयास हो रहे हैं. मसलन  वहाँ डॉक्टरों को उनके पेशे के तनावपूर्ण  माहौल का सामना करने में सक्षम बनाने के लिए उन्हें  अनेक सॉफ्ट स्किल्स  सिखाई जा रही हैं. और इस तरह के प्रयासों के सुपरिणाम भी सामने आने लगे हैं.  उदाहरण के लिए वहाँ के एक चिकित्सा संस्थान एमोरी  ने अपने स्टाफ, संकाय सदस्यों और विद्यार्थियों के लिए दस सप्ताह की अवधि का एक निशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम  चला रखा है जिसका प्रमुख लक्ष्य है संवेदना का संवर्धन. इस कार्यक्रम के लोगों की दिलचस्पी  लगातार बढ़ी है. दिलचस्प बात यह है की इस कार्यक्रम की मूल प्रेरणा तिब्बती बौद्ध मानसिक क्रियाओं से ली गई है और उसके  धार्मिक पक्ष को अलग रखते हुए इसे इस तरह विकसित किया गया है कि इस कार्यक्रम को पूरा  कर  लेने के बाद  संवेदनाओं  के प्रसार का अनुभव  होने लगता है. कार्यक्रम की  शुरुआत  होती है ध्यान विषयक  उन क्रियाओं के अभ्यास से जिनके केंद्र में स्वानुभव और स्वानुभूति होते हैं. इसके बाद क्रमश: अपनी संवेदनाओं  का प्रसार अपने प्रियजन तक कराया जाता है, और फिर उन्हें अनजान लोगों तक ले जाने का अभ्यास   कराया जाता है. इस कार्यक्रम की अंतिम कड़ी वह होती है जहां उन  लोगों के प्रति संवेदनशील होना सिखाया जाता है जिन्हें  आम तौर पर इस काम के लिए कठिन माना जाता है. इसी तरह का एक कार्यक्रम स्टैनफर्ड  मेडिसिन में भी संचालित होता है. उसकी अवधि आठ  सप्ताह की है और वह कार्यक्रम  सशुल्क है. स्वाभाविक ही है कि दूसरे   बहुत सारे संस्थानों में भी ऐसे कार्यक्रम  संचालित किए जा रहे हैं.

ये कार्यक्रम एक तरफ जहां प्रशिक्षुओं  की संवेदनशीलता   में इजाफा करते हैं वहीं दूसरी तरफ ये उनके  बर्न आउट को भी नियंत्रित कर  उन्हें अधिक सामर्थ्य के साथ अपने कर्तव्य निर्वहन  में  सहायता प्रदान करते हैं.  अमरीका में बाकायदा इस  तरह के कार्यक्रमों के प्रभावों का  अध्ययन भी किया गया है और उनसे ज्ञात हुआ है कि ये कार्यक्रम अपने मकसद को पूरा करने में बहुत सफल रहे हैं. जिन्होने इनमें  भाग लिया  उनकी संवेदनशीलता तो बढ़ी हुई पाई ही गई, खुद वे भी कम अवसादग्रस्त और   मानसिक रूप से अधिक स्वस्थ और सजग पाए  गए.

यह बात निर्विवाद  है कि आज सारी दुनिया में मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ता जा रहा है. इसके बहुत सारे कारण हैं. ऐसे में यह बात आश्वस्तिकारक लगती है  कि जागरूक समाजों में इन स्थितियों का सामना करने के लिए भी निरंतर कोशिशें हो रही हैं और वे कोशिशें काफी हद तक सफल भी साबित हो रही हैं.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 अगस्त, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, August 8, 2017

एक छोटे-से देश किर्गिस्तान के राष्ट्रपति की सबसे छोटी बेटी आलिया शागयीवा की सोशल मीडिया पर सार्वजनिक हुई एक तस्वीर से पूरी दुनिया में बहुत सारे लोग परेशान और उत्तेजित  हैं. इस तस्वीर में आलिया ने सिर्फ एक  अण्डरवियर पहन रखी है  और वे अपने बेटे को स्तनपान करा रही हैं. आलिया सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहती हैं और प्राय: अपने काम और परिवार की तस्वीरें पोस्ट करती रहती हैं. लेकिन उनकी इस तस्वीर पर इतनी अधिक प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं आईं कि उनके माता-पिता यानि राष्ट्रपति अल्माज़बेक आत्मबयेव और उनकी पत्नी राइसा तक विचलित हो गए. आलिया ने कहा कि “उन्हें यह पसंद नहीं आया. मैं यह बात समझ सकती हूं क्योंकि उनकी पीढ़ी की तुलना में युवा पीढ़ी कम रूढिवादी है.” खुद आलिया  का पक्ष यह था: “जब मैं अपने बच्चे को स्तनपान कराती हूं तो मुझे लगता है कि यह सबसे अच्छी  चीज़ है जो मैं उसे दे सकती हूं. मेरे लिए अपने बच्चे की ज़रूरतों को पूरा करना ज़्यादा ज़रूरी है ना कि लोगों की बातों पर ध्यान देना.” इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि “मुझे ईश्वर ने जो शरीर दिया है वो अश्लील नहीं है. यह  सुंदर शरीर है जो मेरे बेटे की सभी ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम है, इसे कामुकता की नज़र से नहीं देखा जाना चाहिए.” हालांकि आलिया इस तस्वीर को सोशल मीडिया से हटा चुकी हैं, एक पारम्परिक और रूढिवादी मुस्लिम बहुल देश की इस बोल्ड युवती की तस्वीर ने बहुत सारी बातों को विमर्श के केंद्र में ला दिया है. इस तस्वीर पर हुए विवाद के साथ ही अमरीकी पत्रिका टाइमके आवरण पर छपी उस चर्चित तस्वीर को भी याद कर लिया जाए जिसमें लॉस एंजिलस की रहने वाली 26 वर्षीया लाइन ग्रूमेट नामक एक मां अपने तीन बरस के बेटे को स्तनपान करा रही है, तो इस विमर्श के कुछ अन्य आयाम भी सामने आते हैं.

पहले  बात आलिया की. उनके छोटे-से मुल्क किर्गिस्तान में महिलाएं बेझिझक सार्वजनिक स्थानों पर अपने शिशुओं को स्तनपान कराती देखी जा सकती हैं, लेकिन सामान्यत: ऐसा करते वक़्त वे अपने शरीर को किसी कपड़े से ढक लेती हैं. ब्रिटेन सहित कई अन्य देशों में भी यह सामान्य कृत्य बहस का मुद्दा बनता रहा है. कुछ समय पहले जब वहां के विख्यात क्लारिज होटल के एक रेस्तरां ने शिशु को स्तनपान कराती हुई एक महिला को अपनी देह ढकने को कहा तो वहां खासा विवाद उठ खड़ा हुआ था. इसी सिलसिले में यह बात भी याद की जा सकती है कि अफगानिस्तान की बहुत सारी महिलाओं ने यह कहा है कि वे औरों के सामने अपने शिशुओं को स्तनपान  नहीं करा सकती हैं और एक अफगानी स्त्री ने तो यह भी कहा है कि जब वे अपनी ननद के साथ बाज़ार गईं और उसे अपने शिशु को दूध पिलाना था तो उन्हें विवश होकर एक दुकान में जाकर कुछ खरीददारी करनी पड़ी तब जाकर वो  वहां अपने शिशु को स्तनपान करा सकीं. वहां भी उन्हें एक बड़े-से स्कार्फ़ से खुद को ढकना पड़ा. लेकिन तुर्की की एक महिला ने सोशल मीडिया पर यह भी लिखा है कि वे अपने शिशु को फीड करते वक़्त खुद को ढक लेना पसंद करती हैं. “मैं नहीं चाहती कि मैं जबरन खुद को औरों को दिखाऊं. दुनिया में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो स्तनों को सेक्स की निगाह से देखते हैं.” इसी बात को सैद्धांतिक जामा पहनाते हुए टोरण्टो विश्वविद्यालय की वीमन एण्ड जेंडर एक्सपर्ट विक्टोरिया ताहमासेबी ने इन शब्दों में व्यक्त किया है: “एक पूंजीपति की नज़र से देखें तो जब तक ब्रेस्ट को कामुक चीज़ बना कर रखा जाएगा, वो फ़ायदे की चीज़ बनी रहेगी. सार्वजनिक स्थानों में महिलाओं का स्तनपान कराना उन्हें कम सेक्सी बनाता है और इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जाता है.”

मैंने जिस दूसरे  विवाद का ज़िक्र किया उसमें आपत्ति इस बात पर की गई कि किसी स्त्री का तीन बरस की बड़ी उम्र के बच्चे को स्तनपान कराना उचित  नहीं है. खुद उस मां लाइन ग्रूमेट का कहना है कि उनकी मां ने तो उनके छह वर्ष की होने तक उन्हें अपना दूध पिलाया था. ग्रूमेट इस कृत्य को सहज-स्वाभाविक मानती हैं और उन्होंने तो अब इस पर लोगों की आपत्तियों का जवाब तक देना बंद कर दिया है. लेकिन इस तस्वीर और इस पर हुए विवाद ने अमरीका सहित कई देशों में बच्चों के लालन-पालन के तरीकों पर सार्थक बहस भी शुरु कर दी है. आलिया की तस्वीर के संदर्भ में विचारणीय यह बात भी है कि क्या एक स्त्री का अपने शिशु को स्तनपान कराना और ऐसा करते हुए की तस्वीर को किसी सोशल साइट पर साझा करना एक ही बात है? यही सवाल लाइन ग्रूमेट के कृत्य के संदर्भ में भी उठाया जाना चाहिए. लेकिन ज़माना तो आत्म प्रचार का है ना!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 08 अगस्त, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 25, 2017

कुछ समुदायों की घटती जनसंख्या भी है समस्या

सामान्यत: इस बात से सभी सहमत हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है इसकी बढ़ती हुई जनसंख्या. आज़ादी के बाद से विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने अंदाज़ में जनसंख्या वृद्धि पर काबू पाने के प्रयास किए हैं और उन प्रयासों को आंशिक सफलता भी मिली है. सोचा जा सकता है कि अगर वे प्रयास न किए गए होते तो आज हम किस हाल में होते. इसके बावज़ूद कुछ संगठन और लोग ऐसे भी हैं जो इस बात पर चिन्तित होते हैं कि कुछ जातियों/धर्मों को मानने वालों की जनसंख्या उतनी नहीं बढ़ रही है जितनी उनकी बढ़ रही है जिनसे उनको ख़तरा है. लेकिन अगर ऐसों की  बात न भी करें तो हमारे विविधता भरे देश में कम से कम एक समुदाय ऐसा मौज़ूद है जिसकी संख्या निरंतर छीजती जा रही है और यह समाज तेज़ी से विलुप्त होने की तरफ बढ़ रहा है. संकट इतना गहरा है कि अब सरकार की तरफ से और खुद इस समुदाय  के लोगों की तरफ से भी इस समुदाय की जनसंख्या बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं.

मैं बात पारसी समुदाय की कर रहा हूं. वही पारसी समुदाय, जिसकी चर्चा अपनी ख़ास जीवन शैली, सुरुचि, उच्च शैक्षिक स्तर और समृद्धि के लिए होती है. 1941 में देश में जहां पारसियों की संख्या 114,000 थी वहीं 2001 की जनगणना में ये 69 हज़ार से भी कम रह गए थे और 2011 की जनगणना में तो इनकी संख्या और भी  घटकर मात्र 57, 264 ही रह गई थी. इसी बात से चिंतित होकर भारत सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने पारसियों को अपनी आबादी बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के लिए सन 2013 से जियो पारसी’  नाम से एक अभियान चला रखा है.  इस अभियान के पहले चरण में, जो जल्दी ही पूरा होने वाला है, सरकार ने एक बड़ी राशि इस निमित्त प्रदान की है कि जिन पारसी युगलों की आय एक निश्चित सीमा से कम है उन्हें संतानोत्पत्ति विषयक उपचार कराने के लिए आर्थिक सहायता दी जा सके. इसके अलावा इस अभियान के अंतर्गत विज्ञापन, काउंसिलिंग और अन्य तरीकों से भी पारसियों को जनसंख्या बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. अभियान के शुरुआती समय में कई विज्ञापन ज़ारी किये गए जिनमें पारसियों से गर्भ निरोधक इस्तेमाल न करने का भी अनुरोध किया गया. ये तमाम बातें भारत सरकार की परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के खिलाफ़ हैं. एक तरफ जहां इस अभियान का जम कर उपहास हुआ वहीं दूसरी तरफ इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आये, लेकिन तीसरी तरफ़ खुद पारसी समुदाय के भीतर से कुछ लोगों ने इसका विरोध किया. यहां तक कहा  गया कि यह अभियान स्त्री को मात्र संतानोत्पत्ति करने वाली मान कर चलता है.

यह समझना भी ज़रूरी होगा कि आखिर क्यों पारसी जनसंख्या इतनी घटती जा रही है. असल में पारसी समुदाय एक सुगठित लेकिन बंद समुदाय है जहां जो कुछ भी बाहरी है वह सब निषिद्ध  है. अगर कोई महिला पारसी समुदाय से बाहर शादी कर लेती है तो वह पारसी नहीं रह जाती है, और अगर कोई किसी अन्य समुदाय से हो और किसी पारसी से विवाह कर ले तो उसके बच्चों को भी पारसी का दर्ज़ा नहीं दिया जाता है. किसी भी ग़ैर पारसी के लिए पारसी मंदिर में आना वर्जित  होता है. यही नहीं लगभग तीस प्रतिशत पारसी स्त्री-पुरुष तो विवाह ही नहीं करते हैं. देश में जो पारसी आबादी है उसमें से कम से कम तीस प्रतिशत की उम्र साठ से ऊपर है. और जैसे यह सब पर्याप्त न हो, देश में पारसियों की फर्टिलिटी दर मात्र 0.8 है जबकि औसत भारतीयों में यह दर 2.3 है. यहीं यह भी याद कर लिया जाना उपयुक्त होगा कि जब फर्टिलिटी दर 2.1 होती है तो जनसंख्या स्थिर  हो जाती है.

इस अभियान का विरोध करने वालों का कहना है कि पारसियों को ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए उकसाने की बजाय पारसी संस्कृति की रक्षा और उसके संवर्धन के लिए प्रयास किये जाने चाहिए. लेकिन समझा जा सकता है कि यह तर्क  महज़ विरोध करने के लिए दिया गया तर्क है. अगर पारसी संस्कृति का बहुत ज़्यादा समर्थन किया जाएगा तो यह समुदाय सिकुड़ते-सिकुड़ते लुप्त ही हो जाएगा. जब आप अपने तमाम खिड़की दरवाज़े बंद कर देंगे तो यही होगा. और यही वजह है कि पारसी समुदाय के भीतर से भी आम तौर पर इस सरकारी पहल का स्वागत हो रहा है और समझदार लोग कहने लगे हैं कि यह अभियान काफी पहले शुरु कर दिया जाना चाहिए  था. यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि यह सरकारी अभियान पारसी समुदाय को बचा पाने में कितना सफल रहता है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 25 जुलाई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, July 18, 2017

कुत्ता पुराण उर्फ़ अच्छे परिवारों के कुत्ते भी अच्छे होते हैं!

अगर कोई व्यक्ति अमरीका के किसी बड़े शहर में कोई घर या अपार्टमेण्ट खरीदना या किराये पर लेना चाहे तो उसे न सिर्फ अपनी आर्थिक-सामाजिक  स्थिति, अपने परिवार आदि के बारे में आश्वस्तिदायक एवम प्रामाणिक जानकारियां सुलभ करानी होती हैं, अगर वो पालतू कुत्ता भी रखता है तो उसे उस कुत्ते के खानदान और चाल-चलन के बारे में भी समुचित और सत्यापित जानकारियां देनी होती हैं. न सिर्फ इतना, बहुत सारे अपार्टमेण्ट प्रबंधन तो बाकायदा कुत्तों के इण्टरव्यू भी लेने लगे हैं. एक भावी किरायेदार ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया है कि उनसे उनके और उनके परिवार के बारे में जितने सवाल-जवाब किये गए उससे कहीं ज़्यादा सवाल उनके कुत्ते से पूछे गए. और कुत्तों को लेकर यह सजगता केवल अमरीका में ही नहीं बरती जा रही है. कनाडा और ऑस्ट्रेलिया  से भी ऐसी ही ख़बरें आ रही हैं. शायद दुनिया के और भी अनेक देशों में यह चलन हो गया हो कि किसी को मकान किराये पर देने से पहले उसके पालतू कुत्ते के बारे में भी आश्वस्त हो जाया जाए ताकि वहां रहने वाले अन्य लोगों को कोई असुविधा न हो. यहीं यह स्मरण कर लेना भी प्रासंगिक होगा कि पश्चिमी देशों में नागरिक सुविधाओं की सुनिश्चितता पर बहुत ज़ोर रहता है. कोई भी किसी अन्य को अपनी छोटी से छोटी सुविधा या अधिकार का हनन नहीं करने देता है और सरकारें भी इस काम में मददगार साबित होती हैं. इन सारी बातों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए.  

इन देशों में जब इतना सब हो रहा है तो बहुत स्वाभाविक है कि उद्यमी लोग इसमें भी अपना रोज़गार और मुनाफ़ा खोज लें. अमरीका में, जहां जानवर पालने का चलन खूब है,  पालतू जानवरों की एक पूरी की पूरी इण्डस्ट्री ही उठ खड़ी हुई है, जो उनके मालिकों को मकान दिलवाने में मदद करने के लिए इन पालतू कुत्तों का डीएनए  टेस्ट करवाती हैं, उनकी वंशावली प्रमाणित करती है, उनके खानदानी होने का प्रमाण पत्र प्रदान  करती है, उनके फोटो शूट करवाती है ( बतर्ज़ प्रोपोज़ल फोटोज़!) और ज़रूरत पड़ने पर उनके सद व्यवहार के प्रमाण पत्र भी ज़ारी करती है.  और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, वहां एक अमरीकन  कैनल क्लब तक है जो कुत्तों के लिए गुड सिटिजन सर्टिफिकेट कोर्स भी  संचालित करता है. काफी पुराने इस क्लब की  प्रगति का यह आलम है कि जहां साल 1989 में इस क्लब ने सिर्फ  1300 कुत्तों को ग्रेजुएट की उपाधि प्रदान की थी, पिछले बरस इस संस्थान से 65,000 श्वान स्नातक हुए. अकेले न्यूयॉर्क शहर में इस क्लब के 75 मान्य इंस्ट्रक्टर्स  और परीक्षक हैं, जो हर बरस कम से कम 2500 कुत्तों की परीक्षा लेते हैं. इसी तरह के अन्य भी  अनेक संस्थान हैं. इनके प्रमाण पत्र व अनुशंसा पत्र बहुत मूल्यवान माने जाते हैं. 

बहुत सारे ऐसे संस्थान भी खुल गए हैं जो भावी मकान मालिक द्वारा लिये जाने वाले इण्टरव्यू के लिए कुत्तों को प्रशिक्षित  करते हैं. ऐसे ही एक संस्थान के कैनाइन गुड सिटिजन प्रोग्राम  के अंतर्गत  कुत्तों को दस स्किल्स सिखाई जाती हैं जिनमें निर्देश पर बैठ जाना और कहने पर अपरिचितों के साथ शालीनता से पेश आना भी शामिल होता है. लेकिन मज़े की बात यह कि अपने देश की तरह परदेस में भी ऐसे प्रतिभाशाली लोग कम नहीं हैं जो हर चीज़ के लिए वैकल्पिक शॉर्ट कट तलाश लेते हैं. वहां भी उस्ताद लोग  प्रशिक्षण की परेशानी  से बचने के लिए अपने कुत्तों को या तो नशीली दवा खिला देते हैं या फिर इण्टरव्यू से ठीक पहले उन्हें इतना थका डालते हैं कि वे इण्टरव्यू के वक्त आक्रामक व्यवहार कर ही नहीं पाते हैं. अनेक इमारतों में कुत्तों की अधिकतम वज़न सीमा भी निर्धारित होती है जिसकी पालनार्थ लोग अपने कुत्तों  को कई दिन भूखा तक रखते हैं. बहुत सारी इमारतों में कुछ ख़ास नस्लों के कुत्तों को वर्जित करार दिया जाता है और इसका तोड़ उस्तादों ने यह निकाला है कि वे उनका डीएनए परीक्षण  करवा कर यह स्थापित कर देते हैं कि वह कुत्ता उस नस्ल का नहीं है जिसका नज़र आ रहा है.

कुल मिलाकर तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल ज़ारी है. असल में रिहायशी इलाकों और इमारतों का प्रबंधन करने वाले चाहते हैं कि किसी के भी पालतू कुत्ते से औरों को कोई  असुविधा न हो. इसी लिहाज़ से न्यूयॉर्क  के एक सम्पन्न रिहायशी इलाके की एक प्रतिष्ठित बिल्डिंग ने तो अपने यहां एक डॉग इण्टरव्यूवर  की नियुक्ति की है जो भावी किरायेदारों के कुत्तों का बाकायदा इण्टरव्यू लेती हैं. यह भद्र महिला उम्मीदवार श्वान को अपने साथ काम करने वाली लड़कियों से मिलवाती है और फिर उसकी प्रतिक्रिया को परखती हैं. वे खुद भी उस कुत्ते को छू कर उसकी प्रतिक्रिया  का आकलन करती हैं. इस भद्र महिला का यह कथन बहुत अर्थपूर्ण है कि अच्छे परिवारों के कुत्ते भी अच्छे होते हैं!


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 जुलाई, 2017 को अमरीका में उद्योग बना पालतू जानवरों का शौक शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.