Tuesday, April 17, 2018

खूब फल फूल रहा है हमारी निजता का कारोबार!


हमारे-आपके जीवन के बारे में न जाने कितनी जानकारियों, जिन्हें आजकल डाटा  कहा जाता है, के दम पर अनगिनत लोगों और कम्पनियों का धंधा फल फूल रहा है. इस तरह का अध्ययन कर रही एक कम्पनी प्राइवेसी इण्टरनेशनल के एक उच्च अधिकारी का कहना है कि आज हज़ारों कम्पनियां आपका डाटा बटोरने और आपके ऑनलाइन बर्ताव की पड़ताल करने के काम में लगी  हुई हैं. यह धंधा सारी दुनिया में फैला हुआ है.   

हाल में एक टैक्नोलॉजी  पत्रकार कश्मीर हिल ने एक अभिनव लेकिन दिलचस्प प्रयोग किया. उन्होंने अपने एक बेडरूम वाले अपार्टमेण्ट को स्मार्ट होम में तब्दील किया और उसके बाद विभिन्न साधनों  की मदद से यह पड़ताल की कि उनके घर में लगे विभिन्न उपकरणों के माध्यम से उनकी निर्माता कम्पनियों ने उनके बारे में कितना डाटा संग्रहित किया है. वे यह जानकर आशचर्यचकित रह गईं कि उनका स्मार्ट टूथ ब्रश अपनी निर्माता  कम्पनी को यह खबर दे रहा था कि उन्होंने कब ब्रश किया और कब नहीं किया, उनका स्मार्ट टीवी अपने निर्माता को हर पल यह बता रहा था कि वे कौन-सा प्रोग्राम देख रही हैं, और उनका स्मार्ट स्पीकर दुनिया के सबसे बड़े ऑनलाइन खुदरा व्यापारी को (जो कि उस स्पीकर का निर्माता भी है) हर तीसरे मिनिट उनके बारे में जानकारियां मुहैया करवा रहा था. पत्रकार कश्मीर हिल ने यह पड़ताल करने के लिए अपनी एक दोस्त सूर्या मट्टू की मदद ली जिन्होंने एक विशेष रूप से बनाए गए वाई फाई राउटर की मदद से इन जासूसों की जासूसी की. इन जानकारियों के बाद कश्मीर हिल यह सोचकर और ज़्यादा चिंतित हुईं कि अगर उनके यहां से भेजी जा रही ज्ञात जानकारियां इतनी ज़्यादा हैं तो वे जानकारियां कितनी अधिक होंगी जिनके बारे में उन्हें भी अभी पता नहीं चल सका है. उन्होंने बहुत व्यथित होकर कहा कि मुझे लगता है कि हम एक निहायत ही व्यावसायिक निज़ाम में रह रहे हैं जिसकी नज़र हमारे हर क्रियाकलाप पर है.

इसी संदर्भ में यह भी याद कर लिया जाना उपयुक्त होगा कि हाल में इस आशय की ख़बरों ने बड़ा हंगामा बरपा किया था कि फ़ेसबुक के लगभग पौने नौ करोड़ उपयोगकर्ताओं की प्रोफ़ाइल सूचनाएं बग़ैर उनकी जानकारी के एक मार्केटिंग कम्पनी कैम्ब्रिज एनेलिटिका तक पहुंचा दी गई हैं. हाल में फ़ेसबुक के सीईओ मार्क ज़ुकरबर्ग ने इस बात पर सार्वाजनिक क्षमा याचना भी की है. लेकिन यह कोई अपनी तरह का इकलौता मामला नहीं है. एक बरस पहले एक स्मार्ट टीवी निर्माता पर भी इस  आशय के आरोप लगे थे  कि उसने बग़ैर अपने ग्राहकों को सूचित किए या उनसे अनुमति लिए उनके टीवी सेट्स में ऐसा सॉफ्टवेयर लगा दिया था जो उनके टीवी देखने की आदतों के  बारे में जानकारियां एकत्रित कर रहा  था. ये जानकारियां विभिन्न कम्पनियों को उपलब्ध कराई जा रही थीं ताकि इनके आधार पर वे अपने विज्ञापन प्रसारित कर सकें. तब इस टीवी निर्माता कम्पनी ने  इस बारे में अमरीकी फेडरल ट्रेड कमीशन में चल रहे एक मुकदमे में भारी धनराशि चुका कर अदालत के बाहर समझौता किया था.

असल में होता यह है कि हममें से बहुत सारे लोग बिना पैसे खर्च किये बहुत सारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने के लालच में न केवल अपने बारे में बहुत सारी जानकारियां खुद परोस देते हैं, उनके निर्बाध इस्तेमाल की अनुमति भी प्रदान कर देते हैं. जब भी हम कोई मुफ्त वाला सॉफ्टवेयर या एप डाउनलोड करते हैं, एक सहमति सूचक बटन –एग्री-  पर भी हमें क्लिक करना होता है और हममें से शायद ही किसी के पास इतना धैर्य  हो कि यह जानने की कोशिश करें कि हम किस बात के लिए अपनी सहमति दे रहे हैं. अमरीका की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के दो शोधकर्ताओं ने बताया है कि अगर आप हर एप की प्राइवेसी पॉलिसी को स्वीकार करने से पहले ठीक से पढ़ना चाहें तो आपको हर रोज़ आठ घण्टे लगाकर पूरे 76 दिन तक पढ़ते रहना होगा.  लेकिन मामला विस्तार का ही नहीं है. इस सहमति की आड़ में हमारी जानकारियों का जो सौदा होता है वह प्राय: विधि सम्मत नहीं होता है.

शायद यही वजह है कि अब दुनिया के कई देश इस बे‌ईमानी के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं. हाल में यूरोप में जो जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेग्युलेशन (जीडीपीआर) लागू हुआ है वह वहां के उपभोक्ताओं को उनके डाटा पर अधिक नियंत्रण के लिए सक्षमता प्रदान  कर रहा है. लेकिन अमरीका इस मामले में अभी भी पीछे है. वहां के नागरिकों को यह जानने का भी हक़ नहीं है कि किस कम्पनी ने उनके बारे में कौन-सा डाटा संग्रहित किया है. इस बारे में अपने देश की तो बात ही क्या की जाए! आधार को लेकर जो आशंकाएं व्यक्त की गई हैं और जो छिट पुट चिंताजनक ख़बरें आई हैं उन्होंने भी कोई गम्भीर हलचल अपने यहां पैदा नहीं की है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 अप्रैल, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 10, 2018

एक चौंकाने वाला प्रयोग और उसमें से निकली नई सोच!


लीजिए, अब एक नई शोध ने जो बताया है उससे आप भी  यह सोचने लगेंगे कि बच्चों को स्कूल भेजा जाए या नहीं! हम सभी अपने बच्चों को उनके बहुमुखी विकास के लिए स्कूल भेजते हैं. लेकिन हाल में हुई एक शोध ने जो बताया है वह तो इसका उलट है. मैं आपके धैर्य की अधिक परीक्षा नहीं लेना चाहता इसलिए सारी बात सिलसिलेवार बता देता हूं.

हुआ यह कि नासा ने दो बहुत विख्यात विशेषज्ञों डॉ जॉर्ज लैण्ड और बेथ जार्मान को एक ऐसा  अत्यधिक विशेषीकृत टेस्ट विकसित करने का दायित्व सौंपा  जो नासा के रॉकेट वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की सर्जनात्मक संभावनाओं का समुचित आकलन कर सके. इन विशेषज्ञों ने एक  टेस्ट का निर्माण किया और नासा ने भी उसे अपने लिए बहुत उपयोगी पाया. बात यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए थी, लेकिन हुई नहीं. टेस्ट पूरा हो जाने के बाद ये दोनों विशेषज्ञ और इनके साथी एक और सवाल से जूझने  लगे. सवाल यह था कि आखिर सर्जनात्मकता का उद्गम क्या है? वो कहां से आती है?  क्या यह कुछ लोगों में जन्म  से ही होती है, या इसे शिक्षा से अर्जित किया जाता है? और या फिर इसे अनुभवों से हासिल  किया  जाता है!

और इस सवाल से जूझते हुए इन वैज्ञानिकों ने चार और पांच बरस की उम्र वाले सोलह सौ बच्चों को एक टेस्ट दिया. असल में इस टेस्ट में कुछ समस्याएं दी गई थीं और उनको हल करने के लिए बच्चों ने जो जवाब दिये थे उन्हें इस कसौटी पर गया कि समस्याओं को सुलझाने के बच्चों के तरीके  कितने अलहदा,  कितने नए और कितने मौलिक हैं. इस टेस्ट के परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे. आप भी यह जानकर आश्चर्य से उछल पड़ेंगे कि चार से पांच बरस की उम्र वाले अट्ठानवे  प्रतिशत बच्चे उन वैज्ञानिकों की कसौटी पर जीनियस साबित हुए. अब शायद इन वैज्ञानिकों को भी अपनी शोध में मज़ा आने लगा था, सो इन्होंने  पांच बरस  बाद फिर से इन बच्चों को परखा. तब ये बच्चे दस बरस की उम्र के आसपास पहुंच गए थे. अब जो परिणाम आए वो और भी ज़्यादा चौंकाने वाले थे. अब इन्होंने पाया कि उन अट्ठानवे  प्रतिशत जीनियस बच्चों में से मात्र तीस  प्रतिशत बच्चे ही कल्पनाशीलता के स्तर पर जीनियस कहलाने के काबिल रह गए हैं. पांच बरस बाद फिर से इस प्रयोग को दुहराया गया और तब पाया गया कि पंद्रह बरस के हो चुके  इन बच्चों में मात्र बारह प्रतिशत बच्चे ही जीनियस कहलाने काबिल रहे हैं. और इसके बाद इन वैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष  दिया है वह तो हम सब को अपने मुंह छिपाने के लिए विवश कर देगा. उनका कहना है हम वयस्कों में तो मात्र दो प्रतिशत ही जीनियस कहलाने के हक़दार होते हैं!

यह कहना अनावश्यक है कि पांच, दस और पंद्रह बरस के जिन बच्चों पर यह टेस्ट किया गया वे सभी स्कूल जाने वाले बच्चे थे.  तो क्या यह समझा जा सकता है कि स्कूल, या कि हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों की सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करने की बजाय उसे कुचलती है? इसका जवाब मिलता है जोहानिसबर्ग में पले बढ़े और अब अमरीका वासी एक चर्चित लेखक गाविन नासिमेण्टो  के इस कथन में: “जिस संस्था को हम ऐतिहासिक रूप से स्कूल के नाम  से जानते हैं, उसका तो निर्माण ही शासक वर्ग की -न कि आम लोगों  की-  सेवा के लिए हुआ है.” अपनी बात को और साफ़ करते हुए गाविन कहते हैं, “उन्होंने यह भली भांति समझ लिया है कि तथाकथित अभिजन की ठाठदार विलासिता वाली उस जीवन शैली के निर्वहन के लिए जिसमें वे बहुत कम देकर बहुत ज़्यादा का उपभोग करते हैं,  बच्चों को बेवक़ूफ बनाया जाना और कृत्रिम अभावों की लालची व्यवस्था, अंतहीन शोषण और अनवरत युद्धों के स्वीकार के लिए ही नहीं बल्कि इनकी सेवा के लिए भी उनके दिमागों का अनुकूलन ज़रूरी है.” मुझे नहीं लगता कि वर्तमान स्कूलों पर इससे कड़ी टिप्पणी कोई और हो सकती है!

चलिये, फिर डॉ लैण्ड की तरफ लौटते हैं. उनका कहना है कि हम सबमें यह क्षमता है कि अगर हम चाहें तो अट्ठानवे  प्रतिशत यानि जीनियसों में शुमार हो सकते हैं. इसके लिए करना बस इतना है कि हम अपने आप को पांच साल के बच्चे में तब्दील कर लें. इस डर से निजात पा लें कि अगर ऐसा करेंगे तो ऐसा हो जाएगा. मुक्त ढंग से सोचना और सपने देखना शुरु करें. वे एक उदाहरण देकर अपनी बात साफ़ करते हैं. अगर किसी छोटे बच्चे के सामने  एक फॉर्क (टेबल पर रखा जाने वाला कांटा) रखें तो वो उसे बेहतर बनाने के लिए फटाफट अनेक सुझाव दे देगा. बस! हम भी उस जैसे बिंदास  बन जाएं! ठीक है ना?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 10 अप्रैल, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 3, 2018

एक पत्रकार की हत्या ने छीन ली प्रधानमंत्री की कुर्सी


स्लोवाकिया यूरोप महाद्वीप का मात्र 55 लाख की आबादी वाला एक छोटा-सा देश है. उत्तर में पोलैण्ड, दक्षिण में हंगरी, पूर्व में यूक्रेन और पश्चिम में ऑस्ट्रिया तथा चेक गणराज्य यानि चारों तरफ ज़मीन से  घिरा यह देश पहले चेकोस्लोवाकिया का अंग था. अब स्लोवाकिया एक संसदीय गणतंत्र है और इसकी राष्ट्रीय परिषद में एक सौ पचास सदस्य होते हैं जिनको हर चौथे बरस आम जनता चुनती है. यहां राष्ट्रपति का चुनाव भी आम जनता के मतों से ही होता है लेकिन सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है. सन 2012 से स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री डाइरेक्शन-सोशल डेमोक्रेसी पार्टी के नेता 54 वर्षीय रॉबर्ट  फिको थे. लम्बे समय से देश की राजनीति में सक्रिय फिको 2006 से 2010 तक भी देश के प्रधानमंत्री रह चुके थे.

आजकल सारी दुनिया में सर्वशक्तिमान नेताओं का जो दौर चल रहा है फिको भी उसके अपवाद नहीं थे. एक शानदार हिलटॉप  अपार्टमेण्ट  में पूरी शान-ओ-शौकत से रहने वाले फिको पत्रकारों  के असुविधाजनक सवालों पर न केवल गुर्राया करते थे, उन्हें लकड़बग्घा (हायना) और प्रॉस्टीट्यूट तक कह दिया करते थे. अपने देश की तमाम मुसीबतों का ठीकरा वे मुस्लिम शरणार्थियों और एक यहूदी फाइनेंसर के माथे फोड़ देने के आदी थे. उनकी पार्टी स्लोवाक कुलीनों, रूसी ताकतवरों और इतालवी माफियाओं से गलबहियां करने के लिए विख्यात थी.

लेकिन अचानक वो घटित हो गया, जो कल्पनातीत था. 15 मार्च को इस सर्वशक्तिमान प्रधान मंत्री को अपना इस्तीफा देने के लिए मज़बूर होना पड़ा. इस इस्तीफे की वजह बहुत मामूली थी. एक साधारण पत्रकार और उसकी महिला मित्र की रहस्यमयी स्थितियों में मृत्यु. 26 फरवरी 2018 को एक युवा पत्रकार जेन कुसियाक और उनकी मित्र मार्टिना कुसनिरोवा को गोली मार दी गई. अनुमान यह लगाया गया कि इस हत्या के पीछे यह बात थी कि जेन एक अहम स्टोरी पर काम कर रहे थे जिसका ताल्लुक स्लोवाकिया  के बड़े बड़े नेताओं और इटली के माफिया गिरोहों के बीच के संदिग्ध रिश्तों से था. कुसियाक ने बताया था कि किस तरह इटली के अपराधी गिरोह स्थानीय नेताओं, ख़ास तौर पर सत्तारूढ़ दल के नेताओं की मदद से पूर्वी स्लोवाकिया  के निर्धन इलाकों में घुसपैठ करते हैं. कुसियाक ने यह बात भी उजागर की थी कि ये नेता यूरोपियन यूनियन के धन का दुरुपयोग करते हैं. वैसे स्लोवाकिया में भ्रष्टाचार की चर्चाएं इतनी आम हैं कि एक बार तो अमरीका की  सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मैडलिन अलब्राइट ने स्लोवाकिया को यूरोप का ब्लैक होल तक कह दिया था. हत्या के बाद कुसियाक की यह स्टोरी दुनिया भर में प्रकाशित हुई है. इस दोहरे हत्याकाण्ड ने स्लोवाकिया के जन मानस को इतना क्षुब्ध किया कि वहां एक सशक्त जन आंदोलन खड़ा हो गया. लोगों ने जेन और मार्टिना की तस्वीरें लेकर खूब प्रदर्शन किये. करीब दो सप्ताहों के प्रदर्शन और सजीव जन आंदोलन तथा तेज़ी से चले राजनीतिक घटना चक्र  की परिणति रॉबर्ट  फिको जैसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री  के त्यागपत्र में हुई. त्यागपत्र देते हुए भी रॉबर्ट फिको यह कहने से नहीं चूके कि जेन और मार्टिना की हत्या की बात करने वाले अपना निजी एजेंडा पूरा कर रहे हैं.

वैसे रॉबर्ट फिको ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह घोषणा की थी कि जेन और मार्टिना के हत्यारों को खोज निकालने वाले को करीब आठ करोड़ रुपयों का पुरस्कार दिया जाएगा, और  जिस समय वे यह घोषणा कर रहे थे तब उनके सामने की टेबल पर यह धनराशि भी प्रदर्शित की गई थी. उनके इस कृत्य पर  स्लोवाकिया वासियों ने यह कहकर खूब नाराज़गी व्यक्त की थी कि आखिर कोई प्रधानमंत्री इस तरह की अशिष्टता कैसे कर सकता है!

इस पूरे प्रकरण में एक और बात ग़ौर तलब है. जब राष्ट्रपति ने फिको का इस्तीफा स्वीकार किया तो उनकी जगह लेने के लिए उनके डेप्युटी पीटर पेलेग्रिनी ने सरकार बनाने का दावा पेश किया. लेकिन राष्ट्रपति महोदय ने उनके दावे को नामंज़ूर कर दिया. वजह? वे इस बात से आश्वस्त नहीं थे कि पीटर पेलेग्रिनी की नई सरकार जेन और मार्टिना की हत्या की निष्पक्ष जांच करा सकेगी. इसके मूल में यह बात  थी कि जेन की आखिरी रिपोर्ट में सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार पर गम्भीर आरोप लगाए गए थे, और राष्ट्रपति महोदय का खयाल था कि जिस दल पर इस हत्या काण्ड में लिप्त होने का संदेह है भला उसी दल का कोई नेता इस काण्ड की निष्पक्ष जांच  कैसे करा  सकता है! स्लोवाकिया में रॉबर्ट फिको और पीटर पेलेग्रिनी की नज़दीकी सबको मालूम थी. राष्ट्रपति महोदय ने ज़ोर देकर कहा है कि नई सरकार को जनता का भरोसा जीतना होगा. उधर स्लोवाकिया की जनता की सबसे बड़ी मांग फिलहाल यही है कि जेन और उसकी मित्र मार्टिना की हत्या की निष्पक्ष  जांच हो और अपराधियों को सज़ा मिले. जनता फिर से चुनाव करवाने की भी मांग कर रही है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 अप्रेल, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 27, 2018

कैमरून में पूरे पैतीस बरसों से जमे हुए हैं पॉल बिया


हाल में भारतीय समाचार माध्यमों में इस बात की काफी चर्चा रही थी कि चीन की सत्ताधारी कम्यूनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पद पर अपने किसी सदस्य को अधिकतम दो कार्यकाल देने का संवैधानिक प्रावधान हटाने का प्रस्ताव रखा है. वर्तमान प्रावधानों के मुताबिक चीन के राष्ट्रपति एक साथ दो कार्यकाल तक पद पर बने रह सकते हैं. चीन में यह व्यवस्था 1982 से लागू है और इसके तहत राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है. अगर यह प्रस्ताव लागू हो जाता है तो चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2023 में खत्म हो रहे अपने दूसरे कार्यकाल के बाद भी अपने  पद पर बने रह सकते हैं. राजनीति के जानकारों का खयाल है कि इस संवैधानिक  बदलाव का असल मक़सद शी जिनपिंग को उनके दूसरे कार्यकाल के बाद भी अनिश्चित काल तक इस पद पर बनाये रखना है.

इस चर्चा से मुझे अनायास ही दुनिया के एक अन्य देश के राष्ट्रपति पॉल बिया का ध्यान आ गया जो पिछले पैंतीस बरसों से यानि 1982 से अपने पद पर बने हुए हैं.  ये पॉल बिया 23.44 मिलियन की आबादी वाले मध्य और पश्चिम अफ्रीका में स्थित देश कैमरून के राष्ट्रपति हैं. कैमरून की भौगोलिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक विशेषताओं के कारण इसे अफ्रीका इन मिनिएचर के नाम से भी जाना जाता है. कैमरून में दो सौ से भी अधिक जन जातियां और भाषाई समूह निवास करते हैं. भारत में हमने हाल के दिनों में बोको हरम नामक एक बलवाई संगठन की गतिविधियों के संदर्भ में भी इस देश का नाम पढ़ा-सुना था. कैमरून के इन 85 वर्षीय राष्ट्रपति महोदय की गणना अफ्रीका में सर्वाधिक समय तक सत्तासीन रहे राजनेताओं में से एक के रूप में होती है. मज़े की बात यह है कि कैमरून की साठ प्रतिशत आबादी पच्चीस साल से कम उम्र वाले युवाओं की है और पॉल बिया उनके जन्म के पहले से इस पद पर जमे हुए हैं. लेकिन ये युवा जिस ताज़ा हवा में सांस ले रहे हैं उसमें  सैटेलाइट टीवी और इण्टरनेट के ज़रिये आने वाली जानकारियां भी हैं जिनसे इन्हें दुनिया के अन्य देशों में हो रहे बदलावों की जानकारियां मिलती रहती हैं. यही वजह है कि अब आहिस्ता-आहिस्ता कैमरून में इन राष्ट्रपति महोदय के प्रति असंतोष की आवाज़ें सुनाई देने लगी हैं. लोग इस बात को याद करने लगे हैं कि सन 2008 तक वहां राष्ट्रपति के कार्यकाल की सीमाएं तै थीं लेकिन उन सीमाओं को हटा लेने के कारण ही पॉल बिया 2011 में पुन: अपने पद पर निर्वाचित कर लिये गए. इस बरस अक्टोबर में वहां फिर से चुनाव होने हैं लेकिन अब तक तो पॉल बिया ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वे इस पद पर फिर निर्वाचित नहीं होना चाहेंगे.

पॉल बिया की सबसे अधिक आलोचना उनकी उस कार्यशैली की वजह से होती है जिसके कारण उन्हें अनुपस्थित राष्ट्रपति नाम से पुकारा जाने लगा है. यह बात याद की जाने लगी है कि अभी हाल ही में, दो बरस से भी अधिक समय के बाद उन्होंने अपनी पहली काबिना बैठक बुलाई है. इसके अलावा उनकी विदेश यात्राएं भी वहां खासी चर्चा और आलोचना का विषय बनी हुई हैं. बल्कि इन यात्राओं को लेकर तो वहां के सरकारी अख़बार कैमरून ट्रिब्यून और ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम एण्ड करप्शन रिपोर्टिंग नामक एक स्वतंत्र प्रोजेक्ट के बीच अच्छी खासी बहस हो चुकी है. इस प्रोजेक्ट ने विभिन्न समाचार पत्रों के हवाले से यह बात कही है कि राष्ट्रपति महोदय पिछले एक बरस में अपनी निजी यात्राओं पर करीब साठ दिन देश से बाहर रहे हैं. इस प्रोजेक्ट ने यह भी बताया है कि 2006 और 2009 में राष्ट्रपति महोदय एक तिहाई समय देश से बाहर रहे हैं. बताया गया कि विदेश में राष्ट्रपति महोदय जेनेवा के इण्टरकॉण्टीनेण्टल  होटल में समय व्यतीत करना पसंद करते हैं. जैसा कि इस तरह के सारे मामलों में होता है, कैमरून के सरकारी अखबार ने इन रिपोर्ट्स को चुनावी प्रोपोगैण्डा कहकर नकार दिया है.

पॉल बिया भले ही अपनी कुर्सी पर जमे बैठे हों, उनके देश के हालात कुछ ठीक नहीं हैं. सरकार बहुत निर्ममता से प्रतिपक्ष को कुचलने में जुटी है. विरोधियों की मीटिंग्स पर रोक लगा दी गई है और विपक्षी दलों  के नेताओं को जेलों में डाला जा रहा है. विश्वविद्यालय परिसरों में राजनीतिक प्रतिरोध पर पाबंदियां  आयद कर दी गई और सुरक्षा टुकड़ियों ने शिक्षकों की हड़ताल को अपने पैरों तले रौंद डाला है. बोको हरम से निबटने के नाम पर नागरिक अधिकारों का खुलकर हनन किया जा रहा है. पत्रकारों की आवाज़ को दबाने के अनगिनत मामले भी सामने आ रहे  हैं. ऐसे हालात में सभी की दिलचस्पी इस बात में होगी कि अक्टोबर में पॉल बिया फिर से राष्ट्रपति चुने जाते हैं या नहीं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 27 मार्च, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, March 23, 2018

चाहे जो हो जाए हम सुप्रभात संदेश भेज कर ही मानेंगे!


अब तो यह बात प्रमाणित भी हो गई है कि जब बात गुड मैनर्स की हो रही हो तो इस गाने को याद कर लिया जाना चाहिए: “सबसे आगे होंगे हम हिंदुस्तानी!”  शादाब लाहौरी साहब ने क्या खूब लिखा था  कि “हज़ूर आपका भी एहतराम  करता चलूँ/ इधर से गुज़रा था सोचा सलाम करता चलूँ” लेकिन हम तो उनके सोच से भी काफी आगे निकल आए हैं. अब हम किसी के नज़दीक से गुज़रने पर ही उसे सलाम नहीं करते हैं, खुद बड़े  सबेरे जाग कर लोगों के घर-घर जाकर अपना सलाम पेश  करने लगे हैं. बेशक यह करने के लिए हम अपने मोबाइल फोन और इण्टरनेट का इस्तेमाल करते हैं. हममें से बहुत सारे लोग हर सुबह उठकर पहला काम अपने परिवार जन, दोस्तों और सामान्य जान पहचान वालों तक को भगवान, फूल पत्ती, उगते हुए सूर्य, किसी मासूम शिशु के प्यारे चेहरे या ऐसी ही किसी और तस्वीर के साथ सुप्रभात कहकर करते हैं. सुप्रभात कहने का यह उत्साह हममें इतना ज़्यादा है कि उन समूहों में घुसकर भी हम अभिवादन करने से बाज़ नहीं आते हैं जिनके एडमिन कई बार यह प्रार्थना कर चुके होते हैं कि कृपया यहां गुड मॉर्निंग के संदेश पोस्ट न करें! अगर मौका लग जाए तो हम ऐसे अशिष्ट एडमिन से जूझने में और उन्हें दो-चार सदाचारी उपदेश पिलाने में भी कोई संकोच नहीं करते हैं. आखिर शिष्टाचार भी कोई चीज़ होती है, साहब!

शिष्टाचार के प्रति हमारे इस लगाव पर प्रमाणीकरण की मुहर लगाई है गूगल ने. असल में हुआ यह कि जब गूगल वालों को यह बात पता चली कि इधर दुनिया भर में लोगों के स्मार्टफोन जल्दी-जल्दी फ्रीज़ होने लगे हैं, तो उन्होंने अपने शोधकर्ताओं को इसके कारण की पड़ताल करने का ज़िम्मा सौंपा. इन शोधकर्ताओं ने पाया कि इस समस्या के मूल में है भारतीयों का सुप्रभात  प्रेम! उन्होंने पाया कि इन शुभ कामना संदेशों की वजह से भारत में हर तीन में से एक स्मार्टफोन प्रयोगकर्ता के फोन की मेमोरी इतनी भर जाती है कि उसके बोझ तले वह फोन चीं बोल जाता है! अब ज़रा भारतीयों की इस संस्कारशीलता की तुलना संस्कारविहीन अमरीकियों से भी कर लीजिए. वहां हर दस में से एक फोन के साथ ही यह हादसा होता है! सुप्रभात को सलीके से, यानि किसी न किसी तस्वीर के साथ जोड़कर  कहने का भारतीयों का शौक इतना प्रबल है कि एक अमरीकी अखबार की पड़ताल के अनुसार पिछले पांच बरसों में गूगल पर गुड मॉर्निंग के साथ प्रयुक्त  की जा सकने वाली छवि की तलाश में दस गुना वृद्धि हुई है. ज़ाहिर है कि आपको या हमको सुबह-सुबह जो तस्वीरें मिलती हैं उनमें से ज़्यादातर  गूगल के भण्डार से ही निकाली गई होती हैं. वैसे इस मामले में पिंटरेस्ट नामक एक अन्य साइट भी पीछे नहीं रही है और वहां से भी सुप्रभात की तस्वीरें डाउनलोड करने वाले हिंदुस्तानियों की संख्या पिछले एक बरस में नौ गुना बढ़ी है.

सद्भावना या शिष्ट आचरण के प्रति हमारा यह अनुराग हर सुबह शाम अभिवादन करने तक ही सीमित नहीं है. हाल में वॉट्सएप वालों ने बताया है कि 2018 के पहले दिन हम भारतीयों ने 2000 करोड़ से भी ज़्यादा नव वर्ष शुभ कामना संदेशों का आदान-प्रदान किया.  यह संख्या दुनिया के किसी भी देश के निवासियों द्वारा उस दिन भेजे गए संदेशों से ज़्यादा थी. यहीं यह भी जान लें कि भारत में अकेले वॉट्सएप के 20 करोड़ सक्रिय प्रयोगकर्ता  हैं. वॉट्सएप के लिए यह संख्या इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण है कि इसी वजह से वे लोग भारतीयों की पसंद का विशेष ध्यान रखने लगे हैं और पिछले साल से तो उन्होंने ख़ास हमारे लिए एक ऐसा स्टेटस मैसेज जोड़ा है जिसके माध्यम से हम एक साथ अपने सभी सम्पर्कों को सुप्रभात कह सकते हैं! हम भारतीयों के शिष्टाचार निर्वहन के इस पुण्य कर्म में कम कीमत वाले स्मार्ट फोन्स और डेटा दरों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा के कारण आई ज़बर्दस्त कमी की बहुत बड़ी भूमिका है.

शिष्टाचार के निर्वहन का यह उत्साह कुछ लोगों में इतना ज़्यादा है कि अगर दो-चार दिन आप उनके संदेशों का जवाब न दें तो वे फोन कर पूछ भी लेते हैं क्या आपको उनके संदेश नहीं मिल रहे हैं? जो आपसे ज़्यादा नज़दीकी महसूस करते हैं वे आपकी बेरुखी पर मुंह फुला लेने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने में भी संकोच नहीं करते हैं. यहां यह बात भी याद आए बग़ैर नहीं रहेगी कि देश के एक शीर्षस्थ व्यक्तित्व ने पिछले दिनों सार्वजनिक  रूप से इस बात पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त की थी कि जिन्हें वे हर सुबह सुप्रभात संदेश भेजते हैं उनमें से बहुत सारे उनके अभिवादन का जवाब तक देने की शालीनता नहीं बरतते हैं!

हमारे अपनों के फोन की मेमोरी चाहे जितनी जल्दी फुल और उनका फोन ठस्स हो जाए, हम गुड मॉर्निंग-गुड ईवनिंग कहना कैसे छोड़ सकते हैं?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत शुक्रवार, 23 मार्च, 2018 को इसी शीर्षक सेे प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 13, 2018

डॉक्टरों ने कहा- हमारी तनख़्वाह मत बढ़ाओ!


कनाडा के क्यूबेक प्रांत के सैंकड़ों डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों ने अपनी सरकार को एक ज्ञापन देकर अपने बढ़े हुए वेतन का विरोध किया है और सरकार से अनुरोध किया है कि वह इस राशि का इस्तेमाल नर्सों के लिए तथा मरीज़ों को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने के लिए करे. यह बात सर्वविदित है कि कनाडा में सरकार सभी नागरिकों को निशुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान करती है. यह सुविधा मरीज़ की ज़रूरत पर आधारित होती है न कि उसकी खर्च करने की क्षमता पर. इसी फरवरी माह में वहां की सरकार ने अपने इस इलाके के मेडिकल स्पेशलिस्ट्स की तनख़्वाह में 1.4 प्रतिशत की वृद्धि करने की घोषणा की थी.

ऐसा माना जाता है कि क्यूबेक इलाके में डॉक्टरों को देश के अन्य इलाकों की तुलना में पहले ही ज़्यादा वेतन मिलता है. लेकिन इसी इलाके में नर्सों और अन्य चिकित्सा सेवकों की हालत बहुत बुरी है. इसी जनवरी में वहां की एक नर्स एमिली रिकार्ड की एक फेसबुक पोस्ट वायरल हुई थी जिसमें उसने अपनी नम आंखों की एक तस्वीर लगाते हुए बताया था कि उसे पूरी रात जागकर सत्तर मरीज़ों की देखभाल करनी पड़ी है और अब उसके पांव इतना दर्द कर रहे हैं कि वह सो भी नहीं पा रही है. उसने लिखा था कि वह अपने काम के बोझ से टूट चुकी है और उसे इस बात से शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि वो अपने मरीज़ों को कितनी कम सेवा दे पाती है. “हमारा स्वास्थ्य तंत्र बीमार और मरणासन्न है.” कल्पना की जा सकती है कि कितनी पीड़ा के साथ उसने यह लिखा होगा. कनाडा के नर्सिंग संघ ने भी सरकार पर ज़ोर डाला है कि वो यह सुनिश्चित करे कि एक नर्स को अधिकतम कितने मरीज़ों की देखभाल करनी है. क्यूबेक की नर्स यूनियन की अध्यक्ष नैंसी बेडार्ड का कहना था कि डॉक्टरों के लिए तो पैसों की कोई कमी नहीं होती है लेकिन मरीज़ों की देखभाल करने वाले औरों  की कोई परवाह नहीं की जाती है. 

नर्सों की इस व्यथा-कथा ने क्यूबेक के डॉक्टरों की अंतरात्मा को इस कदर झकझोरा कि उन्होंने एक ज्ञापन देकर अपनी सरकार से यह अनुरोध  कर दिया कि वह  उनके बढ़ाये हुए वेतन को निरस्त कर दे और इस तरह जो राशि बचे उसे बगैर स्वास्थ्य कर्मियों के कार्यभार को असह्य बनाए, क्यूबेक क्षेत्र के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में खर्च कर दे. अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि हमारी तनख़्वाहों में यह वृद्धि इसलिए और भी ज़्यादा आहत करने वाली है कि हमारी नर्सों, क्लर्कों और अन्य पेशेवरों को बहुत कठिन हालात में काम करना पड़ रहा है और हमारे मरीज़ों को हाल के वर्षों में की गई भीषण कटौतियों और सारी सत्ता के स्वास्थ्य मंत्रालय में केंद्रीकृत हो जाने की वजह से ज़रूरी सुविधाओं तक से वंचित रहना पड़ रहा है. इन तमाम कटौतियों का जिस एक बात पर कोई असर नहीं पड़ा है वो है हमारी तनख़्वाहें. और इसलिए इस वृद्धि को अभद्रबताते हुए उन्होंने लिखा, “हम क्यूबेक डॉक्टर यह अनुरोध कर रहे हैं कि चिकित्सकों को दी गई वेतन वृद्धि वापस ले ली जाए और इस तंत्र  के संसाधनों का बेहतर वितरण स्वास्थ्य कर्मियों की बेहतरी के लिए और क्यूबेक के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराने के लिए किया जाए.”

यह प्रकरण हमारी आंखें खोल देने वाला है. इससे पता चलता है कि एक ज़िम्मेदार और सभ्य समाज का चेहरा कैसा होता है. क्यूबेक के डॉक्टर चाहते तो बिना कोई ना-नुकर किये अपनी बढ़ी हुई तनख़्वाहें स्वीकार कर सकते थे. लेकिन उनके इंसान होने के एहसास ने उन्हें यह न करने दिया. अपने से ज़्यादा फिक्र उन्हें अपने सहकर्मियों की थी कि उन्हें कम तनख़्वाह में ज़्यादा समय खटना पड़ता है. उन्होंने इस बात की भी फिक्र की कि उनके प्रांत के नागरिकों को सरकारी कटौती की वजह से उस ज़रूरी स्वास्थ्य सेवा से वंचित रहना पड़ रहा है जिसके वे हक़दार हैं.

लेकिन सब जगह सब कुछ अच्छा  ही नहीं होता है. डॉक्टरों की इस संवेदनशीलता पर झाड़ू फेरते हुए  कनाडा के चिकित्सा मंत्री ने अपने बयान में कहा कि अगर डॉक्टरों को लगता है कि उन्हें ज़्यादा तनख़्वाहें दी जा रही हैं तो वे उसे  टेबल पर ही छोड़ जाएं.  मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूं कि हम उस रकम का बेहतर इस्तेमाल कर लेंगे. डॉक्टरों की इस व्यथा पर टिप्पणी करते हुए कि नर्सों को बहुत कम वेतन मिल रहा है और रोगियों पर होने वाले खर्च में कटौतियां की जा रही हैं, मंत्री जी ने फरमाया कि हमारे पास तमाम ज़रूरतों के लिए पैसा है और हम समय पर सारी समस्याएं हल कर लेंगे.

यानि मंत्री तो कनाडा में भी वैसे ही हैं जैसे अपने देश में हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ डुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 मार्च, 2018 को 'कनाडा के डॉक्टरों ने लौटाया बढ़ा हुआ वेतन' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, March 9, 2018

सवाल मानवीय सम्बंधों में तकनीक की घुसपैठ का

अनिरुद्ध रॉय चौधरी द्वारा निर्देशित 2016 की हिन्दी फिल्म पिंक में अमिताभ बच्चन का एक बेहद प्रभावशाली डायलॉग है: “नो मीन्स नो. ना सिर्फ़ एक शब्द नहीं, अपने आप में एक पूरा वाक्य है. इसे  किसी तर्क, स्पष्टीकरण, एक्स्प्लेनेशन या व्याख्या की ज़रूरत नहीं होती. ना का  मतलब ना ही होता है. माय क्लाएंट सेड नो युअर ऑनर!”  कहना  अनावश्यक है कि यहां चर्चा का संदर्भ स्त्री पुरुष के बीच का दैहिक सम्बंध है. इस  सम्बंध  को लेकर जितनी चर्चाएं और बहसें अपने देश में हुई हैं उनसे कम चर्चाएं परदेश में नहीं हुई हैं. इसी संदर्भ में यह जानना रोचक हो सकता है कि जहां भारत में ‘ना’ कहने के अधिकार को रेखांकित करना ज़रूरी समझा गया है, पश्चिम के कुछ देशों में इससे उलट ‘हां’ कहने के अधिकार को मान्यता प्रदान करने की भी ज़रूरत महसूस की जाने लगी थी. कई देशों के शैक्षिक संस्थानों में 1990 से ही यह नीति बनाई जाने लगी थी कि वहां के विद्यार्थी अंतरंग क्षणों के  इन सम्बंधों  की स्थापना के लिए बाकायदा मौखिक अनुमति प्रदान करें. एक अपेक्षाकृत उन्मुक्त और उदार देश स्वीडन में तो पिछली दिसम्बर में एक  ऐसा कानून बनाने का भी प्रस्ताव किया गया है जिसके तहत मौखिक स्वीकृति प्रदान करने के बाद ही कोई युगल दैहिक सम्पर्क स्थापित कर सकेगा. 

इसी प्रस्तावित कानून से प्रेरित होकर लीगल फ्लिंग नामक एक वेबसाइट ने एक ऐसा एप बनाकर उसका बीटा वर्ज़न  बाज़ार में उतारा है जो नज़दीक आने के इच्छुक दो व्यक्तियों को उनकी निकटता की सीमाएं निर्धारित करने के अनेक विकल्प प्रदान करता है. यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे आप किसी रेस्तरां में जाएं और मेन्यू देखकर यह चयन करें कि आपको क्या-क्या खाना-पीना है. फर्क इतना है कि यहां विकल्पों का चुनाव मेन्यू की बजाय एप में से किया जाना है. इस एप में किया गया चयन उन दो व्यक्तियों के बीच किये जाने वाले एक अनुबंध के समतुल्य होगा और उम्मीद की जाती है कि इस अनुबंध को वैधानिक मान्यता भी प्राप्त होती. एप यह भी सुविधा देगा कि इसे इस्तेमाल करने वाले पार्टनर्स किसी भी समय अपने चयन को संशोधित कर सकें या बदल सकें. 

इस एप की उपादेयता को लेकर बहसें शुरु हो गई हैं. लोग पूछने लगे हैं कि क्या वाकई कोई एप इतना कारगर हो सकता है कि वो दो मनुष्यों के बीच के अंतरंग क्षणों के क्रियाकलाप को प्रभावी  तौर पर नियंत्रित कर सके? इस सवाल का जवाब तकनीक और मानवीय सम्बंधों के मामलों के कुछ विशेषज्ञों ने देने  का प्रयास भी किया है. उनका कहना है कि यह एप सहमति को अंकित करने के मामले में तो कारगर साबित हो सकता है लेकिन क्षण भर में बदल जाने वाले मानवीय भावों के साथ तालमेल नहीं रख सकता. वे इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि किसी भी एप का प्रयोग पूर्व नियोजन की मांग करता है जबकि मनुष्य केवल अपने उस क्षण के मनोभाव ही अंकित कर सकेगा, वह खुद इस बात से अनभिज्ञ होगा कि अगले क्षण उसके मनोभाव क्या होंगे. इस एप के कुछ आलोचकों का तो यहां तक कहना है कि दैहिक  सम्पर्क के मामले में सहमति-असहमति का मामला एक मानवीय मुद्दा है और इसका समाधान किसी मशीनी  एप में तलाश करना पूरी तरह अव्यावहारिक है. एप का मज़ाक उड़ाते हुए ऐसे लोगों का कहना है कि ज़रा इस बेहूदगी की कल्पना कीजिए को एक दूसरे के निकट आने को तत्पर दो में से कोई एक यह कहे  कि  “ज़रा एक सेकण्ड रुकना, पहले मैं एप को अपडेट कर दूं!” 

लेकिन एप बनाने वाली कम्पनी लीगल फ्लिंग इन तमाम आलोचनाओं से तनिक भी विचलित नहीं है. उसे अपने एप की सीमाओं का भली भांति पता है, लेकिन वह इसे भविष्य की एक सशक्त सम्भावना के रूप में विकसित करने को तत्पर है. उसका सोच यह है कि चाहे एप पर ही सही, अगर कोई अपने मनोभाव व्यक्त करता या करती है बाद में किसी भी वजह से दूसरा पक्ष उन मनोभावों की अवहेलना करता या करती है तो आहत पक्ष अपनी शिकायत तो अंकित कर ही सकता है, और उस शिकायत पर यथा कानून कोई कार्यवाही होने की सम्भावना को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है. कम्पनी का यह भी कहना है कि नशे जैसी किसी असामान्य स्थिति में भी अगर कोई ग़लती से अपनी सहमति दे दे तो यह एप उसके बाद  अपनी सहमति को तुरंत वापस लेने का विकल्प प्रदान करता है. 

यह देखना बहुत रोचक होगा कि नाज़ुक मानवीय सम्बंधों के मामले में तकनीक आधारित एप कितना प्रभावी  और कितना निर्णायक साबित होता है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न   दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत गुरुवार, 08 मार्च,  2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Thursday, March 1, 2018

चीन में शवयात्राओं में होता है स्ट्रिपर्स का उत्तेजक डांस


तेज़ आवाज़ में बजता मादक-उत्तेजक संगीत, उस संगीत की धुन पर नाचतीं स्ट्रिपर्स और इनसे आनंदित सीटियां बजाते लोग. यह मंज़र कहां का हो सकता है?  आप कुछ सोच कर जवाब दें उससे पहले ही मैं बता दूं कि अगर यह दृश्य चीन का है तो ज़रूर किसी शव यात्रा है. जी हां, चीन के बाहरी हिस्सो और गांवों में शव यात्राओं में  स्ट्रिपर्स का अश्लील नाच आम बात है. अलबत्ता, यह भी बता देना उपयुक्त होगा कि वहां का प्रशासन एक बार फिर से इस परम्परा को रोकने के लिए तत्पर हुआ है, लेकिन लोगों का खयाल है कि उसे कामयाबी शायद ही मिले. मामला परम्पराओं का जो ठहरा. चीन के देहाती इलाकों में शोक जताने आए लोगों के मनोरंजन के लिए कलाकारों, गायकों, मसखरों और स्ट्रिपर्स को पैसे देकर बुलाने का रिवाज़ काफी समय से चला आ रहा है. वहां के एक विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर का कहना है कि चीन की कुछ स्थानीय परम्पराओं में उत्तेजक नृत्य को मृतक की उस आकांक्षा से जोड़कर देखा जाता है जिसके अनुसार वह वंश बढ़ाने का आशीर्वाद चाहता या चाहती है. लेकिन आम राय यही है कि अपने देश की ही तरह चीन में भी अंतिम संस्कार के समय ज़्यादा लोगों की उपस्थिति को मरने वाले के प्रति सम्मान का पैमाना माना जाता है  इस लिए उसके परिजन पैसे देकर इन लोगों को बुलाते हैं ताकि इनके आकर्षण में ही सही शवयात्रा में लोगों की भीड़ बढ़ जाए. ज़ाहिर है कि इस तरह के कलाकारों को बुलाने में खासा खर्चा होता है और यह खर्चा कर शोक ग्रस्त परिवार समाज में अपने वैभव का दिखावा करने में भी गर्व का अनुभव करता है. वैसे यह माना जाता है कि इस परम्परा की शुरुआत ताइवान से हुई है और वहां यह परम्परा आम है. वैसे ताइवान में भी बड़े शहरों में इसका चलन बहुत कम है लेकिन  शहरों के दूरस्थ तथा बाहरी हिस्सों में अभी भी इसे देखा जा सकता है. पिछले ही बरस ताइवान के दक्षिणी शहर  जियाजी में हुए एक अंतिम संस्कार में जीपों की छतों पर सवार करीब पचास पोल डांसर्स ने शिरकत की थी. यह जानना रोचक होगा कि वह एक नेता का अंतिम संस्कार था और उनके परिवार के अनुसार नेताजी की तमन्ना थी कि उनका अंतिम संस्कार रंगारंग हो!

अब चीन के संस्कृति मंत्रालय ने इस परम्परा को असभ्यबताते हुए घोषणा की है कि अगर कोई किसी के अंतिम संस्कार के समय लोगों के मनोरंजन के लिए किराए पर स्ट्रिपर्स को बुलाएगा  तो उसे कठोर दण्ड दिया जाएगा. वहां की सरकार विगत में भी ऐसा करती रही है. मसलन सन 2006 में जियांगसू प्रांत में एक किसान के अंतिम संस्कार के समय स्ट्रिपर्स की प्रस्तुति के बाद सरकार ने पांच लोगों को हिरासत में लिया था और सन 2015 में भी ऐसा ही होने की खबर सामने आने के बाद सरकार ने आयोजकों और कलाकारों को दण्ड दिया था. अब सरकार का ध्यान हेनन, एनख्वे, जियांगसू और खबे जैसे उन प्रांतों पर ख़ास तौर पर केंद्रित है जहां यह रस्म अधिक प्रचलित है.

सरकार के अलावा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी अपने आठ करोड़ अस्सी लाख सदस्यों के लिए कुछ दिशा निर्देश ज़ारी किये हैं, हालांकि पार्टी के अनुसार ये निर्देश  भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान का हिस्सा है. चीन में शादी और मौत के मौकों पर सम्बद्ध परिवारों को कुछ नकद राशि देने का रिवाज़ है और अंतिम  संस्कार के समय जो धन राशि दी जाती है वह सांत्वना और शोक सम्बंधी खर्चों में मदद के तौर पर दी जाती है, लेकिन पार्टी का खयाल है कि ऐसा करने से अनावश्यक भव्यता का माहौल बनता है और बहुत सारे लोग इन मौकों का इस्तेमाल पैसा बनाने के लिए भी करते हैं, अत: इन पर नियंत्रण ज़रूरी है. पार्टी का यह भी विचार है कि छोटे गांवों में शादियां और अंतिम संस्कार के रस्मो-रिवाज़ कई दिनों तक चलते हैं और ये रोज़मर्रा के उत्पादन, जीवन, कामकाज,व्यवसाय, शिक्षण, यातायात आदि को बाधित करते हैं अत: उसने लोगों को सलाह दी है कि वे अपनी स्थानीय परम्पराओं का पालन आंख मूंदकर न करे. लेकिन पार्टी ने यह भी सावधानी बरती है कि उसके निर्देशों से लोगों की भावनाएं आहत न हो, अत: उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह परम्पराओं  पर पूरी तरह रोक नहीं लगाना चाहती है.

लेकिन ऐसी स्थितियों में जो प्रतिक्रियाएं अपेक्षित हैं वे ही चीन में भी हो रही हैं. वहां की जनता का एक वर्ग  इण्टरनेट और सोशल मीडिया पर इन प्रयासों और सलाहों पर अपने गुस्से और नाराज़गी का इज़हार कर रहा है. ऐसे लोगों का कहना है कि ये नियम अव्यावहारिक हैं और इनका पालन ज़्यादा ही कड़ाई से कराया जा रहा है! अब देखना है कि जीत परम्पराओं की होती है या सुधार की!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 20, 2018

वो रख देंगे आपके लिए 'आपका' कलेजा निकाल के!

हम लोग अभी तक इस बात के भी पूरी तरह अभ्यस्त नहीं हो पाए हैं कि शादी जैसे पारिवारिक आयोजन में ईवेण्ट मैनेजमेण्ट कम्पनी के वेतनभोगी लोग वे सारे काम करें जिन्हें हम घराती लोगों को करते देखने की उम्मीद लगाये रहते हैं. हम लोग तो जब किसी दावत में जाते हैं तो कहीं न कहीं मन की यह टीस उजागर हो ही जाती है कि हाय!  वो दिन कहां हवा हो गए जब घर वाले मनुहार कर कर के लड्डू मुंह में ठूंसा करते थे. अब तो अनजान वेटर निरपेक्ष  भाव से अपना दायित्व निर्वहन कर देते हैं! लेकिन जो लोग इन नए ज़माने के तौर तरीकों के आदी हो गए हैं, वे भी आगे का वृत्तांत  पढ़कर आज के ‘बाज़ारवादी’ ज़माने के चलन पर दो आंसू ज़रूर टपका देंगे. 

हर ख़ास-ओ-आम को खबर हो कि अब अपने देश भारत में एक कम्पनी ऐसी अवतरित हो चुकी है जो आपकी तरफ से आपकी प्रेमिका (या प्रेमी)‌ को हस्तलिखित प्रेम पत्र लिख भेजने के लिए तैयार बैठी है! ज़माना भले ही कम्प्यूटर, इण्टरनेट और ई मेल का हो, हाथ से लिखे ख़त में जो लज़्ज़त है उसका कोई मुकाबला नहीं है और इसी बात को समझ यह कम्पनी आपकी सेवा में हाज़िर हुई है. आप तो बस इन्हें अपना नाम, जिसे ख़त भेजना है उसका नाम, पता वगैरह और यह जानकारी कि ख़त में क्या लिखा जाना है और  कितने विस्तार या संक्षेप में लिखा जाना है यह बता दें बाकी सारा काम उनका. वे एक मसविदा बनाकर आपको भेज देंगे और अगर आप उसका अनुमोदन कर देंगे तो उसे एक हाथ से लिखे ख़त के रूप में भेज देंगे. कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह सेवा सशुल्क है, यानि आपको अपनी जेब थोड़ी हल्की करनी पड़ेगी. लेकिन वो अंग्रेज़ी में कहते हैं ना कि मुफ्त में दावत कौन देता है! जहां तक प्रेम पत्रों की बात है, यह कम्पनी अनगिनत सुविधाएं आपको मुहैया करवाती है. यानि आप यह चुन सकते हैं कि ख़त कैसी हस्तलिपी में लिखा जाएगा, यह चुन सकते हैं कि कैसे कागज़ पर वे लोग आपके लिए ‘आपका’ कलेजा निकाल कर रखेंगे और उसे पोस्ट करेंगे, आपका ख़त डाक से भेजा जाए या कूरियर से, सामान्य डाक से या तीव्र गति की डाक सेवा से, और उम्मीद की जानी चाहिए कि समय के साथ-साथ अन्य सुविधाएं भी इस सेवा में जुड़ती जाएंगी. हो सकता है निकट भविष्य में वे लोग क़ासिद (यानि पत्र वाहक)  की सेवाएं भी प्रदान करने लगें जिसकी खूब चर्चा बीते ज़माने की उर्दू शायरी में हुई है. याद कीजिए ग़ालिब का यह शे’र: “क़ासिद के आते आते ख़त एक और लिख रखूँ/  मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में.” जब इस सेवा का विस्तार हो जाएगा तो बहुत मुमकिन है कि क़ासिद के जेण्डर और उम्र को लेकर भी अनेक विकल्प मिलने लग जाएं! 

और हां, यह न समझ लें कि हाथ से लिखे ख़त भेजने का यह करोबार इश्क़-मुहब्बत तक सीमित है. यह सेवा व्यावसायिक पत्रों के लिए भी इसी मुस्तैदी से उपलब्ध है. कल्पना कीजिए कि कोई कम्पनी एक नया उत्पाद बाज़ार में लाती है और उसकी सूचना आपको कम्पनी के किसी उच्चाधिकारी द्वारा ‘अपने हाथ’ से लिखे पत्र से आपको मिले तो आपको कितनी खुशी होगी! हस्तलिखित पत्र भेजने की सेवा प्रदाता यह कम्पनी यह और ऐसी अनगिनत व्यावसायिक सेवाएं देने के लिए बेताब है. बस, आप हुक्म कीजिए. नए ग्राहक, पुराने ग्राहक, उत्पाद की सूचना, सहयोग के लिए आभार, आपको हुई असुविधा के लिए खेद – सब कुछ के लिए हाथ से खत लिखकर भेजने को तैयार है यह कम्पनी. 

और अगर आपको यह भी अपर्याप्त लग रहा हो तो और सुनिये. कम्पनी देश में ही नहीं विदेश में भी आपकी तरफ से किसी भी तरह का हस्तलिखित पत्र भेजने को तैयार है. यहां तक कि अगर आप बहुत जल्दी में हों और डाक से अपना हस्तलिखित पत्र भेजने का सब्र न कर सकते हों तो कम्पनी ई मेल से भी आपका हस्तलिखित पत्र भेज सकती है. और अगर यह सेवा भी आपको अपर्याप्त  लगे तो इतना और बताता चलूं कि कम्पनी आपकी तरफ से फ़ेसबुक पर स्टेटस  पोस्ट कर सकती है, ट्वीट कर सकती है, वॉट्सएप संदेश भेज सकती है- यानि किसी भी तरह का संदेश, किसी भी माध्यम से, किसी भी भारतीय अथवा विदेशी भाषा में,  किसी को भी  आपको भेजना हो, फिक्र करने की ज़रूरत नहीं. ‘वे’ हैं ना! आप तो बस आदेश दीजिए, भुगतान  कीजिए और निश्चिंत हो जाइये. चाहें तो यह कल्पना करना भी शुरु कर सकते हैं  कि यह तो इब्तिदा है;  आगे,  और आगे क्या होगा! कौन-कौन-सी सेवाएं पैसे खर्च करने पर मिलने लगेंगी! 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 20 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 



Tuesday, February 13, 2018

अब कनाडा के राष्ट्रगान में केवल बेटे नहीं बेटियां भी शामिल!

आखिर सन 2018 की जनवरी में कनाडा की सीनेट ने वह बिल पास कर ही दिया जिसके लिए लिए वहां के समझदार लोग करीब चार दशकों से अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे थे. इस बिल के पास हो जाने से अब कनाडा का राष्ट्रगान केवल पुरुष पक्षी न रहकर उभयपक्षी या जेंडर न्यूट्रल हो जाएगा. कनाडा का राष्ट्रगान मूलत: 1880 में रचा गया था, लेकिन राष्ट्रगान का दर्ज़ा पाने में इसे एक शताब्दी का सफर तै करना पड़ा था. तब तक गॉड सेव द किंग ही कनाडा का भी राष्ट्रगान बना रहा. इस नए गीत की शुरुआती पंक्तियां हैं: ओ कनाडा!अवर होम एण्ड नेटिव लैण्ड! / ट्रु पैट्रियट लव इन आल दाई  सन्स  कमाण्ड. सन 1997 में पचास वर्षीया फ्रांसिस राइट का ध्यान इन पंक्तियों पर गया और उन्हें यह बात अखरी कि इस गान में केवल बेटों का ही ज़िक्र क्यों है, बेटियों का क्यों नहीं? कुछ अन्य की शिकायत अवर होम एण्ड नेटिव लैण्ड से भी थी, विशेष रूप से उनकी जो कहीं अन्यत्र से आकर कनाडा वासी हो गए थे. लेकिन ज़्यादा ज़ोर इसके केवल बेटों को याद करने वाले  शब्दों पर ही था. 1998 में जब विवियन पॉय नामक एक पूर्व फैशन डिज़ाइनर सीनेट में पहुंची तब सीनेट की करीब आधी सदस्य स्त्रियां थीं. स्वभावत: उनमें से बहुतों को भी गीत के इन शब्दों पर गम्भीर आपत्ति थी. पॉय ने एक हस्ताक्षर अभियान शुरु किया जिसमें उनका सक्रिय साथ दिया उक्त फ्रांसिस राइट ने.

उन दिनों की याद करते हुए राइट ने कहा कि वो ज़माना सोशल मीडिया का तो था नहीं. उनका अभियान हिचकोले खाता हुआ ही चला. एक एक हस्ताक्षर जुटाने के लिए उनें कड़ी मेहनत करनी पड़ी, फिर भी बमुश्क़िल चार पांच सौ हस्ताक्षर ही जुट सके. कुछ परम्परा प्रेमी लोग उनसे यह कहते हुए ख़फ़ा भी हुए कि “अरे भाई, यह गान ठीक ही तो है. इसमें बदलाव की ज़रूरत ही क्या है?” लेकिन क्योंकि पॉय और राइट को इस तरह की प्रतिक्रियाओं की पहले से उम्मीद थी, वे हताश  नहीं हुईं. वे यह बात समझती थीं  कि आखिर जिस गान को 3.6 करोड़ लोग इतने समय से गा रहे हैं, उसमें किसी भी बदलाव के लिए उन्हें तैयार करना कोई बच्चों का खेल तो है नहीं. पॉय ने जब इसमें बदलाव के वास्ते प्राइवेट मेम्बर्स बिल पेश किया तो उन्हें तो यहां तक सुनना पड़ा कि अगर गान के शब्दों में बदलाव करना ही है तो इसमें सिर्फ औरतों को क्यों जोड़ा जाए, समाज के अन्य तबकों जैसे मछुआरों, बैंक कर्मियों, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों वगैरह को भी क्यों न जोड़ दिया जाए! ज़ाहिर है कि बहुत सारे लोग बदलाव की मांग को तर्क संगत नहीं  मानते थे. इसके बावज़ूद दिसम्बर 2003 में यह आस बंधी कि शायद यह बिल पास हो जाए, लेकिन तब एक पुरुष सीनेटर ने अपने अहं के चलते इसे पास होने से रुकवा दिया.

लेकिन पॉय ने हार नहीं मानी. उन्हें 63 वर्षीया नैंसी रुथ का साथ मिला, जो कुछ मानों में कनाडा की राजनीति में एक विवादास्पद नेता भी मानी जाती हैं. वे एक जानी-मानी सीनेटर हैं, स्त्रीवादी हैं  और खुलकर स्त्री समलैंगिक सम्बंधों का समर्थन करती हैं. नैंसी को यह अभियान अपने स्त्रीवादी सोच के अनुरूप लगा और उन्होंने  इसका उन्मुक्त समर्थन  किया. उन्होंने बाद में कहा कि “मैं भी चाहती थी  कि इस मुल्क की स्त्रियों को अपने राष्ट्रगान में जगह मिले. मैं चाहती  थी कि मेरे जीते जी ही ऐसा हो जाए.” अपने प्रयासों को और तेज़ करते हुए उन्होंने इसके लिए एक संगठन भी बनाया. लेकिन उनका  मनचीता हो पाता उससे पूर्व ही उनका कार्यकाल पूरा हो गया. उनके बाद भी प्रयास ज़ारी रहे और आखिरकार पिछले बरस जून में हाउस ऑफ कॉमन्स ने इस बदलाव  को लाने वाले बिल  को परित कर ही दिया. नैंसी के अधूरे काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया एक अन्य स्त्रीवादी सीनेटर फ्रांसिस लैंकिन ने. उनका कहना था कि “मैं एक ऐसी दुनिया में जीना कहती हूं जिसमें पहले ही दिन से सभी  के लिए समान अवसर हों. क्या इस बिल से ऐसा हो जाएगा? नहीं. लेकिन कम से कम यह तो होगा कि मेरी पोती मुझसे यह सवाल नहीं करेगी कि इस गान में केवल बेटे ही क्यों हैं? इसमें बेटियों का ज़िक्र क्यों नहीं है? अब ऐसा नहीं होगा.” और आखिर यह बिल पास हो ही गया. अब इस गान में ऑल दाई सन्स कमाण्ड की जगह इन ऑल ऑफ अस कमाण्ड गाया जाएगा.

इस बिल पर सबसे खूबसूरत प्रतिक्रिया ज़ाहिर की कनाडा की विख्यात लेखिका मार्गरेट एटवुड ने. उन्होंने नैंसी को सम्बोधित एक पत्र में लिखा, “एक कृतज्ञ राष्ट्र की तरफ से तुम्हारा शुक्रिया. सिर्फ वो ही व्यक्ति तुम्हारा आभार नहीं मानेगा जो यह चाहता है कि मैं जिस चट्टान के नीचे से निकल कर आई हूं, फिर से जाकर उसी के नीचे घुस जाऊं.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.