Tuesday, May 15, 2018

मशीन, कृत्रिम बुद्धि और मानवीय विवेक


हमारे समय का एक बड़ा यथार्थ यह भी है कि मनुष्य मनुष्य के बीच सम्पर्क घटता जा रहा है और मनुष्य की यंत्रों पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है. पहले हम टेलीफोन का चोंगा उठाकर ऑपरेटर से नम्बर मांगते थे,  बैंक जाकर पैसे निकालते-जमा कराते थे, रेल्वे स्टेशन जाकर टिकिट खरीदते थे, बाज़ार में जाकर अपनी ज़रूरत का सामान देखते-परखते और फिर खरीदते थे.  अब इन सबका स्थान यांत्रिकता ने ले लिया है. हम स्मार्ट होते जा रहे हैं. पता नहीं स्मार्ट हम हो रहे हैं या स्मार्ट यंत्र हम पर हावी हो रहे हैं. लेकिन सारी दुनिया में स्मार्ट होने की जैसे होड़ मची हुई है. अमरीका के बारे में तो यह अनुमान लगाया गया है कि सन 2021 तक आते-आते वहां स्मार्ट उपकरणों की संख्या वहां के मनुष्यों से ज़्यादा हो जाएगी. अनुमान यह भी है कि उस समय तक कम से कम आधे अमरीकी घरों में एक स्मार्ट स्पीकर तो होगा ही जो घर वालों की आवाज़ सुनकर उसके अनुरूप संचालित होगा या घर को संचालित करेगा.


विभिन्न कम्पनियों द्वारा निर्मित इस तरह के स्मार्ट स्पीकर इन दिनों सारी दुनिया में लोकप्रिय होते जा रहे हैं. ऐसा ही एक स्मार्ट स्पीकर मेरे पास भी है जिसे मैं कहता हूं कि मेरे  लिए पण्डित भीमसेन जोशी का जो भजे हरि को सदा बजाओ’,  तो मेरा वाक्य ख़त्म  होते-होते वह उसे बजाना शुरु कर देता है. मेरा यह स्पीकर और बहुत सारे काम करता है, जैसे वो मेरे बहुत सारे सवालों  के जवाब दे देता है, मुझे यह बता देता है कि मेरे शहर का तापमान क्या है या भूटान की आबादी कितनी है, वगैरह. वह ऐसे बहुत सारे अन्य काम भी  कर सकता है, जो फिलहाल मैंने उससे लेने शुरु नहीं किए हैं. जैसे वो मेरे कमरे की बत्तियां जला-बुझा सकता है, मेरे कहने पर किसी को फोन लगा सकता है, मेरे घर की सिक्योरिटी को बंद या चालू कर सकता है, वगैरह. इस स्पीकर की कीमत भी बहुत ज़्यादा नहीं है, इसलिए बहुत जल्दी यह हर घर में नज़र आने लगेगा, यह कल्पना की जा सकती है. इस तरह के उपकरण हमारी आवाज़ सुनकर उसके अनुसार संचालित होते हैं. कृत्रिम बुद्धि इनके मूल में होती है.

इधर पिछले दो बरसों से अमरीका और चीन में ज़ारी शोधों के जो परिणाम सामने आए हैं वे इस तरह के उपकरणों में निहित ख़तरों के प्रति हमें सावचेत करते हैं. इन शोधकर्ताओं ने यह बताया  है कि इन उपकरणों  को मूर्ख बनाकर इनका दुरुपयोग भी किया जा सकता है. क्योंकि ये उपकरण आवाज़ से संचालित होते हैं, शोधकर्ताओं ने किया यह कि आम गानों वगैरह के बीच कुछ अवांछित ध्वनि निर्देश डाल दिये. ये ध्वनि निर्देश ऐसे थे जिन्हें हम अपने कानों से सामान्यत: नहीं सुन पाते थे, लेकिन उपकरण न केवल उन्हें सुन पाए, उनके अनुसार संचालित भी हो गए. कल्पना कीजिए कि आप अपने उपकरण को किशोर कुमार का कोई गाना बजाने का निर्देश दें, और उस गाने के भीतर आपके घर का दरवाज़ा खोलने का निर्देश भी छिपा हो और गाना बजते समय वह दरवाज़ा खुल जाए तो? प्रयोग ये भी किए गए कि सामान्य संगीत के भीतर इस तरह के निर्देश डाल दिये गए कि वह गाना बजते ही प्रयोगकर्ता के कम्प्यूटर पर कोई अश्लील साइट खुल गई, या उसके फोन से किसी को अनुचित कॉल कर दिया गया. इस तरह के ख़तरों को इन शोधकर्ताओं ने डॉल्फिन अटैक का नाम दिया है. अमरीका में ऐसे भी प्रयोग किये गए जिनमें छिपे हुए संदेश वाला कोई गाना बजने पर उपयोगकर्ता की शॉपिंग लिस्ट में किसी ख़ास कम्पनी के कोई उत्पाद अपने आप जुड़ गए.

दरअसल इस तरह के उपकरणों की एक बड़ी सीमा यह है कि इनकी अधिकाधिक स्वीकार्यता के लिए इनकी निर्माता कम्पनियों के लिए यह बात बहुत ज़रूरी होती है कि इन्हें बहुत जटिल न बनाया जाए ताकि ये अधिकाधिक उपयोगकर्ताओं के लिए प्रयोग-सुलभ हों. और यही प्रयोग-सुलभता इन्हें असुरक्षित भी बना देती हैं. एक उदाहरण देखें. इन उपकरणों को इस तरह तैयार किया जाता है कि ये भिन्न-भिन्न उतार-चढ़ाव वाले ध्वनि  संकेतों को भी ग्रहण कर लें. शोधकर्ताओं ने इनके सामने एक वाक्य बोला: कोकेन नूडल्स. और जैसा उन्हें भय था, उपकरण ने समझा कि उसे कहा गया है – ओके गूगल. यह बात सर्वविदित  है कि यह वाक्य इस तरह की उपकरण व्यवस्था को जगाकर सक्रिय करने के लिए काम में लिया जाता है. बहुत स्वाभाविक है कि इनकी निर्माता कम्पनियां भी इस तरह के ख़तरों के प्रति पूरी तरह सजग हैं और वे हर सम्भव प्रयास कर रही हैं कि उनके बनाए उपकरणों का कोई ग़लत इस्तेमाल न कर सके. लेकिन हमें लगता है कि जहां तक विवेक का प्रश्न है, मशीन मनुष्य की बराबरी कभी नहीं कर पाएगी.

आपका क्या विचार  है?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 मई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 8, 2018

साहित्य के नोबेल पुरस्कार पर # मी टू की काली छाया

यह एक असामान्य बात है और इसने पूरी दुनिया के साहित्यिक समाज को चौंका  दिया है. स्वीडिश एकेडमी  ने घोषणा की है कि वर्ष 2018 के लिए दिया जाने वाला साहित्य का नोबेल पुरस्कार अब वर्ष 2019 के पुरस्कार के साथ ही प्रदान किया जाएगा. वैसे नोबेल पुरस्कारों के इतिहास में इससे पहले भी कई  दफा ऐसा हो चुका है कि किसी एक साल का  पुरस्कार उससे अगले साल के पुरस्कारों के साथ दिया गया. उदाहरण  के लिए अमरीकी नाटककार  यूजेन ओनील को उनका 1936 का पुरस्कार 1937 में दिया गया था.  1943 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार द्वितीय विश्वयुद्ध की वजह से स्थगित करना पड़ा था. इस बार स्वीडिश एकेडमी  को यह असामान्य फैसला यौन दुर्व्यवहार और वित्तीय घोटालों तथा गोपनीयता भंग करने के आरोपों के चलते करना पड़ा है. कहा जा रहा है कि जबसे पुरस्कार शुरु हुए यानि 1901 के बाद से चर्चा में आने वाला यह सबसे बड़ा और गम्भीर विवाद है.  नोबेल समिति ने भी यह कहते हुए स्वीडिश एकेडमी के इस फैसले  का स्वागत किया है कि सम्मानित संस्था के लिए यह मामला शर्मनाक है. नोबेल फाउण्डेशन ने अपने एक वक्तव्य में यहां तक कहा है कि स्वीडिश एकेडमी का यह फैसला स्थिति की गम्भीरता को रेखांकित करता है और उम्मीद ज़ाहिर की है कि इस फैसले से पुरस्कार की दीर्घकालीन प्रतिष्ठा  की रक्षा हो सकेगी.

पिछले कुछ समय से स्वीडन के प्रेस में फ्रेंच फोटोग्राफ़र जौं क्लोड अरनॉल्ट के कथित यौन दुराचार की खबरें सुर्खियों में थीं. पिछले साल नवम्बर में अठारह महिलाओं ने मी टूआंदोलन के माध्यम से अरनॉल्ट पर यौन हमलों व उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. प्रोफेसर विट ब्रैट्स्ट्रोम जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व ने तो यहां तक कहा है कि अर्नोल्ट ने एक दशक पहले स्वीडिश एकेडमी के एक समारोह में स्वीडन की क्राउन प्रिंसेस विक्टोरिया को भी ग़लत ढंग से स्पर्श किया था. कहा गया कि अरनॉल्ट ने ये दुष्कृत्य कई दफा एकेडमी के स्वामित्व वाले परिसरों में भी किए. अरनॉल्ट पर एकेडमी के कर्मचारियों व सदस्यों के रिश्तेदारों के साथ भी अवांछित यौन सम्बंध  बनाने के आरोप लगाए गए. अरनॉल्ट की पत्नी कवयित्री व लेखिका कटरीना फ्रोस्टेनसन हैं जो लम्बे समय से स्वीडिश एकेडमी की एक सदस्या रही हैं. अरनॉल्ट व उनकी पत्नी बहुत लम्बे अर्से तक स्टॉकहोम  में फॉर्म नाम का एक क्लब भी संचालित करते रहे हैं जहां नोबेल पुरस्कार विजेता एवम अन्य प्रतिष्ठित लेखकों कलाकारों आदि के रचना पाठ, प्रदर्शनियां व अन्य प्रदर्शन आयोजित होते रहे हैं. इस क्लब को एकेडमी से वित्तीय सहायता मिलती रही है. अरनॉल्ट दम्पती पर एक बड़ा आरोप यह भी लगाया गया है कि उन्होंने कम से कम सात नोबेल  पुरस्कार विजेताओं के नाम समय से पहले लीक किये. इन नामों में बॉब डिलन और हैरॉल्ड पिण्टर प्रमुख हैं. बहुत स्वाभाविक है कि अरनॉल्ट के वकील ने इन तमाम आरोपों का  खण्डन किया और कहा कि ये आरोप उनके मुवक्किल की छवि को नुकसान  पहुंचाने के इरादे से लगाए गए हैं.

इन तमाम आरोपों के बीच स्वीडिश एकेडमी की अठारह सदस्यीय  समिति ने मतदान कर अरनॉल्ट की पत्नी कटरीना फ्रोस्टेनसन को समिति से निकालने का फैसला कर लिया. उधर खुद कटरीना ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. एकेडमी की स्थायी सदस्या सारा डेनिअस ने कहा कि संस्थान ने कथित आरोपों के बाद अरनॉल्ट से भी अपने सम्बंध पूरी तरह तोड़ लिए हैं. डेनिअस समेत छह सदस्य भी अब तक इस समिति से इस्तीफा दे चुके हैं. लेकिन यहीं सारा प्रकरण एक रोचक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है. तकनीकी तौर पर स्वीडिश एकेडमी के सारे अठारह सदस्य ज़िंदगी भर के लिए नियुक्त किए जाते हैं और वे इस्तीफा भी नहीं दे सकते हैं. लेकिन हां, वे एकेडमी की बैठकों और उसके फैसलों में शामिल न होने का विकल्प ज़रूर चुन सकते हैं. इसी प्रावधान के चलते आज स्थिति यह है कि अठारह में से केवल दस सदस्य ही बचे हैं  जो सक्रिय हैं. लेकिन एकेडमी के प्रावधानों में यह बात भी शामिल है कि किसी नए सदस्य के चुनाव के लिए न्यूनतम सदस्य संख्या बारह है. इस तरह ये दस सदस्य कोई फैसला करने की हालत में भी नहीं हैं. इस गत्यवरोध को दूर करने के लिए एकेडमी के संरक्षक राजा कार्ल गुस्ताफ़ सोलहवें ने घोषणा की है कि वे नियमावली  में फेरबदल के मुद्दे पर गम्भीरता से विचार कर रहे हैं. उन्होंने संकेत दिया है कि नियमों में बदलाव कर सदस्यों को स्वेच्छा से पद त्याग की अनुमति दी जा सकती है.

वैसे स्वीडिश एकेडमी ने यह भी कहा है नोबेल पुरस्कार विजेता के चयन की प्रक्रिया काफी अग्रिम अवस्था में है और ज़ारी रहेगी, लेकिन विजेता की घोषणा होने में समय लगेगा. आशा की जानी चाहिए कि एकेडमी और नोबेल फाउण्डेशन की इस त्वरित कार्यवाही के कारण नोबेल पुरस्कार की प्रतिष्ठा बनी रह सकेगी.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 08 मई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 1, 2018

वहां लबों की आज़ादी पर अनगिनत पहरे हैं!


हममें से बहुतों के लिए इण्टरनेट की लगभग निशुल्क सुलभता आज के समय के सबसे बड़े वरदानों में से एक है. यह इस बात के बावज़ूद कि समय-समय पर इसकी सहायता से संचालित होने वाली बहुत सारी गतिविधियों, विशेषत: सोशल मीडिया के दुरुपयोग और दुष्प्रभावों की ख़बरें भी आकर हमें चिंतित कर जाती हैं. इधर हम अपने देश में एक नई प्रवृत्ति यह भी देख रहे हैं कि जैसे ही किसी शहर-कस्बे-गांव वगैरह में कोई दंगा-फसाद होता है, सरकार पहला काम वहां इण्टरनेट सेवाओं को बंद कर देने का करती है. कुछ लोगों को डिजिटल बनाए जा रहे भारत में यह काम विडम्बनापूर्ण लग सकता है, लेकिन प्रशासन को लगता है कि दुर्भावनापूर्ण ख़बरों और अफ़वाहों  को फैलने से रोकने के लिए यह प्रतिबंध  ज़रूरी है. वैसे इस माध्यम को लेकर बहसें भारत से बाहर, पश्चिम में भी कम नहीं हो रही हैं. इधर फ़ेसबुक के डेटा के दुरुपयोग  के बारे में आई ख़बरों ने वहां भी अच्छी खासी हलचल पैदा की है और विशेष रूप से अमरीकी समाज में कैम्ब्रिज एनेलिटिका जैसी कम्पनी द्वारा वहां के चुनावों में दखलंदाज़ी के प्रयासों को बहुत गम्भीरता से लिया गया है. लेकिन इन तमाम बातों के बावज़ूद पश्चिम में, और मोटे तौर पर भारत में भी, हर कोई इण्टरनेट की निर्बाध सुलभता के हक़ में नज़र आता है.

लेकिन हमारा ध्यान इस बात की तरफ़ शायद ही जाता हो कि हमारी इसी दुनिया में कम से कम एक महाद्वीप ऐसा है जहां के नागरिकों को हमारी तरह यह सुख मयस्सर नहीं है. यथार्थ तो यह है कि जहां भारत सहित दुनिया के कई देशों की सरकारें अभी इण्टरनेट के निर्बाध उपयोग को थोड़ा-सा सीमित करने का इरादा कभी-कभार प्रकट करती है (और इसके लिए भी उनकी आलोचना कम नहीं होती है!) वहीं तंज़ानिया और युगाण्डा जैसे अफ्रीकी देशों की सरकारें अपने देशों में पिछले कुछ समय से  व्यवस्था, स्थायित्व और उत्तरदायित्वपूर्ण नागरिकता का नाम लेकर इण्टरनेट के इस्तेमाल पर काफी कड़े प्रतिबंध लगा चुकी हैं. हो सकता है यह बात पढ़ने में काफी कड़वी  लगे लेकिन सच यही है कि इन देशों की सरकारें इण्टरनेट की निशुल्क उपलब्धता पर वैसे कड़े प्रहार करके, जिनकी  हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, उसे करीब-करीब ध्वस्त कर चुकी है. उदाहरण के लिए आप तंज़ानिया को लीजिए. वहां की सरकार ने  एक नियम बनाया है कि हर ब्लॉगर को और यू ट्यूब चैनल्स जैसे विविध मंचों के एडमिनिस्ट्रेटरों को करीब नौ सौ डॉलर का शुल्क चुकाकर स्वयं को एक नियंत्रक अधिकारी के यहां पंजीकृत कराना होगा. वैसे तो  नौ सौ डॉलर की रकम कोई छोटी रकम नहीं है जिसे हर ब्लॉगर चुकाना चाहे या  चुका सके, सरकारी शिकंजा इतने पर ही नहीं रुकता है. वह यह भी चाहता है कि आवेदक अपने तमाम  शेयरहोल्डरों, शेयर पूंजी, स्टाफ की योग्यताओं, उनके लिए चलाए जाने प्रशिक्षण कार्यक्रमों आदि की पूरी जानकारी दे और इस आशय का प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत करे कि उसके खिलाफ कोई टैक्स राशि बकाया नहीं है. बहुत स्पष्ट है कि यह सारा उपक्रम न केवल मुक्त विचार विमर्श और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने वाला है, अप्रत्यक्ष रूप से लोगों में भय भी जगाने वाला है. उन्हें लगता है कि सरकार इतनी सारी जानकारियां जुटाकर उनका न जाने कैसा इस्तेमाल कर ले. इसका परिणाम यह हुआ है कि तंज़ानिया  में गिने चुने ब्लॉगर हैं!

तंज़ानिया जैसा ही हाल  युगाण्डा का भी है. वहां के नागरिकों को अपने मोबाइल फोनों पर फ़ेसबुक, ट्विटर या वॉट्सएप जैसे सोशल मीडिया माध्यमों का इस्तेमाल करने के लिए हर दिन करीब दो पेंस का शुल्क अदा करना होता है. बकौल वहां के वित्त मंत्री जी, देश की सुरक्षा के निमित्त यह बहुत छोटी-सी राशि है. युगाण्डा के राष्ट्रपति का कहना है कि लोग सोशल मीडिया का प्रयोग गप्पबाज़ी के लिए करते हैं, इसलिए उनसे इतनी-सी धनराशि ले लेना कोई अनुचित  बात नहीं है. अपनी सदाशयता दर्शाने के लिए वे यह कहने से भी नहीं चूकते  कि मैं तो बहुत ही वाज़िब इंसान हूं और शैक्षिक, शोध अथवा संदर्भ के लिए इण्टरनेट के प्रयोग पर कभी कोई टैक्स आयद नहीं करूंगा. लेकिन तंज़ानिया की ही एक बेहद लोकप्रिय वेबसाइट के संचालक मेक्सेंस मेलो ने जो बताया, उससे इस कथन की निरर्थकता स्वत: सिद्ध हो जाती है. उनका कहना है कि उनके देश में अगर आप एक फ़ेसबुक पोस्ट भी लिखते हैं तो उस पर वे ही नियम कानून आयद होते हैं जो किसी किताब को लिखने वाले पर होते हैं. और इस तरह आपकी  अभिव्यक्ति की हर आज़ादी प्रतिबंधित है.

एक तरफ़ बाकी दुनिया है जो इस माध्यम की तमाम सीमाओं के बावज़ूद इस पर कोई भी प्रतिबंध लगाने के खिलाफ़ है और दूसरी तरफ यह दुनिया है जहां कोई आज़ादी है ही नहीं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 01 मई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 24, 2018

सेहत के साथ-साथ पर्यावरण भी सुधारता है प्लॉगिंग!


हाल में दिल्ली के विख्यात लोधी गार्डन में सुबह की सैर कर रहे लोगों का ध्यान कुछ अन्य सैर करने वालों की एक अजीबो-गरीब हरक़त की तरफ आकृष्ट हुआ. रविवार का दिन था और अपनी सेहत के प्रति जागरूक नज़र आ रहे बीस-पच्चीस लोगों  का एक समूह जॉगिंग तो कर ही रहा था लेकिन उन्होंने अपने हाथों में दस्ताने भी पहन रखे थे और वे लोग जॉगिंग करते हुए वहां बिखरा  हुआ कचरा भी अपने हाथों में लिये हुए प्लास्टिक बैग्ज़ में इकट्ठा  जा रहे थे. वहां घूमने वाले अगर दुनिया के अन्य देशों में इन दिनों चल रहे एक आंदोलन से थोड़ा भी परिचित होते तो उन्हें इन लोगों की यह हरक़त अजीब नहीं लगती.

असल में स्वीडन में सन 2016 से एक नई गतिविधि शुरु हुई है जिसका नाम है प्लॉगिंग. यह प्लॉगिंग शब्द स्वीडिश भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है जिनका काम चलाऊ अंग्रेज़ी अनुवाद होगा पिकिंग और जॉगिंग, यानि (कचरा) बीनना और जॉगिंग करना. ऐसा माना जाता है कि सत्तावन वर्षीय स्वीडिश नागरिक एरिक एहल्स्ट्रोम इस गतिविधि के जनक हैं. वे उत्तरी स्वीडन  में रहते थे लेकिन जब वहां से स्टॉकहोम आए तो उन्हें यह देखकर बड़ा कष्ट हुआ कि स्टॉकहोम  की सड़कों पर पहले से ज़्यादा कचरा फैला हुआ है. और उन्होंने सोचा कि क्यों न जॉगिंग करते हुए कचरा भी बीन लिया जाए! बस, फिर क्या था! लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया. बहुत जल्दी इस गतिविधि के लिए लाइफसम नामक एक एप भी बन गया और इस एप ने लोगों को प्लॉगिंग के फायदों से भी परिचित करा दिया. अगर इस एप के आंकड़ों को सही मानें तो जहां सामान्य जॉगिंग करने से हम एक घण्टे में मात्र 235 कैलोरी खर्च कर पाते हैं, प्लॉगिंग करने से 288 कैलोरी खर्च कर देते हैं. और हां, अगर आप सिर्फ तेज़ तेज़ चलते हैं तो महज़ 120 कैलोरी ही खर्च कर पाते हैं.

अब प्लॉगिंग स्वीडन में तो बाकायदा एक आंदोलन का रूप ले चुका है. लोग महसूस करने लगे हैं कि यह कम केवल सेहत के लिए ही लाभप्रद नहीं है, पर्यावरण के भी हित में है. वहां सोशल मीडिया आदि के माध्यम से सूचनाएं प्रसारित कर प्लॉगिंग ईवेण्ट्स आयोजित किये जाते हैं जिनमें लोग एक दो घण्टा प्लॉगिंग करते हैं और फिर गपशप, कैंप फायर वगैरह कर घर लौट  आते हैं. ऐसे ही आयोजन नियमित रूप से करने वाली एक नर्स टेश का कहना है कि जब भी मैं अपने आस-पास कचरा बिखरा हुआ देखती हूं, मुझे एक साथ अफसोस और गुस्से का अनुभव होता है. इनसे निज़ात पाने के लिए प्लॉगिंग से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता है. छत्तीस वर्षीय लिण्डबर्ग का कहना है कि उन्हें इस बात का अफसोस है कि वे इतने बरसों सिर्फ दौड़ती ही रही.  काश! यह सब पहले करने लग गई होतीं. अब वे जब भी जॉगिंग के लिए जाती हैं, सबसे पहले घूम-घूमकर यह जायज़ा  लेती हैं कि उन्हें कहां कहां से कचरा उठाना है और फिर जॉगिंग के साथ झुक झुक कर कचरा उठाती और अपने बैग्ज़ में इकट्ठा कर लेती हैं. उनका कहना है कि अपने आस-पास को देखकर दुखी होने से ज़्यादा अच्छा यह है कि हम खुद उसे बेहतर बनाने के लिए कुछ करें. स्वीडन की ही एक संगीतकार लेखिका का कहना है कि यह काम तो वह पहले से कर रही थी लेकिन अब उसके देश ने इसे एक नाम भी दे दिया है. उसे इस बात की खुशी है कि वह जो कर रही है उससे केवल उसकी सेहत को ही नहीं परिवेश को भी लाभ पहुंच रहा है. मज़ाक के लहज़े में वो कहती है कि पहले उसकी कमर में पैण्ट  फंसती थी, लेकिन अब बार-बार झुकने के कारण वही पैण्ट उसे ढीली लगने लगी है.

बहुत आह्लादक बात यह है कि स्वीडन से शुरु हुआ यह अभियान अब आहिस्ता-आहिस्ता पूरी दुनिया में फैलता जा रहा है. पहले यह यूरोप में लोकप्रिय हुआ और अब जर्मनी, फ्रांस, अमरीका, कनाडा, मलेशिया  और थाइलैण्ड में भी लोग जॉगिंग की बजाय प्लॉगिंग को महत्व देने लगे हैं. हाल में द गार्डियन अखबार ने लिखा  कि अब वक़्त आ गया है कि हम सब जॉगिंग करते समय कचरा बीनने के स्कैण्डिनेवियन मॉडल का अनुसरण करें. हर देश में प्लॉगिंग करने वालों के समूह बनने लगे हैं और लोग बढ़ चढ़कर उनमें हिस्सेदारी कर रहे हैं.

हमारे लिए तो यह बात और भी ज़्यादा खुशी की है कि सफाई के जुनून में अपने घर का कचरा पड़ोसी के घर के आगे खिसका देने में माहिर हम भारतीय भी इस प्लॉगिंग को अपनाने में दुनिया के और देशों से पीछे नहीं हैं. ज़रूरत इस बात की है कि हम सब मिलकर इस अभियान को और अधिक लोकप्रिय बनाएं ताकि हम भी स्वच्छ भारत के निवासी होने का सुख पा सकें!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 अप्रैल, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 17, 2018

खूब फल फूल रहा है हमारी निजता का कारोबार!


हमारे-आपके जीवन के बारे में न जाने कितनी जानकारियों, जिन्हें आजकल डाटा  कहा जाता है, के दम पर अनगिनत लोगों और कम्पनियों का धंधा फल फूल रहा है. इस तरह का अध्ययन कर रही एक कम्पनी प्राइवेसी इण्टरनेशनल के एक उच्च अधिकारी का कहना है कि आज हज़ारों कम्पनियां आपका डाटा बटोरने और आपके ऑनलाइन बर्ताव की पड़ताल करने के काम में लगी  हुई हैं. यह धंधा सारी दुनिया में फैला हुआ है.   

हाल में एक टैक्नोलॉजी  पत्रकार कश्मीर हिल ने एक अभिनव लेकिन दिलचस्प प्रयोग किया. उन्होंने अपने एक बेडरूम वाले अपार्टमेण्ट को स्मार्ट होम में तब्दील किया और उसके बाद विभिन्न साधनों  की मदद से यह पड़ताल की कि उनके घर में लगे विभिन्न उपकरणों के माध्यम से उनकी निर्माता कम्पनियों ने उनके बारे में कितना डाटा संग्रहित किया है. वे यह जानकर आशचर्यचकित रह गईं कि उनका स्मार्ट टूथ ब्रश अपनी निर्माता  कम्पनी को यह खबर दे रहा था कि उन्होंने कब ब्रश किया और कब नहीं किया, उनका स्मार्ट टीवी अपने निर्माता को हर पल यह बता रहा था कि वे कौन-सा प्रोग्राम देख रही हैं, और उनका स्मार्ट स्पीकर दुनिया के सबसे बड़े ऑनलाइन खुदरा व्यापारी को (जो कि उस स्पीकर का निर्माता भी है) हर तीसरे मिनिट उनके बारे में जानकारियां मुहैया करवा रहा था. पत्रकार कश्मीर हिल ने यह पड़ताल करने के लिए अपनी एक दोस्त सूर्या मट्टू की मदद ली जिन्होंने एक विशेष रूप से बनाए गए वाई फाई राउटर की मदद से इन जासूसों की जासूसी की. इन जानकारियों के बाद कश्मीर हिल यह सोचकर और ज़्यादा चिंतित हुईं कि अगर उनके यहां से भेजी जा रही ज्ञात जानकारियां इतनी ज़्यादा हैं तो वे जानकारियां कितनी अधिक होंगी जिनके बारे में उन्हें भी अभी पता नहीं चल सका है. उन्होंने बहुत व्यथित होकर कहा कि मुझे लगता है कि हम एक निहायत ही व्यावसायिक निज़ाम में रह रहे हैं जिसकी नज़र हमारे हर क्रियाकलाप पर है.

इसी संदर्भ में यह भी याद कर लिया जाना उपयुक्त होगा कि हाल में इस आशय की ख़बरों ने बड़ा हंगामा बरपा किया था कि फ़ेसबुक के लगभग पौने नौ करोड़ उपयोगकर्ताओं की प्रोफ़ाइल सूचनाएं बग़ैर उनकी जानकारी के एक मार्केटिंग कम्पनी कैम्ब्रिज एनेलिटिका तक पहुंचा दी गई हैं. हाल में फ़ेसबुक के सीईओ मार्क ज़ुकरबर्ग ने इस बात पर सार्वाजनिक क्षमा याचना भी की है. लेकिन यह कोई अपनी तरह का इकलौता मामला नहीं है. एक बरस पहले एक स्मार्ट टीवी निर्माता पर भी इस  आशय के आरोप लगे थे  कि उसने बग़ैर अपने ग्राहकों को सूचित किए या उनसे अनुमति लिए उनके टीवी सेट्स में ऐसा सॉफ्टवेयर लगा दिया था जो उनके टीवी देखने की आदतों के  बारे में जानकारियां एकत्रित कर रहा  था. ये जानकारियां विभिन्न कम्पनियों को उपलब्ध कराई जा रही थीं ताकि इनके आधार पर वे अपने विज्ञापन प्रसारित कर सकें. तब इस टीवी निर्माता कम्पनी ने  इस बारे में अमरीकी फेडरल ट्रेड कमीशन में चल रहे एक मुकदमे में भारी धनराशि चुका कर अदालत के बाहर समझौता किया था.

असल में होता यह है कि हममें से बहुत सारे लोग बिना पैसे खर्च किये बहुत सारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने के लालच में न केवल अपने बारे में बहुत सारी जानकारियां खुद परोस देते हैं, उनके निर्बाध इस्तेमाल की अनुमति भी प्रदान कर देते हैं. जब भी हम कोई मुफ्त वाला सॉफ्टवेयर या एप डाउनलोड करते हैं, एक सहमति सूचक बटन –एग्री-  पर भी हमें क्लिक करना होता है और हममें से शायद ही किसी के पास इतना धैर्य  हो कि यह जानने की कोशिश करें कि हम किस बात के लिए अपनी सहमति दे रहे हैं. अमरीका की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के दो शोधकर्ताओं ने बताया है कि अगर आप हर एप की प्राइवेसी पॉलिसी को स्वीकार करने से पहले ठीक से पढ़ना चाहें तो आपको हर रोज़ आठ घण्टे लगाकर पूरे 76 दिन तक पढ़ते रहना होगा.  लेकिन मामला विस्तार का ही नहीं है. इस सहमति की आड़ में हमारी जानकारियों का जो सौदा होता है वह प्राय: विधि सम्मत नहीं होता है.

शायद यही वजह है कि अब दुनिया के कई देश इस बे‌ईमानी के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं. हाल में यूरोप में जो जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेग्युलेशन (जीडीपीआर) लागू हुआ है वह वहां के उपभोक्ताओं को उनके डाटा पर अधिक नियंत्रण के लिए सक्षमता प्रदान  कर रहा है. लेकिन अमरीका इस मामले में अभी भी पीछे है. वहां के नागरिकों को यह जानने का भी हक़ नहीं है कि किस कम्पनी ने उनके बारे में कौन-सा डाटा संग्रहित किया है. इस बारे में अपने देश की तो बात ही क्या की जाए! आधार को लेकर जो आशंकाएं व्यक्त की गई हैं और जो छिट पुट चिंताजनक ख़बरें आई हैं उन्होंने भी कोई गम्भीर हलचल अपने यहां पैदा नहीं की है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 अप्रैल, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 10, 2018

एक चौंकाने वाला प्रयोग और उसमें से निकली नई सोच!


लीजिए, अब एक नई शोध ने जो बताया है उससे आप भी  यह सोचने लगेंगे कि बच्चों को स्कूल भेजा जाए या नहीं! हम सभी अपने बच्चों को उनके बहुमुखी विकास के लिए स्कूल भेजते हैं. लेकिन हाल में हुई एक शोध ने जो बताया है वह तो इसका उलट है. मैं आपके धैर्य की अधिक परीक्षा नहीं लेना चाहता इसलिए सारी बात सिलसिलेवार बता देता हूं.

हुआ यह कि नासा ने दो बहुत विख्यात विशेषज्ञों डॉ जॉर्ज लैण्ड और बेथ जार्मान को एक ऐसा  अत्यधिक विशेषीकृत टेस्ट विकसित करने का दायित्व सौंपा  जो नासा के रॉकेट वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की सर्जनात्मक संभावनाओं का समुचित आकलन कर सके. इन विशेषज्ञों ने एक  टेस्ट का निर्माण किया और नासा ने भी उसे अपने लिए बहुत उपयोगी पाया. बात यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए थी, लेकिन हुई नहीं. टेस्ट पूरा हो जाने के बाद ये दोनों विशेषज्ञ और इनके साथी एक और सवाल से जूझने  लगे. सवाल यह था कि आखिर सर्जनात्मकता का उद्गम क्या है? वो कहां से आती है?  क्या यह कुछ लोगों में जन्म  से ही होती है, या इसे शिक्षा से अर्जित किया जाता है? और या फिर इसे अनुभवों से हासिल  किया  जाता है!

और इस सवाल से जूझते हुए इन वैज्ञानिकों ने चार और पांच बरस की उम्र वाले सोलह सौ बच्चों को एक टेस्ट दिया. असल में इस टेस्ट में कुछ समस्याएं दी गई थीं और उनको हल करने के लिए बच्चों ने जो जवाब दिये थे उन्हें इस कसौटी पर गया कि समस्याओं को सुलझाने के बच्चों के तरीके  कितने अलहदा,  कितने नए और कितने मौलिक हैं. इस टेस्ट के परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे. आप भी यह जानकर आश्चर्य से उछल पड़ेंगे कि चार से पांच बरस की उम्र वाले अट्ठानवे  प्रतिशत बच्चे उन वैज्ञानिकों की कसौटी पर जीनियस साबित हुए. अब शायद इन वैज्ञानिकों को भी अपनी शोध में मज़ा आने लगा था, सो इन्होंने  पांच बरस  बाद फिर से इन बच्चों को परखा. तब ये बच्चे दस बरस की उम्र के आसपास पहुंच गए थे. अब जो परिणाम आए वो और भी ज़्यादा चौंकाने वाले थे. अब इन्होंने पाया कि उन अट्ठानवे  प्रतिशत जीनियस बच्चों में से मात्र तीस  प्रतिशत बच्चे ही कल्पनाशीलता के स्तर पर जीनियस कहलाने के काबिल रह गए हैं. पांच बरस बाद फिर से इस प्रयोग को दुहराया गया और तब पाया गया कि पंद्रह बरस के हो चुके  इन बच्चों में मात्र बारह प्रतिशत बच्चे ही जीनियस कहलाने काबिल रहे हैं. और इसके बाद इन वैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष  दिया है वह तो हम सब को अपने मुंह छिपाने के लिए विवश कर देगा. उनका कहना है हम वयस्कों में तो मात्र दो प्रतिशत ही जीनियस कहलाने के हक़दार होते हैं!

यह कहना अनावश्यक है कि पांच, दस और पंद्रह बरस के जिन बच्चों पर यह टेस्ट किया गया वे सभी स्कूल जाने वाले बच्चे थे.  तो क्या यह समझा जा सकता है कि स्कूल, या कि हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों की सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करने की बजाय उसे कुचलती है? इसका जवाब मिलता है जोहानिसबर्ग में पले बढ़े और अब अमरीका वासी एक चर्चित लेखक गाविन नासिमेण्टो  के इस कथन में: “जिस संस्था को हम ऐतिहासिक रूप से स्कूल के नाम  से जानते हैं, उसका तो निर्माण ही शासक वर्ग की -न कि आम लोगों  की-  सेवा के लिए हुआ है.” अपनी बात को और साफ़ करते हुए गाविन कहते हैं, “उन्होंने यह भली भांति समझ लिया है कि तथाकथित अभिजन की ठाठदार विलासिता वाली उस जीवन शैली के निर्वहन के लिए जिसमें वे बहुत कम देकर बहुत ज़्यादा का उपभोग करते हैं,  बच्चों को बेवक़ूफ बनाया जाना और कृत्रिम अभावों की लालची व्यवस्था, अंतहीन शोषण और अनवरत युद्धों के स्वीकार के लिए ही नहीं बल्कि इनकी सेवा के लिए भी उनके दिमागों का अनुकूलन ज़रूरी है.” मुझे नहीं लगता कि वर्तमान स्कूलों पर इससे कड़ी टिप्पणी कोई और हो सकती है!

चलिये, फिर डॉ लैण्ड की तरफ लौटते हैं. उनका कहना है कि हम सबमें यह क्षमता है कि अगर हम चाहें तो अट्ठानवे  प्रतिशत यानि जीनियसों में शुमार हो सकते हैं. इसके लिए करना बस इतना है कि हम अपने आप को पांच साल के बच्चे में तब्दील कर लें. इस डर से निजात पा लें कि अगर ऐसा करेंगे तो ऐसा हो जाएगा. मुक्त ढंग से सोचना और सपने देखना शुरु करें. वे एक उदाहरण देकर अपनी बात साफ़ करते हैं. अगर किसी छोटे बच्चे के सामने  एक फॉर्क (टेबल पर रखा जाने वाला कांटा) रखें तो वो उसे बेहतर बनाने के लिए फटाफट अनेक सुझाव दे देगा. बस! हम भी उस जैसे बिंदास  बन जाएं! ठीक है ना?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 10 अप्रैल, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 3, 2018

एक पत्रकार की हत्या ने छीन ली प्रधानमंत्री की कुर्सी


स्लोवाकिया यूरोप महाद्वीप का मात्र 55 लाख की आबादी वाला एक छोटा-सा देश है. उत्तर में पोलैण्ड, दक्षिण में हंगरी, पूर्व में यूक्रेन और पश्चिम में ऑस्ट्रिया तथा चेक गणराज्य यानि चारों तरफ ज़मीन से  घिरा यह देश पहले चेकोस्लोवाकिया का अंग था. अब स्लोवाकिया एक संसदीय गणतंत्र है और इसकी राष्ट्रीय परिषद में एक सौ पचास सदस्य होते हैं जिनको हर चौथे बरस आम जनता चुनती है. यहां राष्ट्रपति का चुनाव भी आम जनता के मतों से ही होता है लेकिन सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है. सन 2012 से स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री डाइरेक्शन-सोशल डेमोक्रेसी पार्टी के नेता 54 वर्षीय रॉबर्ट  फिको थे. लम्बे समय से देश की राजनीति में सक्रिय फिको 2006 से 2010 तक भी देश के प्रधानमंत्री रह चुके थे.

आजकल सारी दुनिया में सर्वशक्तिमान नेताओं का जो दौर चल रहा है फिको भी उसके अपवाद नहीं थे. एक शानदार हिलटॉप  अपार्टमेण्ट  में पूरी शान-ओ-शौकत से रहने वाले फिको पत्रकारों  के असुविधाजनक सवालों पर न केवल गुर्राया करते थे, उन्हें लकड़बग्घा (हायना) और प्रॉस्टीट्यूट तक कह दिया करते थे. अपने देश की तमाम मुसीबतों का ठीकरा वे मुस्लिम शरणार्थियों और एक यहूदी फाइनेंसर के माथे फोड़ देने के आदी थे. उनकी पार्टी स्लोवाक कुलीनों, रूसी ताकतवरों और इतालवी माफियाओं से गलबहियां करने के लिए विख्यात थी.

लेकिन अचानक वो घटित हो गया, जो कल्पनातीत था. 15 मार्च को इस सर्वशक्तिमान प्रधान मंत्री को अपना इस्तीफा देने के लिए मज़बूर होना पड़ा. इस इस्तीफे की वजह बहुत मामूली थी. एक साधारण पत्रकार और उसकी महिला मित्र की रहस्यमयी स्थितियों में मृत्यु. 26 फरवरी 2018 को एक युवा पत्रकार जेन कुसियाक और उनकी मित्र मार्टिना कुसनिरोवा को गोली मार दी गई. अनुमान यह लगाया गया कि इस हत्या के पीछे यह बात थी कि जेन एक अहम स्टोरी पर काम कर रहे थे जिसका ताल्लुक स्लोवाकिया  के बड़े बड़े नेताओं और इटली के माफिया गिरोहों के बीच के संदिग्ध रिश्तों से था. कुसियाक ने बताया था कि किस तरह इटली के अपराधी गिरोह स्थानीय नेताओं, ख़ास तौर पर सत्तारूढ़ दल के नेताओं की मदद से पूर्वी स्लोवाकिया  के निर्धन इलाकों में घुसपैठ करते हैं. कुसियाक ने यह बात भी उजागर की थी कि ये नेता यूरोपियन यूनियन के धन का दुरुपयोग करते हैं. वैसे स्लोवाकिया में भ्रष्टाचार की चर्चाएं इतनी आम हैं कि एक बार तो अमरीका की  सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मैडलिन अलब्राइट ने स्लोवाकिया को यूरोप का ब्लैक होल तक कह दिया था. हत्या के बाद कुसियाक की यह स्टोरी दुनिया भर में प्रकाशित हुई है. इस दोहरे हत्याकाण्ड ने स्लोवाकिया के जन मानस को इतना क्षुब्ध किया कि वहां एक सशक्त जन आंदोलन खड़ा हो गया. लोगों ने जेन और मार्टिना की तस्वीरें लेकर खूब प्रदर्शन किये. करीब दो सप्ताहों के प्रदर्शन और सजीव जन आंदोलन तथा तेज़ी से चले राजनीतिक घटना चक्र  की परिणति रॉबर्ट  फिको जैसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री  के त्यागपत्र में हुई. त्यागपत्र देते हुए भी रॉबर्ट फिको यह कहने से नहीं चूके कि जेन और मार्टिना की हत्या की बात करने वाले अपना निजी एजेंडा पूरा कर रहे हैं.

वैसे रॉबर्ट फिको ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह घोषणा की थी कि जेन और मार्टिना के हत्यारों को खोज निकालने वाले को करीब आठ करोड़ रुपयों का पुरस्कार दिया जाएगा, और  जिस समय वे यह घोषणा कर रहे थे तब उनके सामने की टेबल पर यह धनराशि भी प्रदर्शित की गई थी. उनके इस कृत्य पर  स्लोवाकिया वासियों ने यह कहकर खूब नाराज़गी व्यक्त की थी कि आखिर कोई प्रधानमंत्री इस तरह की अशिष्टता कैसे कर सकता है!

इस पूरे प्रकरण में एक और बात ग़ौर तलब है. जब राष्ट्रपति ने फिको का इस्तीफा स्वीकार किया तो उनकी जगह लेने के लिए उनके डेप्युटी पीटर पेलेग्रिनी ने सरकार बनाने का दावा पेश किया. लेकिन राष्ट्रपति महोदय ने उनके दावे को नामंज़ूर कर दिया. वजह? वे इस बात से आश्वस्त नहीं थे कि पीटर पेलेग्रिनी की नई सरकार जेन और मार्टिना की हत्या की निष्पक्ष जांच करा सकेगी. इसके मूल में यह बात  थी कि जेन की आखिरी रिपोर्ट में सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार पर गम्भीर आरोप लगाए गए थे, और राष्ट्रपति महोदय का खयाल था कि जिस दल पर इस हत्या काण्ड में लिप्त होने का संदेह है भला उसी दल का कोई नेता इस काण्ड की निष्पक्ष जांच  कैसे करा  सकता है! स्लोवाकिया में रॉबर्ट फिको और पीटर पेलेग्रिनी की नज़दीकी सबको मालूम थी. राष्ट्रपति महोदय ने ज़ोर देकर कहा है कि नई सरकार को जनता का भरोसा जीतना होगा. उधर स्लोवाकिया की जनता की सबसे बड़ी मांग फिलहाल यही है कि जेन और उसकी मित्र मार्टिना की हत्या की निष्पक्ष  जांच हो और अपराधियों को सज़ा मिले. जनता फिर से चुनाव करवाने की भी मांग कर रही है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 अप्रेल, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 27, 2018

कैमरून में पूरे पैतीस बरसों से जमे हुए हैं पॉल बिया


हाल में भारतीय समाचार माध्यमों में इस बात की काफी चर्चा रही थी कि चीन की सत्ताधारी कम्यूनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पद पर अपने किसी सदस्य को अधिकतम दो कार्यकाल देने का संवैधानिक प्रावधान हटाने का प्रस्ताव रखा है. वर्तमान प्रावधानों के मुताबिक चीन के राष्ट्रपति एक साथ दो कार्यकाल तक पद पर बने रह सकते हैं. चीन में यह व्यवस्था 1982 से लागू है और इसके तहत राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है. अगर यह प्रस्ताव लागू हो जाता है तो चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2023 में खत्म हो रहे अपने दूसरे कार्यकाल के बाद भी अपने  पद पर बने रह सकते हैं. राजनीति के जानकारों का खयाल है कि इस संवैधानिक  बदलाव का असल मक़सद शी जिनपिंग को उनके दूसरे कार्यकाल के बाद भी अनिश्चित काल तक इस पद पर बनाये रखना है.

इस चर्चा से मुझे अनायास ही दुनिया के एक अन्य देश के राष्ट्रपति पॉल बिया का ध्यान आ गया जो पिछले पैंतीस बरसों से यानि 1982 से अपने पद पर बने हुए हैं.  ये पॉल बिया 23.44 मिलियन की आबादी वाले मध्य और पश्चिम अफ्रीका में स्थित देश कैमरून के राष्ट्रपति हैं. कैमरून की भौगोलिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक विशेषताओं के कारण इसे अफ्रीका इन मिनिएचर के नाम से भी जाना जाता है. कैमरून में दो सौ से भी अधिक जन जातियां और भाषाई समूह निवास करते हैं. भारत में हमने हाल के दिनों में बोको हरम नामक एक बलवाई संगठन की गतिविधियों के संदर्भ में भी इस देश का नाम पढ़ा-सुना था. कैमरून के इन 85 वर्षीय राष्ट्रपति महोदय की गणना अफ्रीका में सर्वाधिक समय तक सत्तासीन रहे राजनेताओं में से एक के रूप में होती है. मज़े की बात यह है कि कैमरून की साठ प्रतिशत आबादी पच्चीस साल से कम उम्र वाले युवाओं की है और पॉल बिया उनके जन्म के पहले से इस पद पर जमे हुए हैं. लेकिन ये युवा जिस ताज़ा हवा में सांस ले रहे हैं उसमें  सैटेलाइट टीवी और इण्टरनेट के ज़रिये आने वाली जानकारियां भी हैं जिनसे इन्हें दुनिया के अन्य देशों में हो रहे बदलावों की जानकारियां मिलती रहती हैं. यही वजह है कि अब आहिस्ता-आहिस्ता कैमरून में इन राष्ट्रपति महोदय के प्रति असंतोष की आवाज़ें सुनाई देने लगी हैं. लोग इस बात को याद करने लगे हैं कि सन 2008 तक वहां राष्ट्रपति के कार्यकाल की सीमाएं तै थीं लेकिन उन सीमाओं को हटा लेने के कारण ही पॉल बिया 2011 में पुन: अपने पद पर निर्वाचित कर लिये गए. इस बरस अक्टोबर में वहां फिर से चुनाव होने हैं लेकिन अब तक तो पॉल बिया ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वे इस पद पर फिर निर्वाचित नहीं होना चाहेंगे.

पॉल बिया की सबसे अधिक आलोचना उनकी उस कार्यशैली की वजह से होती है जिसके कारण उन्हें अनुपस्थित राष्ट्रपति नाम से पुकारा जाने लगा है. यह बात याद की जाने लगी है कि अभी हाल ही में, दो बरस से भी अधिक समय के बाद उन्होंने अपनी पहली काबिना बैठक बुलाई है. इसके अलावा उनकी विदेश यात्राएं भी वहां खासी चर्चा और आलोचना का विषय बनी हुई हैं. बल्कि इन यात्राओं को लेकर तो वहां के सरकारी अख़बार कैमरून ट्रिब्यून और ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम एण्ड करप्शन रिपोर्टिंग नामक एक स्वतंत्र प्रोजेक्ट के बीच अच्छी खासी बहस हो चुकी है. इस प्रोजेक्ट ने विभिन्न समाचार पत्रों के हवाले से यह बात कही है कि राष्ट्रपति महोदय पिछले एक बरस में अपनी निजी यात्राओं पर करीब साठ दिन देश से बाहर रहे हैं. इस प्रोजेक्ट ने यह भी बताया है कि 2006 और 2009 में राष्ट्रपति महोदय एक तिहाई समय देश से बाहर रहे हैं. बताया गया कि विदेश में राष्ट्रपति महोदय जेनेवा के इण्टरकॉण्टीनेण्टल  होटल में समय व्यतीत करना पसंद करते हैं. जैसा कि इस तरह के सारे मामलों में होता है, कैमरून के सरकारी अखबार ने इन रिपोर्ट्स को चुनावी प्रोपोगैण्डा कहकर नकार दिया है.

पॉल बिया भले ही अपनी कुर्सी पर जमे बैठे हों, उनके देश के हालात कुछ ठीक नहीं हैं. सरकार बहुत निर्ममता से प्रतिपक्ष को कुचलने में जुटी है. विरोधियों की मीटिंग्स पर रोक लगा दी गई है और विपक्षी दलों  के नेताओं को जेलों में डाला जा रहा है. विश्वविद्यालय परिसरों में राजनीतिक प्रतिरोध पर पाबंदियां  आयद कर दी गई और सुरक्षा टुकड़ियों ने शिक्षकों की हड़ताल को अपने पैरों तले रौंद डाला है. बोको हरम से निबटने के नाम पर नागरिक अधिकारों का खुलकर हनन किया जा रहा है. पत्रकारों की आवाज़ को दबाने के अनगिनत मामले भी सामने आ रहे  हैं. ऐसे हालात में सभी की दिलचस्पी इस बात में होगी कि अक्टोबर में पॉल बिया फिर से राष्ट्रपति चुने जाते हैं या नहीं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 27 मार्च, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, March 23, 2018

चाहे जो हो जाए हम सुप्रभात संदेश भेज कर ही मानेंगे!


अब तो यह बात प्रमाणित भी हो गई है कि जब बात गुड मैनर्स की हो रही हो तो इस गाने को याद कर लिया जाना चाहिए: “सबसे आगे होंगे हम हिंदुस्तानी!”  शादाब लाहौरी साहब ने क्या खूब लिखा था  कि “हज़ूर आपका भी एहतराम  करता चलूँ/ इधर से गुज़रा था सोचा सलाम करता चलूँ” लेकिन हम तो उनके सोच से भी काफी आगे निकल आए हैं. अब हम किसी के नज़दीक से गुज़रने पर ही उसे सलाम नहीं करते हैं, खुद बड़े  सबेरे जाग कर लोगों के घर-घर जाकर अपना सलाम पेश  करने लगे हैं. बेशक यह करने के लिए हम अपने मोबाइल फोन और इण्टरनेट का इस्तेमाल करते हैं. हममें से बहुत सारे लोग हर सुबह उठकर पहला काम अपने परिवार जन, दोस्तों और सामान्य जान पहचान वालों तक को भगवान, फूल पत्ती, उगते हुए सूर्य, किसी मासूम शिशु के प्यारे चेहरे या ऐसी ही किसी और तस्वीर के साथ सुप्रभात कहकर करते हैं. सुप्रभात कहने का यह उत्साह हममें इतना ज़्यादा है कि उन समूहों में घुसकर भी हम अभिवादन करने से बाज़ नहीं आते हैं जिनके एडमिन कई बार यह प्रार्थना कर चुके होते हैं कि कृपया यहां गुड मॉर्निंग के संदेश पोस्ट न करें! अगर मौका लग जाए तो हम ऐसे अशिष्ट एडमिन से जूझने में और उन्हें दो-चार सदाचारी उपदेश पिलाने में भी कोई संकोच नहीं करते हैं. आखिर शिष्टाचार भी कोई चीज़ होती है, साहब!

शिष्टाचार के प्रति हमारे इस लगाव पर प्रमाणीकरण की मुहर लगाई है गूगल ने. असल में हुआ यह कि जब गूगल वालों को यह बात पता चली कि इधर दुनिया भर में लोगों के स्मार्टफोन जल्दी-जल्दी फ्रीज़ होने लगे हैं, तो उन्होंने अपने शोधकर्ताओं को इसके कारण की पड़ताल करने का ज़िम्मा सौंपा. इन शोधकर्ताओं ने पाया कि इस समस्या के मूल में है भारतीयों का सुप्रभात  प्रेम! उन्होंने पाया कि इन शुभ कामना संदेशों की वजह से भारत में हर तीन में से एक स्मार्टफोन प्रयोगकर्ता के फोन की मेमोरी इतनी भर जाती है कि उसके बोझ तले वह फोन चीं बोल जाता है! अब ज़रा भारतीयों की इस संस्कारशीलता की तुलना संस्कारविहीन अमरीकियों से भी कर लीजिए. वहां हर दस में से एक फोन के साथ ही यह हादसा होता है! सुप्रभात को सलीके से, यानि किसी न किसी तस्वीर के साथ जोड़कर  कहने का भारतीयों का शौक इतना प्रबल है कि एक अमरीकी अखबार की पड़ताल के अनुसार पिछले पांच बरसों में गूगल पर गुड मॉर्निंग के साथ प्रयुक्त  की जा सकने वाली छवि की तलाश में दस गुना वृद्धि हुई है. ज़ाहिर है कि आपको या हमको सुबह-सुबह जो तस्वीरें मिलती हैं उनमें से ज़्यादातर  गूगल के भण्डार से ही निकाली गई होती हैं. वैसे इस मामले में पिंटरेस्ट नामक एक अन्य साइट भी पीछे नहीं रही है और वहां से भी सुप्रभात की तस्वीरें डाउनलोड करने वाले हिंदुस्तानियों की संख्या पिछले एक बरस में नौ गुना बढ़ी है.

सद्भावना या शिष्ट आचरण के प्रति हमारा यह अनुराग हर सुबह शाम अभिवादन करने तक ही सीमित नहीं है. हाल में वॉट्सएप वालों ने बताया है कि 2018 के पहले दिन हम भारतीयों ने 2000 करोड़ से भी ज़्यादा नव वर्ष शुभ कामना संदेशों का आदान-प्रदान किया.  यह संख्या दुनिया के किसी भी देश के निवासियों द्वारा उस दिन भेजे गए संदेशों से ज़्यादा थी. यहीं यह भी जान लें कि भारत में अकेले वॉट्सएप के 20 करोड़ सक्रिय प्रयोगकर्ता  हैं. वॉट्सएप के लिए यह संख्या इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण है कि इसी वजह से वे लोग भारतीयों की पसंद का विशेष ध्यान रखने लगे हैं और पिछले साल से तो उन्होंने ख़ास हमारे लिए एक ऐसा स्टेटस मैसेज जोड़ा है जिसके माध्यम से हम एक साथ अपने सभी सम्पर्कों को सुप्रभात कह सकते हैं! हम भारतीयों के शिष्टाचार निर्वहन के इस पुण्य कर्म में कम कीमत वाले स्मार्ट फोन्स और डेटा दरों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा के कारण आई ज़बर्दस्त कमी की बहुत बड़ी भूमिका है.

शिष्टाचार के निर्वहन का यह उत्साह कुछ लोगों में इतना ज़्यादा है कि अगर दो-चार दिन आप उनके संदेशों का जवाब न दें तो वे फोन कर पूछ भी लेते हैं क्या आपको उनके संदेश नहीं मिल रहे हैं? जो आपसे ज़्यादा नज़दीकी महसूस करते हैं वे आपकी बेरुखी पर मुंह फुला लेने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने में भी संकोच नहीं करते हैं. यहां यह बात भी याद आए बग़ैर नहीं रहेगी कि देश के एक शीर्षस्थ व्यक्तित्व ने पिछले दिनों सार्वजनिक  रूप से इस बात पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त की थी कि जिन्हें वे हर सुबह सुप्रभात संदेश भेजते हैं उनमें से बहुत सारे उनके अभिवादन का जवाब तक देने की शालीनता नहीं बरतते हैं!

हमारे अपनों के फोन की मेमोरी चाहे जितनी जल्दी फुल और उनका फोन ठस्स हो जाए, हम गुड मॉर्निंग-गुड ईवनिंग कहना कैसे छोड़ सकते हैं?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत शुक्रवार, 23 मार्च, 2018 को इसी शीर्षक सेे प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 13, 2018

डॉक्टरों ने कहा- हमारी तनख़्वाह मत बढ़ाओ!


कनाडा के क्यूबेक प्रांत के सैंकड़ों डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों ने अपनी सरकार को एक ज्ञापन देकर अपने बढ़े हुए वेतन का विरोध किया है और सरकार से अनुरोध किया है कि वह इस राशि का इस्तेमाल नर्सों के लिए तथा मरीज़ों को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने के लिए करे. यह बात सर्वविदित है कि कनाडा में सरकार सभी नागरिकों को निशुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान करती है. यह सुविधा मरीज़ की ज़रूरत पर आधारित होती है न कि उसकी खर्च करने की क्षमता पर. इसी फरवरी माह में वहां की सरकार ने अपने इस इलाके के मेडिकल स्पेशलिस्ट्स की तनख़्वाह में 1.4 प्रतिशत की वृद्धि करने की घोषणा की थी.

ऐसा माना जाता है कि क्यूबेक इलाके में डॉक्टरों को देश के अन्य इलाकों की तुलना में पहले ही ज़्यादा वेतन मिलता है. लेकिन इसी इलाके में नर्सों और अन्य चिकित्सा सेवकों की हालत बहुत बुरी है. इसी जनवरी में वहां की एक नर्स एमिली रिकार्ड की एक फेसबुक पोस्ट वायरल हुई थी जिसमें उसने अपनी नम आंखों की एक तस्वीर लगाते हुए बताया था कि उसे पूरी रात जागकर सत्तर मरीज़ों की देखभाल करनी पड़ी है और अब उसके पांव इतना दर्द कर रहे हैं कि वह सो भी नहीं पा रही है. उसने लिखा था कि वह अपने काम के बोझ से टूट चुकी है और उसे इस बात से शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि वो अपने मरीज़ों को कितनी कम सेवा दे पाती है. “हमारा स्वास्थ्य तंत्र बीमार और मरणासन्न है.” कल्पना की जा सकती है कि कितनी पीड़ा के साथ उसने यह लिखा होगा. कनाडा के नर्सिंग संघ ने भी सरकार पर ज़ोर डाला है कि वो यह सुनिश्चित करे कि एक नर्स को अधिकतम कितने मरीज़ों की देखभाल करनी है. क्यूबेक की नर्स यूनियन की अध्यक्ष नैंसी बेडार्ड का कहना था कि डॉक्टरों के लिए तो पैसों की कोई कमी नहीं होती है लेकिन मरीज़ों की देखभाल करने वाले औरों  की कोई परवाह नहीं की जाती है. 

नर्सों की इस व्यथा-कथा ने क्यूबेक के डॉक्टरों की अंतरात्मा को इस कदर झकझोरा कि उन्होंने एक ज्ञापन देकर अपनी सरकार से यह अनुरोध  कर दिया कि वह  उनके बढ़ाये हुए वेतन को निरस्त कर दे और इस तरह जो राशि बचे उसे बगैर स्वास्थ्य कर्मियों के कार्यभार को असह्य बनाए, क्यूबेक क्षेत्र के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में खर्च कर दे. अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि हमारी तनख़्वाहों में यह वृद्धि इसलिए और भी ज़्यादा आहत करने वाली है कि हमारी नर्सों, क्लर्कों और अन्य पेशेवरों को बहुत कठिन हालात में काम करना पड़ रहा है और हमारे मरीज़ों को हाल के वर्षों में की गई भीषण कटौतियों और सारी सत्ता के स्वास्थ्य मंत्रालय में केंद्रीकृत हो जाने की वजह से ज़रूरी सुविधाओं तक से वंचित रहना पड़ रहा है. इन तमाम कटौतियों का जिस एक बात पर कोई असर नहीं पड़ा है वो है हमारी तनख़्वाहें. और इसलिए इस वृद्धि को अभद्रबताते हुए उन्होंने लिखा, “हम क्यूबेक डॉक्टर यह अनुरोध कर रहे हैं कि चिकित्सकों को दी गई वेतन वृद्धि वापस ले ली जाए और इस तंत्र  के संसाधनों का बेहतर वितरण स्वास्थ्य कर्मियों की बेहतरी के लिए और क्यूबेक के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराने के लिए किया जाए.”

यह प्रकरण हमारी आंखें खोल देने वाला है. इससे पता चलता है कि एक ज़िम्मेदार और सभ्य समाज का चेहरा कैसा होता है. क्यूबेक के डॉक्टर चाहते तो बिना कोई ना-नुकर किये अपनी बढ़ी हुई तनख़्वाहें स्वीकार कर सकते थे. लेकिन उनके इंसान होने के एहसास ने उन्हें यह न करने दिया. अपने से ज़्यादा फिक्र उन्हें अपने सहकर्मियों की थी कि उन्हें कम तनख़्वाह में ज़्यादा समय खटना पड़ता है. उन्होंने इस बात की भी फिक्र की कि उनके प्रांत के नागरिकों को सरकारी कटौती की वजह से उस ज़रूरी स्वास्थ्य सेवा से वंचित रहना पड़ रहा है जिसके वे हक़दार हैं.

लेकिन सब जगह सब कुछ अच्छा  ही नहीं होता है. डॉक्टरों की इस संवेदनशीलता पर झाड़ू फेरते हुए  कनाडा के चिकित्सा मंत्री ने अपने बयान में कहा कि अगर डॉक्टरों को लगता है कि उन्हें ज़्यादा तनख़्वाहें दी जा रही हैं तो वे उसे  टेबल पर ही छोड़ जाएं.  मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूं कि हम उस रकम का बेहतर इस्तेमाल कर लेंगे. डॉक्टरों की इस व्यथा पर टिप्पणी करते हुए कि नर्सों को बहुत कम वेतन मिल रहा है और रोगियों पर होने वाले खर्च में कटौतियां की जा रही हैं, मंत्री जी ने फरमाया कि हमारे पास तमाम ज़रूरतों के लिए पैसा है और हम समय पर सारी समस्याएं हल कर लेंगे.

यानि मंत्री तो कनाडा में भी वैसे ही हैं जैसे अपने देश में हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ डुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 मार्च, 2018 को 'कनाडा के डॉक्टरों ने लौटाया बढ़ा हुआ वेतन' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.