Tuesday, November 21, 2017

पश्चिम ने डिजिटल से किनारा करना शुरु किया

भारतीय टेलीविज़न के बहुत लोकप्रिय कार्यक्रमों में से एक कौन बनेगा करोड़पति के अंत में अमिताभ बच्चन कहते थे, यह डिजिटल का ज़माना है, और फिर वे अपने हाथ में लिये हुए टेबलेट के माध्यम से विजेता को आनन-फानन में उसकी जीती हुई धन राशि ट्रांसफर कर देते थे. भारत सरकार ने भी डिजिटलीकरण पर काफी ध्यान दिया है. और इतना ही  क्यों, हम सबकी ज़िंदगी में काफी कुछ डिजिटल हो गया है. पश्चिम से आई इस नई तकनीक ने शुरु-शुरु में अपने नएपन से हमें आकर्षित किया, हालांकि अनेक आशंकाएं भी इसने जगाईं, और फिर आहिस्ता-आहिस्ता इसकी सुगमता, तेज़ी और कम खर्च बालानशींपन ने हम सबको अपना मुरीद बना लिया. आज हालत यह है कि हमारी ज़िंदगी का शायद ही कोई पक्ष ऐसा बचा हो जिसमें डिजिटल का प्रवेश न हो चुका हो.

लेकिन बहुतों को शायद यह बात अविश्वसनीय भी लगे, लेकिन है सच, कि जिस पश्चिम से यह डिजिटल आंधी हमारी ज़िंदगी में आई है उसी पश्चिम ने अब डिजिटल से दूरी बनाना शुरु कर दिया है.  अमरीका में हाल में ऐसी अनेक किताबें बाज़ार में आई हैं जिनमें डिजिटल तकनीक के हानिप्रद प्रभावों पर सप्रमाण और विस्तार से चर्चा की गई है. इन किताबों में यह चर्चा भी है कि कैसे स्मार्टफोन्स हमारे बच्चों की मानसिकता को विकृत कर रहे हैं और सोशल मीडिया किस तरह हमारी प्रजातांत्रिक संस्थाओं को क्षति पहुंचा रहा है. वहां इस बात की भी चर्चाएं हैं कि डिजिटल तकनीक एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को पुष्ट करती हैं. हाल में अमरीका में हुए एक सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई है कि लगभग सत्तर प्रतिशत अमरीकी डिजिटलीकरण के कारण हुए कामकाज के यंत्रीकरण से रोज़गार के अवसरों पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर से चिंतित हैं. मात्र इक्कीस प्रतिशत  अमरीकी फेसबुक को दी जाने वाली  अपनी व्यक्तिगत जानकारियों की गोपनीयता के प्रति आश्वस्त पाए गए और लगभग आधे उत्तरदाता यह मानते  पाए गए कि सोशल मीडिया हमारी मानसिक और शारीरिक सेहत पर बुरा असर डालता है. इस बात की पुष्टि अमरीकी साइकीऐट्रिक एसोसिएशन ने भी कर दी.

और बातें केवल फिक्र करने तक ही सीमित नहीं हैं.  अपने देश में जहां हम हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि ई बुक्स का चलन बढ़े, अमरीकी प्रकाशकों के संघ के अनुसार यह लगातार तीसरा बरस है जब अमरीका में पारम्परिक मुद्रित किताबों की बिक्री में वृद्धि नोट की गई है. यही नहीं वहां किताबों की दुकानें भी पिछले कई सालों से बढ़ती जा रही हैं. और बात सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं है. भारत में चलन से करीब-करीब बाहर हो चुकीं विनाइल वाली एलपी रिकॉर्ड्स का चलन वहां बढ़ता जा रहा है और बताया जाता है कि अकेले अमरीका में हर सप्ताह कोई दो लाख विनाइल रिकॉर्ड्स बिक रही हैं. फिल्म वाले कैमरे, कागज़ की बनी नोटबुक्स, बोर्ड गेम्स आदि भी पहले से ज़्यादा खरीदे जाने लगे हैं.

संशयालु लोग कह सकते हैं कि यह सब पुराने के प्रति मोह यानि नोस्टाल्जिया की वजह से हो रहा है. लेकिन यही सच नहीं है. सच यह भी है कि बावज़ूद इस बात के कि डिजिटल सामग्री बहुत सस्ती होती है, लोग किताबों की तरफ इसलिए लौट रहे हैं कि उन्हें लगने लगा है कि किताब हाथ  में लेकर उसके स्पर्श, उसकी गंध, उसकी ध्वनि आदि का जो मिला-जुला अनुभव  आप पाते हैं वह डिजिटल में मुमकिन ही नहीं है. किसी किताब  को आप खरीद, बेच और भेंट में दे सकते हैं, उसके बहाने दोस्ती कर सकते हैं, और अगर पुरानी हिंदी फिल्मों को याद करें तो किताबों में ख़तों का आदान-प्रदान कर मुहब्बत तक कर सकते हैं. यह सुख डिजिटल में कहां?  इतना ही नहीं, गूगल जैसी अग्रणी और भविष्यवादी कम्पनी में भी  पिछले कई बरसो से यह रिवायत है कि वेब डिज़ाइनर्स को अपने किसी भी नए प्रोजेक्ट की पहली योजना कागज़ पर कलम से ही बनानी होती है. कम्पनी का सोच यह है कि स्क्रीन पर काम करने की तुलना में इस तरह से अधिक और बेहतर नए विचार उपजते हैं.

पश्चिम में डिजिटल से पीछे हटने के पक्ष में कुछ और बातों पर भी ध्यान दिया जाने लगा है, जैसे यह कि इससे संचालित सोशल मीडिया में बुरी भाषा का जितना प्रयोग होने लगा है वैसा प्रयोग पारम्परिक माध्यमों में नहीं होता है. इस बात को तो अब पूरी तरह स्वीकार कर ही लिया गया है कि डिजिटल माध्यम मानवीय सम्पर्क के खिलाफ़ जाते हैं, जबकि हमारी बेहतरी के लिए मानवीय सम्पर्कों का होना बेहद ज़रूरी हैं. लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद  यह बात सभी स्वीकार करते हैं कि डिजिटल का पूरी तरह त्याग मुमकिन नहीं है. इसलिए अब एक ही विकल्प बचा है और वह यह कि इसका इस्तेमाल विवेकपूर्वक किया जाय और इसके अतिप्रयोग  से बचा जाए. पश्चिमी देश इसी दिशा में  प्रयासरत हैं.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्ग्त मंगलवार, 21 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 14, 2017

लाओ, तुम्हारा कचरा हम खरीद लेते हैं!

अगर मैं बग़ैर किसी भूमिका के आपसे यह कहूं कि दुनिया में कम से कम एक देश ऐसा है जिसका संकट हमारी कल्पना से भी परे है, तो निश्चय ही आप चौंक जाएंगे. मैं बात कर रहा हूं एक करोड़ से कम आबादी वाले स्कैण्डिनेवियाई देश स्वीडन की. यह देश आजकल एक बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है, और संकट यह है कि इसके पास कूड़े की इतनी भीषण कमी हो गई है कि इसे अपने पड़ोसी देशों की ओर याचना भरी निगाहों से देखना पड़ रहा है. लेकिन इस बात में एक पेच और है. स्वीडन के पास कूड़े की कमी है, लेकिन यह देश पड़ोसी देशों से कूड़ा खरीद नहीं रहा है. उल्टे वे देश अपना कूड़ा लेने के उपकार के बदले स्वीडन को भुगतान कर रहे हैं. है ना ताज्जुब की बात!

दरअसल स्वीडन ने अपने कूड़े को बरबाद न कर उसको जलाकर अपने रीसाइक्लिंग संयंत्रों को  धधकाए रखने का एक बेहद कामयाब और प्रभावशाली तंत्र विकसित कर लिया है और इस तंत्र के कारण देश की आधी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं. यहीं यह भी जान लें कि स्वीडन के कचरे का महज़ एक प्रतिशत ही है जो अनुपयोगी रहकर अपशिष्ट भराव क्षेत्रों में डाला जाता है. पिछले कुछ बरसों में स्वीडन ने अपनी राष्ट्रीय रीसाइक्लिंग नीति को इतना मुकम्मल बना लिया है कि बहुत सारी निज़ी कम्पनियां अपशिष्ट पदार्थों का संग्रहण कर उसे जलाकर जो ऊर्जा उत्पन्न करती है वह एक केंद्रीय हीटिंग नेटवर्क के माध्यम से ठिठुरते हुए मुल्क को सुखद ऊष्मा प्रदान करती है. स्वीडन ने 1991 से ही  से जीवाश्म ईंधन पर भारी कर लगाकर उसके प्रयोग को हतोत्साहित करने की नीति लागू कर रखी है. वहां की सरकार ने लोगों को इस बात के लिए भी पूरी तरह शिक्षित और प्रशिक्षित कर दिया है कि वे किसी भी किस्म का कचरा बाहर फेंकने की बजाय उसे रीसाइक्लिंग के लिए दे दिया करें. न सिर्फ इतना, स्वीडन की नगरपालिकाओं ने कचरा संग्रहण का काम भी इतना व्यवस्थित और सुगम कर दिया है कि उसके लिए  कम से कम श्रम और  प्रयत्न करना होता है. वहां की  रिहायशी  इमारतों में स्वचालित वैक्यूम सिस्टम लगा दिये गए हैं जिसके कारण कचरे के संग्रहण और उसे एक से दूसरी जगह ले जाने पर होने वाले खर्च में भी भारी कमी आ गई है. अब हालत यह हो गई है कि स्वीडन का सारा कचरा ऊर्जा पैदा करने में प्रयुक्त हो जाता है लेकिन स्वीडन ने कचरा जलाने के जो संयंत्र अपने देश में लगाए हैं उनकी क्षमता  इतनी ज़्यादा है कि उन्हें चलाए रखने के लिए स्वीडन का अपना कचरा कम पड़ रहा है. 

ऐसे में कुछ पड़ोसी देशों, विशेषकर नॉर्वे और इंगलैण्ड  से  कचरा आयात करके इन संयंत्रों को कार्यरत रखना पड़  रहा है. विदेशों से स्वीडन जो कचरा आयात करता है उसकी मात्रा में लगातार वृद्धि होती जा रही है. सन 2005 से अब तक यह  वृद्धि चार गुना हो  चुकी है. माना जाता है कि अभी लगभग 900 ट्रक कूड़ा प्रतिदिन आयात किया जा रहा है.   लेकिन इसमें भी मज़ेदार बात यह है कि क्योंकि स्वीडन के आस-पास के यूरोपीय यूनियन के अधिकांश देशों में लोगों को अपने कचरे को घर से बाहर डालने पर भारी जुर्माना अदा करना होता है, अत: ये देश उससे कम राशि स्वीडन को चुका कर अपने कचरे से निजात पा रहे हैं. इस तरह उन देशों को तो अपने कचरे से मुक्ति मिल ही रही है, स्वीडन भी जलाने योग्य कचरे की कमी के अपने संकट से मुक्ति पाने के साथ-साथ  कमाई भी कर  रहा है. स्वीडन की यह रीसाइक्लिंग नीति उसके पड़ोसी देशों के लिए भी अनुकरणीय साबित हो रही है लेकिन वे अभी तक कामयाबी के उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाये हैं जो स्वीडन हासिल कर चुका है. मसलन, ब्रिटेन ने एक रीसाइक्लिंग नीति तो बना ली है लेकिन वह इतनी जटिल है कि वहां के नागरिक हमेशा भ्रमित ही रहते हैं.

लेकिन इससे यह न समझ लिया जाए कि स्वीडन अपनी व्यवस्थाओं से पूरी तरह संतुष्ट है. अब वहां इस बात पर विमर्श चल  रहा है कि संग्रहीत कचरे को जलाने की बजाय उसकी ठीक से छंटाई  कर उसे समुचित तरह से  रीसाइकल किया जाए ताकि कार्बन डाई ऑक्साईड के उत्सर्जन में कमी लाई जा सके. उल्लेखनीय है कि अभी 85 से 90 प्रतिशत कचरे को ऊर्जा उत्पादन के लिए जलाया जाता है और इस प्रक्रिया में काफी सीओ2 उत्सर्जन होता है.  


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 14 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, November 10, 2017

पेरू में सौंदर्य प्रतियोगिता में उठी स्त्री हक़ की आवाज़

लातिन अमरीकी देशों में पेरू का एक विशेष स्थान है. मात्र 31.77 मिलियन की आबादी वाले इस देश ने अपनी आर्थिक नीतियों के सफल क्रियान्वयन से पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की है. पिछले एक दशक में इस देश ने अपनी गरीबी की दर को घटा कर आधा कर लिया  है और इससे यहां के सत्तर लाख लोग जो कि आबादी का 22 प्रतिशत हैं, गरीबी से उबर चुके हैं.  लेकिन हाल में इस देश का नाम एक और वजह से सुनने को मिला. यह प्रकरण भी मिसाल पेश करने का ही है. यहां एक सौंदर्य प्रतियोगिता आयोजित होती है जिसमें पेरू सुंदरी (मिस पेरू) का चयन किया जाता है.

दुनिया के और बहुत सारे देशों की ही तरह पेरू में भी सौंदर्य प्रतियोगिताओं का एक सुनिश्चित तौर-तरीका है. अन्य बहुत सारे चयन उपक्रमों से गुज़रने के बाद चुनिंदा सुंदरियों को एक कतार में खड़ा किया जाता है और फिर उनमें से एक-एक करके आगे आती है और अपनी  देह के माप (वक्ष-कटि,नितम्ब) के आंकड़े उपस्थित विशिष्ट दर्शक समुदाय के सामने प्रस्तुत करती हैं. पेरू का यह समारोह वहां के राष्ट्रीय टीवी नेटवर्क पर भी सजीव प्रसारित होता है और इस बार के प्रसारण के लिए कहा जाता है कि वह वहां के सर्वाधिक देखे जाने वाले कार्यक्रमों में से एक था.

सब कुछ बहुत व्यवस्थित तरीके से चल रहा था. दर्शक भी शाम का भरपूर आनंद ले रहे थे. तभी सुंदरियों के माइक पर आने की घोषणा हुई और पहली सुंदरी ने आकर कहा, “मेरा नाम है कैमिला केनिकोबा. मैं लीमा का प्रतिनिधित्व कर रही हूं. मुझे यह बताना है कि मेरे देश में पिछले नौ बरसों में भ्रूण हत्या के 2202 केस दर्ज़ हुए हैं.” जो लोग 32-26-33 जैसे आंकड़े सुनने की  उम्मीद कर रहे थे उन्हें एक झटका तो लगना ही था. वे इस झटके से उबर पाते उससे पहले दूसरी सुंदरी माइक पर आई, और बोली: “मेरा नाम है कारेन क्यूटो और मैं लीमा का प्रतिनिधित्व करती हूं. मुझे यह बताना है कि मेरे देश में इस बरस 82 भ्रूण हत्याएं हुई हैं और 156 भ्रूण हत्याओं के प्रयास हुए हैं.” और इसके बाद तो जैसे एक सिलसिला ही बन गया. “अलमेंन्द्रा मेरोक़ुइन के  अभिवादन स्वीकार कीजिए. मैं कैनेट से हूं और बताना चाहती हूं कि 25 प्रतिशत लड़कियों और किशोरियों के साथ उनके स्कूलों में बदसुलूकी होती है.” बेल्जिका गुएरा ने कहा, “मुझे यह बताना है कि विश्वविद्यालयों की 65 प्रतिशत युवतियों के साथ उनके साथी ही बदसुलूकी करते हैं.”  और फिर आई रोमिना लोज़ानो: “मेरा आंकड़ा यह है कि सन 2014 से अब तक 3114 स्त्रियां अनुचित  बर्ताव की शिकार हुई हैं.” रोमिना को इस प्रतियोगिता की विजेता घोषित किया गया और वे इसी माह लास वेगस में आयोजित होने वाले मिस यूनिवर्स पेजेण्ट में अपने देश की नुमाइंदगी करेंगी.

बेशक प्रतियोगी युवतियों का यह कदम आकस्मिक नहीं, पूर्व नियोजित था. इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि जब ये सुंदरियां अपने आंकड़े प्रस्तुत कर रही थीं तब नेपथ्य में एक स्क्रीन पर अखबारों में छपी इसी तरह की खबरों की कतरनें दिखाई जा रही थीं. ज़ाहिर है कि ऐसा बिना पूर्व तैयारी के मुमकिन नहीं था. बाद में यह बात सामने आ भी गई कि इन युवतियों ने आयोजकों की सहमति से ही यह किया था. वैसे, पेरू में स्त्रियों  के खिलाफ हिंसा एक विकट समस्या मानी जाती है, और पिछले अगस्त में राजधानी लीमा में इसके खिलाफ एक बड़ा प्रदर्शन भी  हो चुका है. असल में तब घरेलू हिंसा का एक हाई प्रोफाइल मामला खूब  चर्चित रहा था जिसमें  एक वकील को उसका पूर्व बॉय फ्रैण्ड होटल के रिसेप्शन पर बालों से खींचता हुआ दर्शाया गया था. यह प्रदर्शन इतना ज़ोरदार था कि टाइम पत्रिका ने इसे अपने चुनिंदा सौ की सूची में शामिल किया था. तब से अनेक बार पेरू में स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ें उठती रही हैं.

इस प्रतियोगिता के समापन खण्ड में हर प्रतियोगी के सामने यह सवाल रखा गया कि वे अपने स्तर पर स्त्रियों के खिलाफ़ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए क्या करना चाहेंगी. इस सवाल के जवाबों के दौरान जहां यह बात सामने आई कि हर प्रतियोगी स्त्री के खिलाफ बदसुलूकी को बहुत गम्भीरता से लेती है, अनेक मौलिक और उपयोगी सुझाव भी सामने आए. इस कार्यक्रम के दर्शकों का खयाल है कि भले ही सौंदर्य प्रतियोगिताएं स्त्री को एक वस्तु के रूप में पेश करती हैं और इनका अपना व्यावसायिक एजेण्डा  होता है, इन्हें बहुत बड़ा समुदाय रुचि पूर्वक देखता है और इसलिए इस मंच से स्त्री पर होने वाले अत्याचारों-अनाचारों  का मुखर विरोध जन चेतना जगाने के लिहाज़ से बहुत महत्व रखता है. सौंदर्य प्रतियोगिता में आयोजकों की सहमति से इस तरह का प्रतिरोध कर पेरू की सुंदरियों ने पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की है, और इस मिसाल को  सर्वत्र सराहा जा रहा है.  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत शुक्रवार, 10 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 31, 2017

जनसंख्या की कमी से जूझ रहा है इटली

जब भी अपने देश की समस्याओं की चर्चा होती है, बात घूम फिरकर इस बिंदु पर आ टिकती है कि हमारे देश की आधारभूत समस्या इसकी विशाल जनसंख्या है. आज़ादी के बाद अनेक प्रकार से जनसंख्या को नियंत्रित करने का प्रयास हुए हैं और उन प्रयासों को कामयाबी भी मिली है लेकिन देश के संसाधनों के अनुपात में जनसंख्या इतनी अधिक है कि वे प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे वाली कहावत को चरितार्थ करने से आगे नहीं बढ़ पाते हैं. इस बात का उल्लेख करते हुए अगर मैं आपसे कहूं कि एक देश ऐसा भी है जो हमसे एकदम उलट समस्या से जूझ रहा है, तो क्या आप मेरी बात पर विश्वास करेंगे? इटली का नाम तो आपने सुना ही है.  पिछले कई दशकों से यह देश निरंतर घटती हुई जनसंख्या से त्रस्त है. इस देश में और विशेष रूप से इसके ऐतिहासिक महत्व के छोटे शहरों में जनसंख्या इतनी कम होती जा रही है कि वहां के प्रशासकों को अनेक अजीबोगरीब नुस्खे आजमाने पड़ रहे हैं! इटली की सरकार ने अपने मुल्क के बहुत सारे छोटे लेकिन खूबसूरत शहरों को सप्ताहांत  के आमोद-प्रमोद के लिए आदर्श ठिकानों के रूप में प्रचारित करना शुरु किया है. मात्र बारह स्थायी निवासियों वाला लाज़ियो ऐसा ही एक शहर है.  प्रचार का सुपरिणाम यह हुआ है कि पहले जहां इस शहर को देखने मात्र चालीस हज़ार लोग आते थे, अब उनकी संख्या बढ़कर आठ लाख प्रतिवर्ष हो गई है. कुछ शहरों के पुराने घरों  को होटलों में तब्दील कर पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाया जा रहा है. कुछ शहर ऐसे भी हैं जो विज्ञापन देकर शरणार्थियों को अपने यहां बुला  रहे हैं. कैलाब्रिया नामक एक शहर ने तो बाकायदा यह घोषित कर दिया है कि शरणार्थी ही इटली की अर्थव्यवस्था का भविष्य हैं. यानि मंज़र कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा हम लोग अपने देश में कस्बों के बस स्टैण्डों पर देखते हैं जहां टैक्सी वाले यात्रियों को खींच खांचकर अपनी गाड़ियों में ठूंसने की कोशिश में लगे रहते हैं.

इसी इटली का एक बहुत छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत शहर है कैण्डेला. अपनी दिलकश इमारतों और ऐतिहासिक किलों के लिए सुविख्यात इस शहर को पर्यटक और स्थानीय निवासी लिटिल नेपल्स कहकर गर्वित हुआ करते थे. यह याद दिलाने की ज़रूरत नहीं है कि नेपल्स जिसे इतालवी में नेपोलि बोला जाता है इटली का तीसरा सबसे बड़ा शहर है और दक्षिण-पश्चिमी तट पर बसा है.  यह एक यूनानी उपनिवेश हुआ करता था जो ईसा पूर्व चौथी सदी में रोमन साम्राज्य  का अंग बन गया था. फिर यह  रोमनों के पतन के बाद जर्मन और इसके बाद सोलहवीं सदी में स्पेन के शासनाधीन रहा. इस शहर की ख्याति इसके भव्य स्थापत्य  और कलात्मक वैभव के लिए रही है.  यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता दे रखी है. तो, नब्बे के दशक में इस कैण्डेला शहर की आबादी लगभग आठ हज़ार थी लेकिन निरंतर गिरती जा रही अर्थ व्यवस्था और घटते जा रहे नौकरी के अवसरों के कारण ज़्यादातर युवा इस शहर को छोड़कर अन्यत्र जा बसे  और शहर की आबादी घटकर मात्र दो हज़ार सात सौ रह गई है. इस आबादी में वृद्धजन ज़्यादा हैं. जनसंख्या की इस कमी का असर शहर की अर्थव्यवस्था और समग्र परिवेश पर भी पड़ा है. और इसी से चिंतित होकर कैण्डेला के मेयर ने एक ऐसी घोषणा की है जो कम से कम हमारे लिए तो बेहद चौंकाने वाली है. मेयर निकोला गट्टा ने दूसरी जगहों  से आकर इस शहर में बसने वालों के लिए नकद प्रोत्साहन राशि  देने की घोषणा की है. उनकी घोषणा के अनुसार सिंगल्स को इस शहर में आकर रहने पर 800 यूरो (भारतीय मुद्रा में लगभग  61 हज़ार रुपये), कपल्स को 1200 यूरो (92 हज़ार रुपये) और परिवार के साथ आने वालों को 2000 यूरो (करीब डेढ़ लाख रुपये) दिये जाएंगे. वैसे कैण्डेला  के मेयर ने हाल में  जैसी घोषणा की है वैसी घोषणा बोर्मिडा के मेयर पहले ही कर चुके हैं. उन्होंने अपने शहर में आ बसने वालों को दो हज़ार यूरो देने की घोषणा की थी, लेकिन उस घोषणा पर लोग इतनी  भारी संख्या में टूट पड़े कि मेयर महोदय को अपनी घोषणा वापस लेनी पड़ी. शायद इस प्रकरण से सबक लेते हुए कैण्डेला के मेयर महोदय ने अपनी घोषणा के साथ ये शर्तें भी जोड़ दी हैं कि ये लाभ तभी देय होंगे जब कोई इस शहर का स्थायी बाशिंदा बनने के लिए वचनबद्ध होगा, यहां एक मकान किराये पर लेगा और उसकी सालाना आमदनी कम से कम साढे सात  हज़ार यूरो होगी. इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए छह परिवार अब तक यहां आ चुके हैं और पांच अन्य परिवार आने की प्रक्रिया में हैं. उम्मीद और कामना की जानी चाहिए कि कैण्डेला शहर अपना खोया वैभव फिर से प्राप्त कर लेगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 31 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 24, 2017

किस्सा विकट संगीत प्रेमियों और उनसे त्रस्त नागरिकों का

क्या किसी संगीत-प्रेमी युगल का अपनी मोटर कार में स्टीरियो बजाना इतना बड़ा मुद्दा है कि अदालत को अपना कीमती वक़्त खर्च करते हुए उससे जिरह करनी पड़े और आखिरकार हस्तक्षेप करने को बाध्य होना पड़े? हाल में कनाडा के एक  शहर में जो कुछ घटित हुआ उससे तो यही लगता है कि यह मामला बहुत साधारण और नज़र अंदाज़ करने काबिल नहीं है. इस शहर में रहता है एक चौबीस वर्षीय युवा जिसका नाम है डस्टिन हैमिल्टन. डस्टिन न केवल संगीत प्रेमी है ध्वनि तकनीक का भी विशेषज्ञ है. उसने संगीत का बेहतरीन लुत्फ़  लेने के लिए अपनी क्रूज़र गाड़ी को आधुनिकतम ध्वनि उपकरणों से सज्जित कर रखा है. इस तकनीक में उसकी विशेषज्ञता का आलम यह है कि एक ऑटो साउण्ड प्रतियोगिता में उसे स्वर्ण  पदक तक मिल चुका है.  हैमिल्टन एक ख़ास किस्म के हड्डियों के रोग से ग्रस्त है जिसकी वजह से उसकी रीढ़ की हड्डी को गहरी क्षति पहुंची है. लेकिन यह पदक उसे इतना धिक प्रिय है कि तमाम असुविधाओं के बावज़ूद वो हमेशा इस पदक को अपने गले में लटकाए रहता है. डस्टिन वैंकूवर के सेण्ट्रल सानिच शहर में रहता है. उसकी गर्लफ्रैण्ड कैटरीना भी उसके साथ रहती है और संगीत से उसे भी बहुत गहरा लगाव है.

दरअसल डस्टिन और कैटरीना को बहुत ऊंची आवाज़ में संगीत सुनने का शौक है. कहा जाता है कि जब वे अपनी गाड़ी लेकर  निकलते हैं तो उससे निकलने वाली संगीत की ध्वनियां  इतनी ज़बर्दस्त होती हैं कि आस-पास के घरों के फर्श थरथराने लगते हैं, घरों की दीवारों पर लटकी तस्वीरें कांपने लगती हैं, टेबल पर रखे कॉफी मग नीचे गिर पड़ते हैं और घरों में रह रहे पालतू जानवर भयभीत हो उठते हैं. अगर रात का वक़्त हो तो डर के मारे गहरी नींद में डूबे बच्चों की चीखें निकल पड़ती हैं. और यह सब रोज़मर्रा की बातें होती हैं. स्वाभविक ही है कि इससे उस शहर के बाशिंदे परेशान हैं. हैमिल्टन  के घर से उनके दफ्तर के बीच रहने वाले नागरिक पिछले कुछ ही समय में उनके खिलाफ कम से कम सत्रह शिकायतें पुलिस में दर्ज़ करवा चुके हैं. इन शिकायतों पर गौर करते हुए स्थानीय पुलिस ने दो बार इस युगल को चेतावनी भी दी कि वे अपनी गाड़ी के साउड सिस्टम का वॉल्यूम धीमा रखा करें, लेकिन जब इन चेतावनियों का उन पर कोई असर नहीं हुआ तो पुलिस को उन्हें पाबंद करना पड़ा कि वे अपनी गाड़ी में स्टीरियो बजाएं ही नहीं. हैमिल्टन इस आदेश से सहमत नहीं था इसलिए वो अदालत में पेश हुआ और जब उससे पूछा गया कि उसे अदालती आदेश मानने में क्या दिक्कत है तो उसका कहना था कि संगीत से उसे बेपनाह मुहब्बत है, वो जो कुछ भी करता है संगीत के लिए ही करता है. असल में संगीत ही उसका जीवन है. उसने अदालत को यह भी बताया कि सैंकड़ों घण्टों की मेहनत से उसने अपनी गाड़ी में यह साउण्ड सिस्टम  फिट किया है और इस सिस्टम को खरीदने के लिए उसे अपनी गर्लफ्रैण्ड की सारी जमा पूंजी भी खपा देनी पड़ी है. ऐसे में संगीत न सुनने का आदेश भला वो कैसे मान सकता है? अदालत ने उससे यह भी अनुरोध किया कि वो दफ़्तर जाने का अपना रास्ता बदल ले ताकि उस इलाके के बाशिंदों  की शिकायत दूर हो सके. यहीं यह भी याद दिलाता चलूं कि इसी सोच के तहत उसकी गर्लफ्रैण्ड अपनी एक नौकरी छोड़ कर दूसरी नौकरी करने लगी है ताकि वह हैमिल्टन के साथ ही काम पर  जा सके.

पुलिस ने हैमिल्टन और कैटरीना के इस विकट संगीत प्रेम पर रोक लगाने के लिए अदालत के सामने एक और तर्क रखा है  जो खासा वज़नदार है.  पुलिस का कहना है कि इन लोगों की गाड़ी से निकलने वाले संगीत की तेज़ आवाज़ से वहां के बाशिंदे इतने ज़्यादा त्रस्त हैं कि वे लोग अब इनकी गाड़ी का पीछा तक करने लगे हैं. पुलिस को डर है कि कहीं ऐसा न हो कि हैमिल्टन और कैटरीना उन लोगों के हत्थे चढ़ जाए और वे लोग इन्हें कोई गम्भीर शारीरिक क्षति पहुंचा दें. यानि पुलिस ने इन लोगों की सुरक्षा का तर्क देते हुए भी इनके संगीत प्रेम पर नियंत्रण लगाने का अनुरोध किया है.

अब देखना है कि अगली पेशी पर अदालत किसके हक़ में फैसला सुनाती है! फिलहाल हैमिल्टन और कैटरीना अपने संगीत प्रेम पर अटल और अविचलित हैं. कैटरीना कहना है कि वो दस बरस से इस इलाके में रह रही है और उसे तेज़ आवाज़ में ही संगीत सुनने का आदत है, जबकि हैमिल्टन इस सारे विवाद को  बेहूदा करार देते हैं और अपनी कार को उस इलाके की सबसे उम्दा सांगीतिक कार बताते हुए कहते हैं कि इससे निकलने वाला संगीत उन्हें किसी सिम्फ़नी जैसा लगता है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 10, 2017

जब बाज़ार में आने को थी बच्चे पालने वाली मशीन

कुछ माह पहले जानी-मानी खिलौना निर्माता कम्पनी मैटल ने घोषणा की थी कि वो बहुत जल्दी एक बेबी सिटर किस्म का उपकरण ज़ारी करेगी जो कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशयल इण्टेलीजेंस- एआई) पर आधारित होगा. कम्पनी के अनुसार एरिस्टोटल (अरस्तू) नामक यह उपकरण ध्वनि नियंत्रित एक स्मार्ट शिशु मॉनिटर के रूप में डिज़ाइन किया जा रहा था. इस उपकरण का घोषित मकसद था माता-पिताओं को शिशुओं के संरक्षण, सुरक्षा और लालन पालन में मदद करना. लेकिन कम्पनी इस उपकरण को ज़ारी कर पाती उससे पहले ही अमरीका में बहुत सारे स्वैच्छिक संगठन और राजनेता इस उपकरण के विरोध में एकजुट हो गए और उनका दबाव इतना प्रबल रहा कि अंतत: कम्पनी को यह घोषणा करनी पड़ी कि वो इस उपकरण को बाज़ार में उतारने का अपना इरादा छोड़ चुकी है.

प्रारम्भ में कम्पनी ने कहा था कि यह उपकरण शिशुओं को बाल कथाएं और लोरियां सुनाएगा और ज़रूरत पड़ी तो उन्हें वर्णमाला भी सिखाएगा. इतना ही नहीं, अगर शिशु रात को रोया तो उसे चुप भी कराएगा. स्वाभाविक रूप से उपकरण के ये उपयोग आकर्षक थे.  लेकिन बाद में यह बात मालूम पड़ी कि इसमें बेबी मॉनिटर के रूप में एक कैमरा लगा होगा जो शिशु की गतिविधियों और उसके परिवेश को रिकॉर्ड करेगा. इतना ही नहीं यह बात भी सामने आई कि इन सबके आधार पर यह उपकरण बच्चों के काम आने वाली उपभोक्ता सामग्री जैसे मिल्क पाउडर, डायपर वगैरह के लिए उपलब्ध डील्स और कूपन्स की जानकारी प्रदान करने के साथ चेतावनी भी देगा कि घर में शिशु के काम की अमुक सामग्री का स्टॉक चुकने को है. शायद यही व्यावसायिक पहलू था जिसने अमरीका स्थित निजता के लिए चिंतित एक्टिविस्टों और विशेष रूप से एक अलाभकारी संगठन कमर्शियल फ्री चाइल्डहुड के कान खड़े किए. अपनी पड़ताल के बाद उन्होंने  इस उपकरण के विरोध में पंद्रह हज़ार लोगों के हस्ताक्षर जुटाये और  दो-टूक लहज़े में कहा कि “यह एरिस्टोटल कोई नैनी नहीं बल्कि एक घुसपैठिया है. हम चाहते हैं कि शिशुओं के कमरे कॉर्पोरेट जासूसी से बचे रहें”. इस संगठन की आपत्ति को ही आगे बढ़ाते हुए सीनेटर एडवर्ड जे मारके और रिप्रेजेण्टेटिव जोए बार्टन सहित अमरीका के बहुत सारे राजनीतिज्ञों ने भी इस बात पर सवाल खड़े किए कि यह  उपकरण जो डेटा एकत्रित करेगा उसका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा और उसे किस तरह सुरक्षित रखा जाएगा?

एरिस्टोटल के इस विरोध के अलावा भी दुनिया के बहुत सारे देशों में समझदार लोग बाज़ार में उतारी जाने वाली स्मार्ट डिवाइसेज़ के बच्चों  पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को लेकर चिंतित  हैं. उनका सोच है कि इस तरह के उपकरण बच्चों के भावनात्मक विकास में रुकावट डालते हैं. कुछ और लोगों की आपत्ति यह भी है कि इस तरह के  उपकरण बच्चों के अपने अभिभावकों से मानवीय सम्बंधों को विस्थापित कर उसकी जगह तकनीक से उनका रिश्ता कायम करने का ख़तरनाक काम करते हैं. इसी आपत्ति को एक जाने-माने शिशु रोग विशेषज्ञ ज़ेनिफर राडेस्की ने अपने एक लेख में यह कहते हुए बल प्रदान किया कि “इस तकनीक के बारे में निजता के महत्वपूर्ण मुद्दे के अलावा मेरी मुख्य चिंता इस बात को लेकर है कि जब कोई शिशु रोएगा, खेलना या कुछ सीखना चाहेगा  तो तकनीक का एक टुकड़ा उसकी आवाज़ सुनने वाला घर का सबसे ज़िम्मेदार और उत्तरदायी सदस्य बनकर उभरेगा.यंत्र द्वारा मनुष्य को विस्थापित कर देने के इस ख़तरे को कम करके नहीं देखा जाना चाहिए.

इसी के साथ यह याद कर लेना भी उपयुक्त होगा वॉइस एक्टिवेटेड इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के दुष्प्रभाव सारी दुनिया में चिंता का कारण बनते जा रहे हैं. बहुत सारे अध्ययन हुए हैं जो बताते हैं कि अब तो बच्चे रोबोट्स को दिमागी समझ रखने वाला  सामाजिक प्राणी तक मानने लगे हैं और उनसे ऐसा बर्ताव करने लगे हैं जैसे वे मानवीय प्राणी हों. बहुत सारे मां-बाप यह भी चिंता करने लगे हैं कि नए ज़माने के स्मार्टफोन्स और टेबलेट्स आवाज़ के निर्देश पर काम करने की अपनी तकनीक की वजह से उनके बच्चों के साथ बहुत कम उम्र में ही घनिष्ट रिश्ता कायम करने लगे हैं. एक बड़ी कम्पनी द्वारा बाज़ार में उतारे गए आवाज़ के निर्देशों पर संचालित होने वाले एलेक्सा नामक उपकरण के उपयोग के प्रभावों का अध्ययन करने वालों ने यह पाया कि इस उपकरण का प्रयोग करने वाले बच्चे प्लीज़ और थैंक यू जैसी अभिव्यक्तियों को भूलते जा रहे हैं और अशालीन होते जा रहे हैं. यह सारा प्रसंग हम सबको भी यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि हमारे जीवन में तकनीक की बढ़ती जा रही घुसपैठ हमारे लिए किस सीमा तक स्वीकार्य होनी चाहिए. ऐसा न हो कि जिस चीज़ को आज हम सुविधा के तौर पर इस्तेमाल करना शुरु कर रहे हैं कल को वही हमारे विनाश का सबब बन जाए!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 10 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 3, 2017

सपनों का राही चला जाए सपनों के आगे कहां

1971 में बनी और बाद में राष्ट्रीय एवम एकाधिक फिल्मफेयर पुरस्कारों से नवाज़ी गई फ़िल्म आनंदमें गीतकार योगेश का लिखा एक अदभुत गीत था:  “ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय/ कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये”. गीतकार ने इसी गीत में आगे लिखा था, “कभी देखो मन नही जागे/ पीछे पीछे सपनों के भागे/ एक दिन सपनों का राही/ चला जाए सपनों  के आगे कहां” और इसी भाव का विस्तार हुआ था आगे के बंद में: “जिन्होंने सजाये यहां  मेले/ सुख दुख संग संग झेले/ वही चुनकर खामोशी/ यूँ चले जाये अकेले कहां”. अच्छे कवि की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह बड़े सरल शब्दों में ऐसी बात कह जाता है जो देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है. अब देखिये ना, हाल में सात समुद्र पार अमरीका में एक साधारण परिवार पर जो बीती उसे यह गीत किस कुशलता से घटना के करीब पांच दशक पहले व्यक्त कर गया था!

पश्चिमी  मिशिगन राज्य के  एक सामान्य  परिवार की असामान्य कथा है यह. बात मार्च माह की है. निक डेक्लेन की सैंतीस वर्षीया पत्नी केरी डेक्लेन की तबीयत कुछ ख़राब रहने लगी थी. डॉक्टर की सलाह पर कुछ परीक्षण करवाए गए तो एक बहुत बड़ा आघात उनकी प्रतीक्षा में था. केरी को ग्लियोब्लास्टोमा नामक एक भयंकर आक्रामक किस्म का दिमाग़ी कैंसर था. भयंकर इसलिए कि इसे करीब-करीब लाइलाज़ माना जाता है और अगर समुचित इलाज़ किया जा सके तो भी मरीज़ औसतन एक से डेढ़ साल जीवित रह पाता  है. लेकिन इलाज़ तो करवाना ही था. एक शल्य क्रिया द्वारा अप्रेल में केरी के दिमाग का ट्यूमर निकाल दिया गया. मुश्क़िल से दो माह बीते थे कि इस युगल को दो और ख़बरें मिलीं! पहली तो यह कि केरी का ट्यूमर फिर उभर आया था, और दूसरी यह कि उसे आठ सप्ताह का गर्भ था! स्वाभाविक है कि ट्यूमर के उपचार के लिए कीमोथैरेपी का सहारा लिया जाता. लेकिन इसमें एक पेंच था. कीमोथैरेपी से गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचता है इसलिए इस उपचार से पहले गर्भपात करवाने का फैसला करना था.  इस युगल के सामने एक दोराहा था:  या तो मां केरी के हित में अजन्मे शिशु की बलि दी जाए, या अजन्मे शिशु के पक्ष में केरी अपने मृत्यु पत्र पर हस्ताक्षर करे! जैसे ही यह ख़बर समाचार माध्यमों में आई, पूरे अमरीका में इस पर बहसें होने लगीं. लेकिन फैसला तो इस युगल को ही करना था! क्योंकि केरी अपनी धार्मिक आस्थाओं की वजह से गर्भपात विरोधी विचार रखती थी, यही तै किया गया कि अजन्मे शिशु को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाए! यह भी जान लें कि डेक्लेन  दम्पती के पांच संतानें पहले से हैं जिनकी आयु क्रमश: 18, 16, 11, 4 और 2 बरस है.

फैसला हो गया तो बेहतर का इंतज़ार करना था. लेकिन जुलाई मध्य में केरी की तबीयत फिर खराब हुई और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा. वो दर्द से तड़प रही थी. बताया गया कि उसे एक ज़ोरदार दौरा पड़ा है. तब उसका गर्भ उन्नीस सप्ताह का हो चुका था. केरी अस्पताल के पलंग पर लेटी थी और एक नली और सांस लेने में मददगार मशीन की सहायता से बेहोशी के बावज़ूद ज़िंदा रखी जा रही थी. उसके दिमाग को गम्भीर क्षति पहुंच चुकी थी और इस बात की उम्मीद बहुत कम थी कि ठीक होकर भी वह किसी को पहचान  सकेगी. कुछ समय बाद उसे एक और दौरा पड़ा. तब उसका गर्भ 22 सप्ताह का हो चुका था और चिंता की बात यह थी की शिशु का वज़न मात्र 378 ग्राम था जबकि उसे कम से कम 500 ग्राम होना चाहिए था. डॉक्टर अपना प्रयास ज़ारी रखे थे. दो सप्ताह और बीते, और एक अच्छी ख़बर आई कि शिशु  का वज़न बढ़कर 625 ग्राम हो गया है. लेकिन इसी के साथ एक चिंता पैदा करने वाली खबर भी थी, कि शिशु तनिक भी हिल-डुल नहीं रहा है. डॉक्टरों के पास एक ही विकल्प था कि सिज़ेरियन ऑपरेशन से शिशु को दुनिया में लाया जाए! यही किया गया और छह सितम्बर को इस दुनिया में एक और बेटी अवतरित हुई, जिसका नाम उसके  मां-बाप की इच्छानुसार रखा गया: लाइफ़. मात्र छह दिन बाद केरी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया!

लेकिन जीवन की असल विडम्बना तो सामने तब आई जब मात्र 14 दिन यह दुनिया देखकर लाइफ़ ने भी आंखें मूंद लीं! इन आघातों से टूटे-बिखरे पिता निक ने अपनी प्यारी पत्नी केरी की कब्र खुदवाई ताकि बेटी को भी मां के पास ही आश्रय मिल सके. निक का कहना है कि उसे समझ में नहीं आता कि ईश्वर ऐसे अजीबो-ग़रीब काम क्यों करता है! वह कहता है कि जब भी उसे मौका मिलेगा, वो ईश्वर से इस सवाल का जवाब मांगेगा. और तब तक वो अपने बच्चों को पालता पोसता  रहेगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, September 19, 2017

बड़े लोगों के बड़े और अजीबो-गरीब उपहार

उपहार हमारे सामाजिक व्यवहार का अभिन्न अंग हैं. इनसे जहां देने वाले की सुरुचि और कल्पनाशीलता का पता चलता है वहीं यह बात भी उभरती है कि उपहार देने वाला उपहार पाने वाले के बारे में कितनी जानकारी रखता है और उसकी रुचियों के प्रति कितना सजग और संवेदनशील है. निश्चय ही उपहार देने और लेने वाले की आर्थिक स्थिति के भी परिचायक होते हैं. लेकिन ये सारी बातें तो हुईं व्यक्तियों के निजी स्तर पर लिये-दिये गए उपहारों के बारे में. विचारणीय बात यह है कि जब एक देश का  प्रधान किसी दूसरे देश के प्रधान को कोई उपहार देता है तब क्या होता है? क्या तब भी इन बातों का खयाल रखा जाता है? हमारे देश में इस बात की बहुत अधिक चर्चा नहीं होती है कि हमारी सरकार ने किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष को क्या उपहार दिया या उनकी विदेश यात्रा के अवसर पर हमारे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को उपहार स्वरूप क्या दिया गया. थोड़ी बहुत चर्चा जो होती है उससे कोई ख़ास तस्वीर नहीं उभर पाती है. लेकिन इधर  अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इस बारे में काफी कुछ लिखा गया है कि इन बड़े लोगों के उपहार क्या और कैसे होते हैं.

हाल में अमरीका के स्टेट डिपार्ट्मेंट ने एक सूची ज़ारी कर यह बताया है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को मई माह में सऊदी अरब की उनकी यात्रा के दौरान कुल 83  बेशकीमती उपहार मिले. डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति  का पदभार ग्रहण करने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा पर अरब इस्लामी शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए सऊदी अरब की राजधानी रियाद गए थे. सऊदी अरब के शाह सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ अल सउद ने उन्हें जो बेहद कीमती उपहार दिये उनमें अनेक तलवारें, खंजर, हीरे-मोतियों और सोने चांदी से जड़ी पोशाकें, सुनहरी ऊन के लबादे जिनके  किनारों  पर  शेर चीतों के फर की सज्जा है, पारम्परिक अरबी वेशभूषा, चमड़े के सैंडिल, इत्र और कलाकृतियां शामिल हैं. पश्चिमी मानदण्डों से बहुत कीमती समझे जाने वाले इन उपहारों के बारे में  अरेबिया फाउण्डेशन के एक्ज़ीक्यूटिव डाइरेक्टर अली शिहाबी का कहना है कि ये उपहार उतने कीमती नहीं हैं जितने पहले के उपहार हुआ करते थे. पहले की खाड़ी की सरकारें तो बहुत ही महंगे उपहार, जैसे कीमती घड़ियां और आभूषण आदि  दिया करती थीं. अब तो स्थानीय संस्कृति की परिचायक और वहां की कलात्मक विरासत  की प्रतीक चीज़ें ही उपहार में दी जाती हैं.

आम तौर पर उपहार देते समय लेने वाले की रुचियों का भी पूरा ध्यान रखा जाता है. यही वजह है कि उनकी विदेश  यात्राओं के समय अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन को उनकी काउ बॉय वाली छवि के अनुरूप एक घोड़ा और राष्ट्रपति बिल क्लिण्टन को उनके संगीत प्रेम  के कारण  एक सेक्सोफोन भी भेंट किया जा चुका है. बराक ओबामा को जर्मन चांसलर एंजिला मारकेल ने बास्केटबॉल  खेल रहे एक आदमी की पेण्टिंग उपहार में दी तो क़तर के अमीर ने उन्हें 110,000 डॉलर मूल्य की एक यांत्रिक चिड़िया उपहार  स्वरूप प्रदान की. इस चिड़िया के अलावा बेशकीमती रत्नों  से जड़ित  एक घोड़ा भी उन्हें उपहार स्वरूप प्रदान किया गया. यहीं यह भी याद कर लेना ज़रूरी है कि अधिकांश देशों में राष्ट्राध्यक्षों को उनकी विदेश यात्राओं में मिले उपहार सरकारी भण्डार में जमा कराने होते हैं. अमरीका में किसी विदेशी सरकार से 390 डॉलर से अधिक मूल्य का उपहार लेने की मनाही है. लेकिन अगर कोई सरकारी अधिकारी चाहे तो इससे अधिक मूल्य वाला उपहार उसका प्रचलित बाज़ार दर वाला  मूल्य सरकार को चुकाकर खुद रख सकता है. इसी प्रावधान का प्रयोग कर हिलेरी क्लिण्टन ने सन 2012 में म्यांमार की प्रतिपक्ष की नेता आंग सांग सू की द्वारा भेंट में दिया गया काले मोतियों का नेकलेस 970 डॉलर का मूल्य चुकाकर प्राप्त किया गया था.

और बात जब उपहारों की चल रही है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि हम उस उपहार की बात न करें जो 1886 में फ्रांस द्वारा अमरीका को दिया गया था. मेरा इशारा उस स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की तरफ है जो आज अमरीका का पर्याय बन चुका है. इस भव्य प्रतिमा का  निर्माण पेरिस में हुआ और फिर इसे 214 क्रेट्स में पैक कर अमरीका भेजा  गया. उपहारों में विराट की एक मिसाल हाल में भी देखने को मिली जब यह ख़बर आई कि नॉर्वे अपने मित्र देश फिनलैण्ड को उसके सौवें जन्म दिन पर एक पहाड़ ही उपहार स्वरूप दे रहा है! अजीबोगरीब उपहारों की यह चर्चा चीन के ज़िक्र के बग़ैर भला कैसे पूरी हो सकती है जिसने 1972 में राष्ट्रपति  निक्सन को दो विशालकाय पाण्डा (भालू से मिलते-जुलते प्राणी) उपहार स्वरूप दिये और उसके बाद तो चीनी इतनी बार इन प्राणियों को भेंट में दे चुके हैं कि अंतर्राष्ट्रीय राजनय की दुनिया में एक नया शब्द ही चलन में आ गया है:  पाण्डा डिप्लोमेसी. 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 सितम्बर, 2017 को प्रधानमंत्री  या राष्ट्रपति को उपहार स्वरूप क्या दिया गया शीर्षक से प्रकाशित इसी आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, September 12, 2017

हम खुद अपनी समस्याएं हल क्यों नहीं करना चाहते?

देखते-देखते हमारे चारों  तरफ की दुनिया में बहुत कुछ बदलता जा रहा है. हर बदलाव हमारे मन में बहुत सारी आशंकाएं पैदा करता है. हम भयभीत होते हैं, उसे नकारने के प्रयत्न करते हैं, उसका प्रतिरोध करने की कोशिश करते हैं, उसके खिलाफ़ तर्क गढ़ते हैं लेकिन हमारे सारे प्रयत्नों के बावज़ूद बदलाव आकर  रहता है. मज़े की बात यह है कि जिन्होंने कभी उस बदलाव का विरोध किया था बाद मे वे भी उसे बेहिचक स्वीकार कर लेते हैं. यह सिलसिला काफी लम्बे समय से चल रहा है. वैसे, ऐसा भी नहीं है कि हर बदलाव सकारात्मक ही हो. बल्कि सच तो यह है कि हर बदलाव अपने साथ कुछ परेशानियां भी  लाता है. कुछ बुरा भी उसकी वजह से होता है. लेकिन इसे मनुष्य की  अदम्य जिजीविषा ही कहेंगे कि वह तमाम झटके सहकर भी अपने प्रगति पथ पर अनवरत  चलता रहता है.

ये सारे विचार मेरे मन में एक ख़ास अनुभव के कारण आए. पिछले दिनों बैंगलुरु जाने का और कुछ दिन वहां रहने का अवसर मिला तो मैंने पाया कि सूचना प्रौद्योगिकी के मामले में अग्रणी इस भारतीय शहर में कई मामलों में जीवन यापन बहुत कठिन हो गया है. कुछ समय पहले तक जहां हम इस बात पर गर्व करते थे कि इस शहर के आई टी हब बनने का यह आलम है कि अमरीकी अंग्रेज़ी में एक नया शब्द ही जुड़ गया है: बैंग्लोर्ड, वहीं अब यह महसूस हुआ कि यह शहर इसी वजह से यहां आ जुटी विशाल जनसंख्या और उसकी    ज़रूरतों-सुविधाओं-विलासिताओं के उपकरणों का बोझ उठा पाने में नाकाम साबित होता जा रहा है. सड़कों पर वाहनों की ऐसी भीड़ है कि घर से निकलकर कहीं जाना किसी यातना से कम नहीं लगता है. वहां के अखबार भी आए दिन यह फिक्र करते हैं कि लगातार बढ़ती जा रही जनसंख्या के सामने वहां के प्राकृतिक संसाधन अपर्याप्त साबित होते जा रहे हैं! और जब मैं यह सब महसूस कर रहा था तभी मुझे यह पढ़ने को मिला कि यह संकट केवल हम भारत वासियों का ही नहीं है.

उधर सुदूर अमरीका में भी उन शहरों में जहां बहुत सारी बड़ी कम्पनियों का जमावड़ा है, उनमें काम करने वाले कर्मचारियों के लिए वहां रहना और जीवन यापन  करना नामुमकिन होता जा  रहा है. लोगों को रहने के लिए घर नहीं मिलते हैं, और अगर मिलते हैं तो बहुत महंगे किराये पर मिलते हैं. परिवहन और यातायात की समस्याएं दिन-ब-दिन गहराती जा रही हैं. कम्पनियां अपने यहां जिस दक्षता के कर्मचारियों को रखना चाहती हैं वे वहां रहने को तैयार नहीं हैं. जो अमीर कम्पनियां हैं वे अपने कर्मचारियों को अधिक वेतन देकर भी अपने यहां काम करने को तैयार कर लेती हैं, लेकिन सारी कम्पनियां यह नहीं कर पाती हैं. और इसी मज़बूरी ने वहां एक नए सोच को जन्म दिया है.  बहुत सारी कम्पनियां अब यह सोचने लगी हैं कि बजाय इसके कि वे कर्मचारियों को अपने पास बुलाएं, क्यों न वे ही कर्मचारियों के पास चली जाएं? लेकिन स्वाभाविक ही है कि ऐसा करना भी छोटी कम्पनियों के बस की बात नहीं है.

अमरीका की एक बहुत बड़ी कम्पनी है अमेज़ॉन. यह वहां की सर्वाधिक सफल कम्पनियों  में से एक है. हम भारत में भी इसके नाम और काम से परिचित हैं. इसने पिछले ही सप्ताह यह घोषणा की है कि यह बहुत जल्दी पांच बिलियन डॉलर की लागत से एक नया, “समान” मुख्यालय परिसर खड़ा करेगी. अमेज़ॉन का सोच यह है कि इसके वर्तमान मुख्यालय वाले शहर सिएटल में कर्मचारियों के आवास  की समस्या के हल होने का इंतज़ार करने और वहां बढ़ती जा रही भीड़-भाड़ की समस्या के घटने की आस लगाए रखने से ज़्यादा अच्छा यही होगा कि किसी और जगह जाकर, जहां ये समस्याएं न हों और निकट भविष्य में होने की आशंका भी न हो, सुकून के साथ अपना काम ज़ारी रखा जाए. ज़ाहिर है कि कम्पनी ने सरकार के कदमों का इंतज़ार करने की बजाय अपने स्तर पर समस्या का समाधान  करने का फैसला किया है.

इसी बात ने मुझे यह सोचने को विवश किया कि आखिर क्या बात है कि हम पश्चिम की नकारात्मक चीज़ों को तो तुरंत अपना लेते हैं, वहां की सकारात्मकता से उसी तेज़ी के साथ प्रभावित नहीं होते हैं! बैंगलुरु में मैंने पाया कि बहुत समर्थ और साधन सम्पन्न कम्पनियों के परिसरों तक जाने वाली सड़कें भी बहुत बुरी हालत में है. यह प्रशासन का निकम्मापन तो है ही कि जिनसे उसे टैक्स के रूप में भारी आमदनी होती है उनकी भी वो कोई परवाह नहीं करता है, लेकिन क्या यह उन समर्थ कम्पनियों की  भी भयंकर उदासीनता नहीं है कि वे खुद अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कोई पहल नहीं करती हैं? आखिर क्यों नहीं ये कम्पनियां अपने परिसरों तक आने वाली सड़कों को अपने दम पर दुरुस्त करवा लेती हैं?        

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 सितम्बर, 2017  को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, September 5, 2017

एक खेल जो आपको आत्महत्या के लिए उकसाता है!

इन दिनों एक इण्टरनेट खेल खूब चर्चा में है. इस खेल की चर्चा ग़लत कारणों से है. शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो जब दुनिया के किसी न किसी कोने से किसी बालक, किशोर या युवा के इस खेल  की वजह से अपनी जान से हाथ धो बैठने की ख़बर पढ़ने को न मिलती हो. भारत में यह गेम हाल ही चर्चा में आया है, लेकिन रूस, अर्जेंटीना, ब्राजील, चिली, कोलंबिया, चीन, जॉर्जिया, इटली, केन्या, पराग्वे, पुर्तगाल, सऊदी अरब, स्पेन, अमरीका, उरुग्वे जैसे देशों में कम उम्र के कई बच्चों ने इस खेल  की वजह से अपनी जान गंवाई है. हाल में भारत में ही अलग-अलग प्रांतों में कई बच्चे इस खेल के शिकार हुए हैं. सारी दुनिया में इस बात पर गम्भीर विमर्श हो रहा है कि आखिर इस ऑनलाइन खेल में ऐसा क्या है कि यह अनगिनत लोगों को आत्महत्या करने के लिए उकसाने में कामयाब हो रहा है.
यह ब्लू व्हेल या ब्लू व्हेल चैलेंज इंटरनेट पर खेला जाने वाला गेम है, जो दुनियाभर के कई देशों में उपलब्ध है. इस गेम को खेलने वाले व्यक्ति  के सामने कई तरह के चैलेंज रखे जाते हैं. उसे हर दिन एक चैलेंज पूरा करते हुए कुल पचास दिनों में सारे चैलेंज पूरे कर लेने होते हैं.  हर चैलेंज को पूरा कर लेने पर हाथ पर एक कट करने के लिए कहा जाता है. सारे चैलेंज पूरे हो जाने पर हाथ पर एक व्हेल की आकृति बनती है.  शुरुआत पूरे दिन किसी से भी बात न करने, एक ख़ास किस्म का संगीत सुनने, हॉरर  वीडियो या फिल्म देखने, सुबह जल्दी उठने, छत पर जाने जैसे अपेक्षाकृत निरापद चैलेंजों से होती है और फिर हाथ की तीन नसों को काटकर उसकी फोटो क्यूरेटर को भेजने जैसे ख़तरनाक चैलेंज के बाद अंतिम चैलेंज के रूप में आत्महत्या करने को कहा जाता है. माना जाता है कि यह खेल  प्रारम्भ में खेलने वाले के मन में एक उत्सुकता जगाता है और फिर आहिस्ता-आहिस्ता उसे अपनी  गिरफ़्त में लेकर आत्महत्या जैसा दुष्कृत्य करने के लिए विवश कर देता है.  इस  गेम को फिलिप बुडेकिन ने साल 2013 में बनाया था. रूस में आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं के बीच कम से कम सोलह किशोरियों को आत्महत्या के लिए उकसाने के ज़ुर्म में उसे गिरफ्तार किया गया और बाद में उसे जेल की सजा हो गई. इक्कीस वर्षीय फिलिप ने रूसी प्रेस से कहा था कि उसके पीड़ित 'जैविक कूड़े' की तरह हैं और इस तरह वह 'समाज को साफ़' कर रहा है. उसे सेंट पीटर्सबर्ग की जेल में रखा गया है. कुछ पत्रकारों के मुताबिक बुडेकिन ने पहले ख़ुद को निर्दोष बताया था और कहा था कि उसका कोई बुरा मक़सद नहीं था और वह सिर्फ मज़े ले रहा था.
एक अन्य ख़बर यह भी है कि ब्लू व्हेल गेम की एडमिन 17 साल की लड़की गिरफ्तार हो गई है. वह रूस की रहनेवाली है. लड़की पर आरोप है कि जानलेवा ब्लू व्हेल चैलेंज गेम के पीछे उसी का हाथ है. मीडिया में आई रिपोर्ट्स के अनुसार  लड़की शिकार को धमकी दिया करती थी कि अगर उसने ब्लू व्हेल टास्क पूरा नहीं किया तो वह उसका और उसके परिवार का खून कर देगी. ब्लू व्हेल चैलेंज उन्हीं लोगों को अपना शिकार बनाता है, जो तनाव से जूझ रहे हैं और आत्महत्या करने के बारे में सोचते हैं. आरोपी लड़की मनोविज्ञान की छात्रा है और उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है. अदालत में हुई पेशी के बाद उसे तीन साल के लिए जेल भेज दिया  गया है.
किसी खेल की वजह से खुद को हानि पहुंचाने और आत्महत्या तक कर डालने का यह प्रकरण सारी दुनिया में चर्चा, विचार विमर्श और चिंता का कारण बनता जा रहा है. विभिन्न सरकारें और इण्टरनेट तंत्र अपनी-अपनी अपनी तरह से इस खेल के दुष्परिणामों से लोगों को बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं. लेकिन वे प्रयत्न पूरी तरह कामयाब होते नज़र नहीं आ रहे हैं. मुझे तो यह लगता है कि लोग और विशेष रूप से नई पीढ़ी जैसे-जैसे अपने परिवारजन से दूर होती जा रही है, इस तरह के मूर्खतापूर्ण, नकारात्मक  और आत्मघाती खेलों की स्वीकार्यता भी बढ़ती जा रही है. परिवारों में सम्वादहीनता का सघन होते जाना मुझे इसके मूल में एक बड़ा कारण नज़र आता है. ब्लू व्हेल की व्यापक स्वीकार्यता और इसके दुष्परिणाम हमें एक बार फिर से चेता रहे हैं कि अकेले होते जाने की जिस राह पर हम चल पड़े हैं वह बहुत ख़तरनाक है! इस खेल की दुखद परिणतियों ने एक बार फिर से इस बात की ज़रूरत को भी रेखांकित किया है कि मां-बाप इस बात पर निगाह रखें कि उनके बच्चे इण्टरनेट पर तथा अन्यत्र भी किन गतिविधियों में भागीदारी कर रहे हैं.
आप क्या सोचते हैं?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 सितम्बर, 2017 को अकेले होते जाने की राह बहुत ख़तरनाक! शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.